विचारधारात्मक मतभेदों को भुलाते हुये महाराष्ट्र की सभी लेबर यूनियन साथ आ गई हैं. ये महाराष्ट्र के श्रम विभाग के फैक्ट्रियों को बंद करने में आसानी के नये नियमों का विरोध कर रहे हैं. बताते चलें कि महाराष्ट्र देश का सबसे ज्यादा औद्योगिक प्रदेश है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार शनिवार को नासिक में हुई एक बैठक में सीपीएम, कांग्रेस, आरएसएस और शिवसेना ने राज्य सरकार से 50 मजदूरों वाली फैक्ट्री को भी बंद किये जाने से पहले राज्य सरकार से आधिकारिक अनमति की शर्त लागू करने की मांग की.

वर्तमान में औद्योगिक विवाद कानून के तहत, कोई भी ऐसी यूनिट जिसमें 100 या उससे ज्यादा लोग काम करते हों को बंद करने से पहले सरकार की अनुमति लेने का प्रावधान है. चूंकि कंपनी के मालिकों ने बढ़ती मशीनों का हवाला दिया था तो महाराष्ट्र सरकार के श्रम विभाग ने कामगारों की संख्या को 100 के नियम से बढ़ाकर 300 करने का प्रस्ताव किया था. जिसका मतलब था कि 299 या उससे कम कामगार जिस फैक्ट्री में काम कर रहे हैं, उन्हें बिना किसी सरकारी अनुमति के बंद किया जा सकता है.

वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार, जिन फैक्ट्रियों में 300 या उससे अधिक कामगार हैं उन्हें भी बंद करने की अनुमति दी जा सकती है बशर्ते 60 दिनों के काम का औसत भुगतान, जितने साल उन्होंने लगातार नौकरी की है उतने सालों के लिये उन्हें कर दिया जाये.

महाराष्ट्र यह विचार केंद्र सरकार के एक ऐसे ही मॉडल कानून के प्रचलन के बाद राजस्थान सरकार के कानूनों में बदलाव के बाद कर रहा है.

दो दिन पहले नासिक में हुई इस राज्य स्तरीय मीटिंग में आरएसएस से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ के साथ ट्रेड यूनियन ज्वाइंट एक्शन कमेटी, सीपीएम का अनुषंगी सीटू, कांग्रेस का अनुषंगी इंटक, शिव सेना से संबद्ध भारतीय कामगार सेना, हिंद मजदूर सभा और दूसरे कई संगठनों के लोग मौजूद थे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की ही मानें तो महाराष्ट्र श्रम विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 37,324 रजिस्टर्ड कंपनियां हैं. जिनमें 25.16 लाख मजदूर काम करते हैं. इन रजिस्टर्ड कंपनियों में 32,443 में 100 से भी कम मजदूर काम करते हैं. जिनकी कुल संख्या 7.95 लाख है. इसमें से 3,426 फैक्ट्रियों में 100 से 300 के बीच मजदूर काम करते हैं. जिनकी कुल संख्या 5.84 लाख है. यानि कुल मिलाकर करीब 14 लाख मजदूर इस निर्णय से प्रभावित हो सकते हैं.

सभी संगठनों ने इस प्रस्ताव के वापस न होने और मजदूरों की संख्या बिना अनुमति बंद की जाने वाली फैक्ट्रियों में घटाकर 50 न किये जाने की स्थिति में आंदोलन और प्रदर्शन करने की बात कही है. इससे पहले भी भाजपा शासित सरकारों की किसान विरोधी नीतियों के चलते, स्वराज इंडिया पार्टी के एक कार्यक्रम में कई वामपंथी और दक्षिणपंथी दल हज़ारों कार्यकर्ताओं के साथ एक ही मंच पर आ चुके हैं.

ऐसे में भाजपा के लिये यह आत्ममंथन का वक्त होना चाहिये क्योंकि ऐसे ही उसकी किसान, मजदूर और गरीब विरोधी नीतियां जारी रहीं तो अगले चुनावों में उसका राजनीतिक विकल्प से हीन भारत में फिर से एक बार सत्ता हथिया लेने का सपना चकनाचूर हो सकता है.

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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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