पता नहीं क्यों लेकिन जो एहसास ‘आज़ादी’ शब्द से मिलता हैं, वह ‘लोकतंत्र’ या ‘गणतंत्र’ से नहीं मिलता. आज़ादी के एहसास से जो खुमारी पैदा होती है, वैसी खुमारी जनतंत्र से हासिल नहीं होती. हो सकता है कि गणतंत्र, जनतंत्र या लोकतंत्र में तंत्र या सिस्टम का प्रत्यय होने की वजह से ऐसा हो या एक ऐसे तंत्र या सिस्टम की वजह से परेशानी हो जो आज़ाद करना सिखाता ही नहीं हो.

भारत आज़ाद हुआ, उसके बाद गणतंत्र बना. और इस तंत्र के सहारे चलते हुए भारत ने 69 साल की यात्रा तय कर ली. अब यह यात्रा एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ से निकलने वाले रास्तों पर गणतंत्र तो जिन्दा दिखता है लेकिन उसमें रहने वाली आज़ादी की रूह मृतप्राय दिखती है.

गहराई में जायें तो संविधान से इतर सत्ता की कुछ संरचनाएं है जो आज़ादी से लेकर अब तक पूरे देश के जनमानस में राज कर रही हैं. जनमानस अब भी अपने भविष्य की नियति; इज्ज़त, प्रतिष्ठा, धर्म, जाति, धनबल, बाहुबल आदि के प्रचलित रवैये से प्रभावित होकर निर्धारित करता है. इसलिए जनमानस में करणी सेना, गौरक्षा दल, दलित पैंथर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि को लेकर जुड़ी भावनाएं संविधान से ज्यादा मायने रखने लगी हैं. और संविधान एक ऐसी उपमा बन चुका है, जिसकी दुहाई सब देते हैं लेकिन अपने जीवन और रवैये में लागू कोई नहीं कर रहा.

सबसे बड़ी विडंबना तो उनके साथ है जिन्होंने संविधान को समझने की बजाए यह समझा है कि संविधान कुछ अनुच्छेदों, नियमों और उपबधों से सजा दस्तावेज़ है जिसे अपनाने से सरकारें चलती हैं. इसलिए संविधान का मतलब सरकार के रवैये को नियंत्रित करना है न की लोगों के रवैये को नियंत्रित करना.

हम अपने गणतंत्र में आज़ाद इसलिए भी नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि हम यह समझना ही नहीं चाहते की संविधान कुछ मूल्यों को हासिल करने के लिए बनाये गये नियमों और अनुच्छेदों का पुलिंदा है. हम यह नहीं समझना चाहते कि हम जिन मूल्यों को अपने भूगोल, लिंग, परिवार, समुदाय, जाति, धर्म, देश और विदेशों से सीखते हैं; संविधान के मूल्य उन सबको नियंत्रित करने का काम करते हैं. इन मूल्यों पर अंकुश लगाने का काम करते हैं. इन मूल्यों को समावेशी बनाने का काम करते हैं. इन मूल्यों से स्वतंत्रता, समानता और न्याय हासिल करने की तरफ बढ़ने का काम करते हैं.

आज़ादी से लेकर अब तक के सफर में हमने अधिकांशत: उस तंत्र के लिहाज से खुद को बढ़ाने की कोशिश है जो लोकतांत्रिक नहीं है. जो बहुमत का है और दिखावटी है, जो वैसा ही है जैसा अतीत के मूल्य थे. उदाहरण के तौर पर- ‘प्रतियोगिता से ही विकास संभव है’, ‘शहरीकरण से ही दुनिया में रोजगार पैदा किया जा सकता है.’ यह दुनिया के बहुमत लोगों की बोली है जिसे हम अपनाने के लिए लालायित है. ‘शिक्षा से अगर रोजगार नहीं मिलता तो शिक्षा का क्या फायदा?’ यह लोकप्रिय अवधारणा है जिसे सब अपनाना चाहते हैं. जिसकी अंतिम परिणिति यह होती है की हम किसी तंत्र के व्यक्ति बनते जाते हैं न की आज़ाद होते हैं. हमारे तर्क किसी तंत्र से नियंत्रित होने लगते हैं. हमारी बौद्धिक जागरूकता किसी तंत्र की बनकर रह जाती है.

हम इंजीनियर, डॉक्टर, आईएएस, न्यायाधीश, नेता आदि के महत्व को पूर्व निर्धारित तांत्रिक अवधारणाओं से आगे निकलकर नहीं सोच पाते और न ही समझा पाते हैं शिक्षा के महत्व को. हमें शिक्षा आज़ाद करने की बजाए तंत्र का आदमी बना देती है, इस प्रवृत्ति से हमें बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है.

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लेख को अविनाश द्विवेदी ने एडिट किया है.

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