प्रकाश के रे वरिष्ठ पत्रकार हैं. भारत मे अंतराष्ट्रीय मसलों के चुनिंदा जानकर लोगों में से एक हैं. विश्व राजनीति के साथ-साथ मीडिया, साहित्य और सिनेमा पर भी आप गहरी समझ रखते हैं.

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कार्ल मार्क्स का कहना था कि पैसा इतिहास की धारा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है और इस पैसे की धारा तय करने वाली बैंकिंग व्यवस्था को थॉमस जेफरसन आजादी के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे। कई सालों से जारी मौजूदा आर्थिक मंदी के बारे में पूंजीवाद के बड़े समर्थक भी मानने लगे हैं कि इसके पीछे बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थाओं का हाथ है। कोस्ता-गावरास की हालिया फिल्म कैपिटल (फ्रेंच व अंग्रेजी) बैंकिंग व्यवस्था की आंतरिक संरचना की पड़ताल करती है। जी (1969), मिसिंग (1982), म्यूजिक बॉक्स (1989), मैड सिटी (1997), इडेन इन वेस्ट (2009) जैसी अनेक फिल्मों के निर्देशक 83 वर्षीय गावरास दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फिल्मकारों में से एक हैं।

फिल्म की कहानी एक ऐसे अर्थशास्त्री मार्क तुरनील की करियर यात्रा है, जिसका सपना शिक्षक बन कर नोबेल पुरस्कार जीतना है या वित्तीय कॉरपोरेट तंत्र से जुड़कर खूब धन कमाना है। वह दूसरे सपने को पूरा करने के रास्ते को चुनता है और कहता है- ‘पैसे से प्रतिष्ठा मिलती है, पैसा मालिक है, पैसा कभी सोता नहीं’। तुरनील वैश्विक कारोबार वाले एक फ्रांसीसी बैंक के अध्यक्ष का सलाहकार बनता है। कुछ समय बाद अध्यक्ष को बीमारी के कारण पद से हटना पड़ता है। बैंक पर अपने नियंत्रण को कायम रखने की उम्मीद में वह तुरनील को अध्यक्ष बना देता है लेकिन तुरनील अपने वर्चस्व को बनाने में लग जाता है। उधर बैंक के अन्य निदेशक उसे अपने एजेंडे को लागू करने का मोहरा बनाने की कोशिश करते हैं। इस बैंक में अमरीकी निवेशकों का बड़ा हिस्सा है, जो अपने मुनाफे और बैंक को अपने हिसाब से चलाने के लिए नये अध्यक्ष का इस्तेमाल करते हैं। उससे खर्च बचाने के लिए कर्मचारियों की छंटनी करवाते हैं और एक जापानी बैंक के अधिग्रहण के लिए दबाव देते हैं, जिसकी माली हालत बहुत खस्ता है। उनका खेल यह था कि इस अधिग्रहण के साथ ही बैंक के शेयरों का भाव गिराने लगेगा और वे अधिक-से-अधिक शेयर लेकर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लेंगे। इन सबके एवज उसे बोनस के रूप में भारी रकम मिलती है। तुरनील इसकी जानकारी निदेशक बोर्ड में अपने विरोधियों को देकर उनसे शेयर खरीदवा लेता है और उधर अमरीकी निवेशकों को भी ब्लैकमेल के जरिये शांत कर देता है। इस जोड़-तोड़ में न सिर्फ वह फिर बैंक का अध्यक्ष बन जाता है बल्कि भारी कमाई भी करता है। इस कथा के माध्यम से दर्शक बैंकों की कार्यप्रणाली और शोषण से दो-चार होता है। फिल्म की मुख्य कथा के साथ कई उपकथाएं चलती हैं जो तुरनील के पारिवारिक जीवन, धनकुबेरों की ऐय्याशी, राजनीतिक संबंध, बेरोजगार किये गये कर्मचारियों की दशा आदि से परिचय कराती हैं। अधिक विस्तार में जाना फिल्म और संभावित दर्शकों के साथ अन्याय करना होगा।

फिल्म के बारे में बात करते हुए कोस्ता-गावरास ने एक साक्षात्कार में कहा है- हम सब पूंजी के गुलाम हैं। जब वह कांपती है, हम सब कांपते हैं। जब यह बढ़ती है और जीतती है, हम सब जश्न मनाते हैं। हमें कौन मुक्त करेगा? हमें क्या अपने को मुक्त करना चाहिए? कम-से-कम हमें यह तो जानना ही चाहिए कि इसकी सेवा कौन करता है और कैसे करता है।’ फ्रांसीसी बैंकर स्टीफेन ओस्मौं के उपन्यास ले कपिताल पर आधारित और ज्यां पेरेल्वादे की किताब टोटालिटेरियन कैपिटलिज्म से प्रभावित यह फिल्म बड़े प्रभावी ढंग से यही करती है। वह कोई उपाय नहीं सुझाती है। बस समस्या की कई परतें खोल कर हमारे सामने रख देती है और इस प्रक्रिया में कुछ सवाल छोड़ जाती है।

फिल्म बिना कोई सीधा संदर्भ दिये 2008 की वैश्विक महामंदी की छाया में चलती है, जो अब तक चल रही है। इस मंदी का मुख्य कारण वे नीतियां थीं, जिनमें वित्तीय बाजार को नियंत्रण-मुक्त करने के लिए कई नियम लाये गये थे। इन नियमों को बर्कशायर हाथवे के मुखिया वारेन बफे ने ‘सामूहिक बर्बादी के आर्थिक हथियार’ की संज्ञा दी थी। यह संकट इतना गहरा था कि अमरीकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख बेन बर्नान्की ने आशंका जतायी थी कि शायद यह पूंजीवाद का अंत है और तुरंत 700 बिलियन डॉलर की मांग की थी ताकि स्थिति को कुछ हद तक संभाला जा सके। अनुमानों के अनुसार इस संकट का तब का नुकसान 8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक था। फिल्म हमें यह बताती है कि यह सब ‘काउ बॉय कैपिटलिज्म’ और ‘तुरंत मुनाफा’ के पैरोकारों की कारस्तानी थी। तुरनील एक जगह कहता है कि वह आधुनिक रॉबिनहुड है जो गरीबों से छीन कर अमीरों को देता है। फिल्म इस संदेश के साथ खत्म होती है कि बैंकर मजे में हैं और यह मजा तब तक चलता रहेगा, जब तक सब कुछ टूटकर बिखर न जाए।

ऑलिवर स्टोन की फिल्म वाल स्ट्रीट (1987) जिस तरह से शेयर बाजार और दलालों के अंदरूनी कामकाज को सामने लाती है, उसी तरह गावरास हमें बैंको की बड़ी दीवारों के पीछे हो रहे दुनिया के विरुद्ध षड्यंत्र से हमें परिचित कराते हैं। विषय-वस्तु के हिसाब से एक भारी फिल्म अपनी तेज गति, अभिनय, ब्रेष्टियन तकनीक, कसे हुए स्क्रिप्ट के कारण जबरदस्त थ्रिलर के रूप में हमारे सामने आती है जिसके चरित्र, संवाद और घटनाएं लगातार बांधे रखते हैं। अर्थव्यवस्था और आम आदमी के रोजमर्रा के संबंध हमें फिल्म को बहुत दिनों तक याद कराते रहते हैं। ऐसे समय में जब आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्न भारी-भरकम शब्दावलियों, अकादमिक बहसों और मूर्खता की हद तक जा चुके प्रतिरोध के रिटोरिक की कैद में हैं, कोस्ता-गावरास की कैपिटल सहज ढंग से हमें बहुत कुछ बता-समझा जाती है। इस फिल्म को देखा जाना चाहिए।

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