भारतीय समाज में प्रेम करना एक कठिन क्रिया है। हम एक दूसरे को देखते हैं, जानते हैं, समझते हैं और प्यार करते हैं।जबकि समाज हमे देखता है, घूरता है और मारता है। प्रेम की हत्या होती रही और वह पनपता रहा। वह पसर गया था पीढ़ियों के अस्तित्व पर। वह हमारे सपनों में घुस गया था लेकिन शीघ्रपतन का शिकार हुआ हमारा समाज। चुनौती साहस देती है। कठिन के दौर में लोगों ने प्रेम किया, उसे दर्ज़ किया और उसे पढ़ा। इसी परंपरा से विरासत में हमे कुछ बेहतरीन किताबें मिली हैं जिसमे प्रेम है, उसके रंग हैं और उसमे डूबते-उतराते हम हैं। पढ़िये… डूबिये… पार उतरिये 

खुसरो दरिया प्रेम का सो उल्टी वाकी धार!
जो उबरा सो डूब गया; जो डूबा वो पार !!


 

दीवार में एक खिड़की रहती थी

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विनोद कुमार शुक्ल

बागबान फिल्म का एक दृश्य याद आता है जहाँ अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी को वेलेंटाइन विश करते हैं। एक दाम्पत्य जीवन का प्रेम दृश्य जो सहज भी है और रोमांचकारी भी। विनोद कुमार शुक्ल जी का उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ एक सामान्य दाम्पत्य प्रेम के जादू की कहानी है जहाँ प्रेम की खिड़की एक समानांतर दुनिया का विकल्प रचती है। भाषा और भाव दोनों स्तर पर यह उपन्यास हिंदी की बहुमूल्य धरोहर है। यह खुद को नायक के रूप में नहीं, बल्कि आदमी के रूप में देखने की कहानी है। कहानी के अंत में आप जान जाते हैं कि नायकत्व का विलोप ही नायक होने की कसौटी है।

उपन्यास अंश :-

‘धरती आसमान की तरह लगती थी। अंधेरे में सोनसी ने रघुवर प्रसाद के कान में फुसफुसा कर कहा है।

क्या हम अपने आप खिड़की से बाहर जा रहे हैं।

नहीं खिड़की का बाहर अन्दर आ रहा है।

तालाब पहले आया फिर तालाब का किनारा आया।

पगडण्डी पहले आई फिर धरती आई।

तारे पहले आए फिर आकाश आया।

पेड़ का हरहराना पहले आया फिर पेड़ आए।

फिर तेज़ हवा आई।

महक आई।

महक के बाद फूल खिले।

साइकिल खिड़की से बाहर नहीं गई खिड़की का बाहर साइकिल तक आ गया।

पर मैं कैरियर में नहीं बैठूँगी। सामने तुम्हारी बाहों के बीच बैठूँगी।‘ सोनसी ने कहा।

सुबह कमरा नहाया हुआ लग रहा था। कमरे की हर चीज़ धुली हुई लग रही थी।

 

सारा आकाश

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राजेंद्र यादव

शादी के बाद की पहली रात को पति पत्नी के बीच जम गयी चुप्पी को तोड़ने में उन्हें वर्षों बीत जाते हैं। प्यार के तीन शब्दों की बजाय प्यार की पहली अभिव्यक्ति आँसुओं के अनवरत प्रवाह से होती है। रात के अँधेरे में छत पर जब समर और प्रभा एक दूसरे से लिपटकर रोते हैं तो वह अँधेरा पाठक की आँखों में चीख पड़ता है कि यही प्यार है। लेकिन काश प्यार की कहानी केवल प्यार की कहानी होती। वह हमेशा समाज और राजनीति की भी कहानी होती है। सामाजिक वंचना, गरीबी और बेरोजगारी के दुष्चक्र में फंसे परिवार में यह प्यार दम तोड़ देता है। यह उपन्यास 1951 में ‘प्रेत बोलते हैं’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। बाद में अज्ञेय के सुझाव के बाद राजेंद्र जी ने इसे सारा आकाश नाम दिया।

उपन्यास अंश :- “अच्छा क्यों जी ,पत्नी क्या सदैव ही बाधा होती है ?राम की शक्ति को क्या सीता से अलग किया जा सकता है राजपूताने की क्षत्राणियों ने क्या स्वयं ही अपने सुहागों को रण में नहीं भेज दिया था।”

 

सूरज का सातवां घोड़ा

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धर्मवीर भारती

हिंदी साहित्य के आकाश में जब भी प्रेम का नाम पुकारा जायेगा, गुनाहों का देवता का नाम सुनाई देगा। धर्मवीर भारती की कृति ‘गुनाहों का देवता’ आज भी प्यार को जान लेने, उसपर रो लेने के लिए सबसे खूबसूरत खिड़की है। लेकिन धर्मवीर भारती का उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ प्रयोगवादी दृष्टि से प्रेम का बहुरंगी आख्यान है। माणिक मुल्ला की कहानियां, उसे कहानी का नायक भी बनाती हैं और उनसे निरपेक्ष भी। वहां प्रेम जीवन के प्रवाह के साथ बहता, निभता और बदलता रहता है और माणिक मुल्ला को उससे कोई परेशानी नहीं है।

उपन्यास अंश :- “इस रूमानी प्रेम का महत्व है, पर मुसीबत यह है कि वह कच्चे मन का प्यार होता है, उसमें सपने, इन्द्रधनुष और फूल तो काफी मिक़दार में होते हैं पर वह साहस और परिपक्वता नहीं होती जो इन सपनों और फूलों को स्वस्थ सामाजिक सम्बन्धों में बदल सके । नतीजा यह होता है कि थोड़े दिन बाद यह सब मन में उसी तरह गायब हो जाता है जैसे बादल की छाँह । आखिर हम हवा में तो नहीं रहते हैं और जो भी भावना हमारे सामाजिक जीवन की खाद नहीं बन पाती, ज़िन्दगी उसे झाड़-झंखाड़ की तरह उखड फेंकती है।”

 

तुम्हारे लिए

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हिमांशु जोशी

हिमांशु जोशी का उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ नैनीताल के मौसम में घुले हुए प्रेम की दास्ताँ है। नैनीताल में विराग को अनुमेहा से प्यार होता है लेकिन वह अनकहेपन के श्राप से बच नहीं पाता। एक पराजित नायक के रूप में विराग का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। एक आदर्श विद्यार्थी से वह अ-नायक में बदल जाता है। प्रेम को न कह पाने की बेचैनी उसे तोड़ के रख देती है लेकिन कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती। प्रेम में बिछड़ना क्षण होता है और मिलना जीवन। नदी के अविरल प्रवाह की तरह बहती भाषा और कहानी के कारण आप इसे बीच में छोड़ नहीं पायेंगे।

उपन्यास अंश :- मैं तुम्हारी ओर चाहकर भी नहीं देख पा रहा था। इस प्रकार की अतिरिक्त गम्भीरता ने मुझे अकारण घेर लिया था। मैं अभी तक भी बाहर की ओर ही देख रहा था। हवा में हिलती अधमुखी खिड़की से सारा दृश्य साफ़ दिखलायी दे रहा था। आड़ू का छतरीनुमा बौना वृक्ष बारिश की हलकी-हलकी बौछारों से भीग रहा था। पहाड़ी के ऊपरी भाग से घना कुहासा भागता हुआ नीचे की ओर लपक रहा था। अब खिड़की की राह भीतर आने ही वाला था कि तुमने खिड़की का पल्लू तनिक भीतर की ओर खींच लिया था।

टीन की कत्थई छत पर पानी की बौछारों का संगीत साफ़ सुनाई दे रहा था। कहीं बिजली कड़क रही थी। बीच छत से एक पतला तार नीचे लटक रहा था। उसके अन्तिम सिरे पर झूलता एक बीमार बल्ब टिमटिमा रहा था।

तुमने मैथ्य की दो पुस्तकें मेरी ओर सरका दीं।

मैं बतलाता रहा, सिर झुकाये तुम हिसाब बनाती रही। आज्ञाकारी सुशील बच्चे की तरह तुमने एक भी प्रकार अपनी ओर से नहीं पूछा।

 

 

नदी के द्वीप

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अज्ञेय

नदी के द्वीप मुख्यतः भुवन, रेखा, गौरा और चंद्रमाधव की कहानी है जहाँ अंतर्द्वंद और आत्मालाप है। प्रेम, आजादी और बौद्धिकता के प्रश्नों से जूझते यह चरित्र बेहद संवेदनशील हैं। बाहरी दुनिया से अलग एक कहानी का धरातल रचते जान पड़ते हैं। इस उपन्यास की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इस उपन्यास को पढ़ते हुए यह समझ में आता है कि दर्शन और विचार को कहानी के साथ कैसे बांधा जाता है। कहानी के प्रवाह को अवरुद्ध करने की बजाय विचार कहानी को एक सार्थक हस्तक्षेप लायक बनाता है। अज्ञेय के उपन्यास आधुनिकता के उन विचारों से भरे हुए हैं जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

उपन्यास अंश :- रेखा कमरे की ओर शून्य के एक छोटे से वृत्त के बीचोंबीच कुरसी पर बैठी थी। उसका सिर कुरसी की पीठ पर टिका था, पलकें बन्द थी। वह बिजली के प्रकाश से कुछ बच कर बैठी थी, अतः उसका माथा और आँखें अँधेरे में थी, बाकी चेहरे पर आड़ा प्रकाश पड़ रहा था जिससे नाक, ओठ और ठोड़ी की आकार-रेखा सुनहली हो उभर आयी थी। और इसी स्वर्णाभ निश्चलता पर भुवन का कौतूहल आकर टिक गया था।

 

पीली छतरी वाली लड़की

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उदय प्रकाश

सामाजिक राजनीतिक संघर्ष के बीच अंकुर की तरह फूटती कहानी है पीली छतरी वाली लड़की। यह एक नीची जाति के लड़के और ब्राम्हण लड़की के बीच पनपी प्रेम कहानी है जो विश्वविद्यालय में घटित होती है पर यह विश्वविद्यालय हमारे समाज का प्रतिनिधि बन कर खड़ा हो जाता है जहाँ जातिवाद है, नफरत है, हिंसा है और संकीर्णता है। प्रेम का मनोविज्ञान, प्रेम को आकार देता है और वही इसे अंत भी देता है। यह हमारे समय की एक बेहद जरुरी किताब है।  उदय प्रकाश राजनीतिक रूप से एक सजग लेखक हैं जिनकी रचनाएँ हमे जागरूक करती रहती हैं।

उपन्यास अंश :- राहुल ने गुलेल में कागज़ की एक गोली बनाकर रबड़ कान तक खींचा और सटाक ! कागज की गोली माधुरी दीक्षित की पीठ पर जाकर लगी.

उई…ऽ एक मीठी-सी संगीत में डूबी हुई उत्तेजना पीड़ा भरी आवाज़ पैदा हुई और गर्दन मोड़ कर उस हिरणी ने अपने शिकारी को प्यार से देखा.

थैंक यू राहुल ! फॉर द इंजरी ! ….आय लव यू,

कसप

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मनोहर श्याम जोशी

कहानी में जब मध्य वर्ग के प्रेम का ज़िक्र आता है तो कहानी कसप के पास चली जाती है। मनोहर श्याम जोशी ने कुमाऊँनी भाषा का नाजुक प्रयोग कर कसप को एक खूबसूरत आवाज दे दी है जिसे हम सभी जब भी सुनते हैं, मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। कसप का अर्थ होता है ‘क्या जाने’। शायद प्यार के बारे में जब भी किसी से पूछा जायेगा, उत्तर ‘कसप’ ही होगा। रिश्ते बंधन रचते हैं और उनके बीच प्रेम पनपता है, अपने लिए जगह बनाने की कोशिश करता है, संघर्ष करता है और अंततः अमर हो जाता है। डीडी और बेबी हमारे आसपास के किरदार हैं। उनका प्रेम हमारे बीच का प्रेम है जो नाजुक है और खूबसूरत।

उपन्यास अंश :- तुम भी यही सोचते हो, मैत्रेयी की शादी हो जानी चाहिए अब ? बदनामी से बचने का इसके अतिरिक्त कोई उपाय नही ठहरा? शादियाँ बदनामी से बचने को की जाती हैं ?”

चित्रलेखा

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भगवती चरण वर्मा

यह उपन्यास एक यात्रा है जहाँ आप एक योगी को भोगी बनते देखते हैं और एक भोगी, योगी बनकर आपको आश्चर्य में डाल देता है। पाप-पुण्य के द्वन्द का विचार इस उपन्यास की कहानी की अंतर्धारा में चलता रहता है। आप पाते हैं कि पाप पुण्य कुछ नहीं होता। मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है। चित्रलेखा पर फिल्म भी बन चुकी है।

उपन्यास अंश :- ‘चित्रलेखा हँस पड़ी – ‘आत्मा का संबंध अमर है! बड़ी विचित्र बात कह रहे हो बीज गुप्त! जो जन्म लेता है, वह मरता है, यदि कोई अमर है तो इसलिए अमर है, पर प्रेम अजन्मा नहीं है। किसी व्यक्ति से प्रेम होता है तो उस स्थान पर प्रेम जन्म लेता है। …प्रेम और वासना में भेद है, केवल इतना कि वासना पागलपन है, जो क्षणिक है और इसलिए वासना पागलपन के साथ ही दूर हो जाती है, और प्रेम गंभीर है। उसका अस्तित्व शीघ्र नहीं गिरता। आत्मा का संबंध अनादि नहीं है बीज गुप्त!’

मछुआरे 

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तकषी शिवशंकर पिल्लै

तकषी शिवशंकर पिल्लै का उपन्यास चेम्मीन मलयालम भाषा की एक प्रसिद्ध कृति है। जिसका 19 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस उपन्यास की कहानी पर 15 देशों में फ़िल्में बनायीं गयी हैं। केरल के मछुआरा समाज की दुनिया में पल-बढ़ रहे प्रेम को सामने लाती यह उपन्यास यथार्थवाद की जमीन पर जादुई प्रभाव छोड़ता है। परीकुट्टी और करुत्तम्मा के बीच का प्रेम समंदर से लिपट जाता है। एक अनंत है उनके प्यार में। इसी उपन्यास के ऊपर लिखी अपनी कविता में विहाग वैभव लिखते हैं :

परीकुट्टी ने करुत्तम्मा से अथाह प्रेम किया /  और समुद्र में तूफ़ान आ गया।

उपन्यास अंश :- करुत्तम्मा का यौवन मानो जाग उठा था और प्रतिक्षण पूर्णत्व की ओर बढ़ रहा था। परी की नजर अचानक जब करुत्तम्मा की छाती पर जा टिकी था तब उसे लगा उसका सारा शरीर सिहर उठा है। क्या इसी से हँसी की शुरूआत हुई थी ? करुत्तम्मा एक ही कपड़ा पहने हुए थी वह भी पतला !

परीकुट्टी को लगा कि करुत्तम्मा नाराज होकर चली गई। उसे भी डर लगा कि करुत्तम्मा फिर उसके पास नहीं आयेगी।

परी ने सोचा कि वह करुत्तम्मा से माँफी माग ले और उससे कह दे कि फिर ऐसी गलती नहीं होगी।

दोनों को एक दूसरे से क्षमा माँगने की ज़रूरत महसूस हुई।

 

वे दिन 

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निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा का नाम लेते ही एक सनसनाता एकांत मन को घेर लेता है। धूप का गुनगुना सा हिस्सा हमारी साँसों में ढल रही है हवाओं में घुल जाता है। सड़क के किनारे पड़ी हुई रात की पड़ी हुई पत्तियां खड़खड़ा उठती हैं। और मन में एक लहर उठती है जिसकी धुन गूँजती रहती है लगातार। निर्मल जी के उपन्यास व्यक्ति के खुद के जीवन की कहानी हैं। वहाँ घर भी है और बाहर भी। पर बाहर उतना ही है जितने में एक घर की खोज की जा सके।

अपने उपन्यासों में एकांत के द्वन्द और संगीत को दर्ज करने में उन्हें महारत हासिल थी। जीवन, कथा और आस्था के बीच का फ़र्क़ इतना कम है कि निर्मल का सम्पूर्ण अस्तित्व एक महान रचना के रूप में सामने प्रकट हो जाता है। ‘वे दिन’ प्रेम की एक नयी छवि को कहानी देने वाला उपन्यास है जहाँ यात्रा है, प्रेम है, दुःख है और जीवन है।

उपन्यास अंश :- ‘‘सुनो !’’ अँधेरे में किसी ने मेरा नाम फुसफुसाया है। मेरी काँपती अँगुलियाँ दीवार पर टिकी रहती हैं….सच बताओ….क्या तुम बिल्कुल विश्वास नहीं करते ?

यह आवाज़ उसकी है। कितनी बार उसने उसे सुना है।

लगता है, उसके चले जाने के बाद भी यह आवाज़ पीछे छूट गई थी-अपने में अलग और सम्पूर्ण। मैं खिड़की खोलता हुआ डरता हूँ……दरवाज़े पर भी कोई दस्तक देता है, तो मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगता है……लगता है, ज़रा-सा भी रास्ता पाने पर यह आवाज़ बाहर निकल जाएगी और मुझे पकड़ लेगी। मैं कब तक उसे रोक सकूँगा-अधीर-आग्रहपूर्ण, आँसुओं में भीगी उस आवाज़ को, जैसा मैंने उसे रात की अकेली घड़ी में सुना था ?

प्रेम को पढ़ना, प्रेम में होने जैसा है। इसीलिए तो चन्दर, सुधा, विराग, प्रभा, समर सब अपने लगते हैं। कभी हम खुद को देखते हैं पन्नों में दर्ज़ होते हुए। तो कभी हमारा दोस्त हमारे बदल से प्रेम के शब्द थामे गुज़र जाता है। वह छोड़ जाता है, उस पढ़े-सुने जाने की स्मृति जो हमे ज़िंदा रखती है, हिंसा से भरी दुनिया में…


यह लेख पियूष रंजन परमार ने लिखा है.

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