हम जिन ढांचों में बंधकर इस दुनिया को चलाने का काम करते हैं, उन ढांचों की वजह से यह केवल कोरी कल्पना हो सकती है की दुनिया से विषमताओं का अंत हो जाए। लेकिन अगर इसे हल्के में लिया तो विषमताओं की खाई का जन्म होता है। इस बात को जब हम हर लहजे में स्वीकारने लगते हैं तो हमारी अकर्मण्यता दुनिया को बर्बाद करने का काम करने लगती है।

यह बात सही है की इंजीनियर और कारपेंटर दोनों के कामों में अंतर है। इंजीनियर अपने विशिष्ट कौशल की वजह से अधिक आय का हकदार है। लेकिन यह सवाल भी इसी बिंदु पर पनपता है की आखिरकार आधिक आय की हकदारी कितनी होगी? क्या आय के बीच मौजूद जमीन और आसमान का अंतर सही है अथवा गलत?

मसलन मीडिया क्षेत्र में काम करने वाली एक लड़की को मैं जानता हूं जिसके सुपरबॉस की तनख्वाह उससे 4000 फीसदी या 40 गुना ज्यादा है जबकि दोनों ही एडिटोरियल टीम का ही हिस्सा हैं या याद कर सकता हूं कि एक लेख में मैंने पढ़ा था कि इंफोसिस के फाउंडिंग चेयरमैन नारायणमूर्ति चाहते थे कि इंफोसिस में काम करने वाले किसी भी कर्मचारी की तनख्वाह में 1:50 से ज्यादा का अंतर न रहे। और इसका उल्लंघन होना भी उनके और एक दौर में इंफोसिस संभाल रहे विशाल सिक्का के संबंधों में बिगाड़ का कारण बना। पर क्या 50 गुना ज्यादा तनख्वाह भी बड़ा अंतर नहीं?

क्या चंद लोगों की मुठी में कुल सम्पति का आधे से अधिक हिस्सा होने पर दुनिया से यह उम्मीद करना बेईमानी नहीं है कि वह ईमादारी और न्याय को अपनी जिंदगी अपनायेंगे? क्या ऐसी स्थिति अन्याय की स्थिति नहीं है? या अन्याय की परिभाषा तभी साकार होगी जब कोई गुनाह होगा। यकीन मानिए, विषमता की खाइयाँ सभ्यता के संस्थानों को हर समय मात देती रहती हैं। जैसे की किसी कल्याणकारी राज्य के लिए यह बड़ी अजीब सी स्थिति है की उसके सारे संस्थान कागजों पर काम करते हुए दिखते तो हैं लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं दिखता।


पेरिस स्कूल ऑफ़ इक्नोमिक्स में स्थित World Inequality Lab द्वारा विश्व विषमता रिपोर्ट तैयार की गयी है। इस रिपोर्ट को वर्ष 1980 से 2016 के बीच 36 वर्षों के वैश्विक आंकड़ों को आधार बनाकर तैयार किया गया है। इसके आंकड़ें ‘वर्ल्ड वेल्थ एंड इनकम डेटाबेस’ पर आधारित हैं। यह डेटाबेस देशों के बीच और देशों के भीतर मौजूद आय और संपदा वितरण के ऐतिहासिक विकास पर आधारित दुनिया का सबसे विस्तृत डेटाबेस है। दुनिया अपने भीतर मौजूद अथाह आर्थिक विषमता को लेकर जागरूक रहे, यही इस रिपोर्ट का इरादा है।

पूरी दुनिया में मौजूद विषमताओं पर इस रिपोर्ट का मानना है की पिछले दशक में दुनिया के सारे देशों में अलग-अलग दर से विषमता में बढोतरी हुई है। समान विकास दर के बावजूद भी देशों के भीतर और देशों के बीच विषमता की भयंकर खाई दिखती है। जिसका मतलब साफ़ है की विकास दरें केवल अर्थव्यवस्था की एक मापक हो सकती है, पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था नहीं या सामाजिक दशाओं का आख्यान नहीं। इसका इशारा इस तरफ भी जाता है की देश की राष्ट्रीय नीतियाँ और संस्थाएं विकास दरें तो बढ़ाती हैं लेकिन साथ ही साथ विषमता की खाई भी चौड़ी करती रहती है।

विषमता की खाई यूरोप में अधिकतम और मध्यपूर्व के देशों में निम्नतम है। इसे सरलता से समझने के लिए इन देशों के शीर्ष 10 फीसदी लोगों की साल 2016 के राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी की तरफ नज़र डालते हैं। यूरोप के शीर्ष 10 फीसदी लोगों के पास कुल राष्ट्रीय आय का 37 फीसदी हिस्सा है तो मध्यपूर्व के देशों में राष्ट्रीय आय में यह हिस्सेदारी लगभग 61 फीसदी के करीब थी। इसी तरह अन्य देशों की जमीन भी आर्थिक विषमता से पटी हुई है। चीन में शीर्ष 10 फीसदी लोगों की राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी करीब 41 फीसदी, रूस में 46%, अमेरिका और कनाडा के आसपास के क्षेत्रों में 47% अफ्रीका, ब्राज़ील और भारत में लगभग 55% के आसपास थी।

इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 0.1 फीसदी लोगों के पास दुनिया की कुल सम्पति का 13 फीसदी हिस्सा है। इसके अलावा 1980 से 2016 के बीच 36 वर्षों में जो नई संपतियां सृजित की गयी हैं, उसमें भी 27 फीसदी सम्पति पर केवल 1 फीसदी अमीरों का अधिकार है। इन वर्षों में शीर्ष 1 फीसदी अमीरों की सम्पति में होने वाला इजाफा सबसे निचले स्तर पर मौजूद 50 फीसदी लोगों की सम्पति में हुए इजाफे के दोगुने से भी अधिक है।


पूरी दुनिया में फैले असमानता की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की शीर्ष 1 फीसदी लोगों की कुल आबादी केवल साढ़े सात करोड़ है वहीं 50 फीसदी गरीबों की आबादी लगभग पौने 4 अरब है। 1980 के बाद पूरी दुनिय में अपनाई गयी नयी आर्थिक नीतियों की वजह से अमीरी और गरीबी की खाई और अधिक बढ़ी है। इस रिपोर्ट का मानना है की अगर देशों ने खुद की अर्थव्यवस्था में अगर जड़ से बदलाव नहीं किया तो हालत और गहरे होते चले जायेंगे। वर्ष 2050 तक ऐसा हो सकता है कि दुनिया की आधी आबादी कुल आय के केवल 9 फीसदी हिस्से से अपना गुज़ारा करे.

(विश्व भर में असमानता पर आधारित रिपोर्ट का यह पहला हिस्सा है, दूसरे हिस्से में हम भारत में मौजूद असमानता की बात करेंगे।)

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