प्रिये साथी!

तुम जानते हो मुझे आये दिन बेवजह ही प्रेम में पड़ जाने की आदत है। मैं एक घुमंतू प्रेमी हूँ। जिसे घूमते भटकते लोगों से प्रेम हो जाया करता है। यह प्रेम बहुत लंबे समय तक नही टिकता।यह घुमंतूप्रवृत्ति हमे लम्बे समय तक किसी स्थायी प्रेम में रहने की इजाज़त नही देती। वास्तव में इन संदर्भों में प्रेम शब्द का इस्तेमाल भी करना प्रेम के अर्थ को संकुचित करना है।

प्रेम सम्भवतः सम्मोहन, लगाव, जुड़ाव, परवाह, दुलार, उत्तरदायित्व और कर्तव्यबोध आदि भावनाओं का सामूहीकृत रूप है। पर बहुधा ही हम इनमे से किसी एक भाव की उपस्थिति को भी प्रेम का नाम दे देते हैं। ये वास्तव में हार्ड कोर प्रेमियों के साथ बड़ा अन्याय है कि हम जैसे घुमंतू लोग भी उनकी श्रेणी में शामिल हो जाएं या उन्हें जबरन अपनी श्रेणी में घसीट ला खड़ा करें। जबसे मैं भटकन के राजीव चौक से प्रेम के इंद्रप्रस्थ पर आई हूं तब से महसूस होता है कि पर्याप्त अंतर होना चाहिए घुमंतू प्रेमियों में और हार्ड कोर प्रेमियों में।

बहरहाल, अब तुम्हारे सवाल पर आते हैं कि मैं कैसी हूँ? उससे पहले तुमसे एक सवाल कि जब आक्षेप रूपी हम कोई अनुमान लगाएं और वह पूर्णतः गलत साबित हो तो मनुष्य की पहली प्रतिक्रिया क्या होती है? वह सर्वथा अस्वीकार कर देना चाहता है उस स्थिति को ही। ठीक यही हमारे सम्बन्ध में होने वाला है। तुम्हारे सवाल के प्रत्युत्तर में तुम्हे यह आशा और अनुमान होगा कि मैं ठीक हूँ और सम्भवतः इन दिनों किसी नए प्रेम में हूँ।

इन दिनों शायद शब्द हर बात की धुरी बना हुआ है और मैं इन दिनों अपनी बातों की संदेहात्मक प्रकृति के लिए भी जानी जाती हूँ।मुझे ठीक ठीक किसी भी बात का ज्ञान नही रहता आजकल। अक्सर हर बात के बीच की कोई कड़ी मुझसे गुम जाती है और मैं अधूरी कहानी में ही उलझकर रह जाती हूँ या फिर अचानक ही कोई कड़ी मिल जाती है और मैं एक कहानी मुकम्मल करने की जद्दोजहद में लग जाती हूं।

जैसे तुम्हारा नाम! अक्सर ही किताबों के बीच दबे हुए पन्नों में मिल जाता है। सोचती हूँ तुम्हारे नाम को घुटन नही होती होगी? या फिर ये कि पेंसिल की लिखावट भी कितनी पक्की होती है जो कि सालों बाद भी अभी तक फीकी नही पड़ी । खैर, तुम्हारे नाम के मिलते ही कड़ियों पे कड़ियाँ जुड़ती जाती हैं और कहानी मुकम्मल होती जाती है। अधूरी कहानी।

इन दिनों एक अजीब घटना ये भी है कि मैं कुछ निरर्थक दार्शनिक गणनाओं से गत घटनाओं के सही होने के तुष्टिकरण के दुष्प्रयास में लगी रहती हूं। जैसे कि संसार में कुछ भी अधूरा नही होता। हर चीज की आयु नियत है। कम या ज्यादा। जिसे हम अधूरापन कहते हैं वह भी अपनी पूर्णता में घटित होता है।

कड़ियाँ मिलने के सिलसिले में पहली कड़ी होती है तुम्हारी मुस्कान। जिसपर तुम्हारी मामूली सी छात्रा मुग्ध हो गयी थी और वर्तमान में अतीत के उन्ही सवाल जवाब में उलझ जाती है कि ऐसा क्यों होता है कि कोई बेवजह ही अच्छा लगने लगता है? बेवजह ही किसी से लगाव हो जाता है? कैसे किसी का एकबार खांस देना भी बेहद रंजीदा कर देता है हमें? और क्यों बेवजह ही किसी की फिक्र होने लगती है?

विज्ञान में इसे क्या कहते हैं मुझे नही पता मगर साहित्य में इसे मनसा किसी का नज़दीक आ जाना कहते हैं। सहसा ही बीच की कुछ कड़ियाँ गुम हो जाती हैं और मुझे याद आता है हम दोनों का एक दूसरे के शरीर में उतरना। होटल का कमरा नम्बर 304…

मेरे साथी! तुम्हारे जाने के बाद यह विश्वास दृढ़ हुआ कि एकतरफा प्रेम का मनोविज्ञान बस यही नही कि तुम्हारे बेइंतहां प्यार से वह तुमसे प्यार करने ही लगेगा। एक अन्य स्थिति ये भी है कि तुम्हारा अत्यधिक समर्पण भाव उसे असहज कर सकता है, तुम्हारे प्रेम के उचित अनुपात में बदले में कुछ न दे पाने के अपराधबोध से भर सकता है उसे, और इस अपराधबोध से मुक्त होने के लिए वह तुमसे कट भी सकता है।

तुम्हारे उसी कटाव से मेरी अब तक की नाराज़गी थी।इतनी नाराज़गी कि तुम्हारे कई मिलन के प्रस्तावों को मैंने लगातार खारिज किया।मन में बार बार यह दोहराया कि मैंने तुम्हें माफ नही किया।मैं तुम्हे माफ नही करूँगी। साथी! किसी को माफ न करना खुद को कितनी पीड़ा देने का काम है। बिल्कुल वैसे जैसे कि किसी नामुराद घटना से खुद को आगे न बढ़ने देना। खुद को किसी तंग पिंजरे में कैद किए रखना।

अब जाना है मैंने कि किसी को माफ कर देना खुद को मुक्त कर देना है। प्रेम में एक ईर्ष्या भाव का होना बेहद अनिवार्य तत्व माना गया है। अपने प्रेमी की किसी अन्य प्रेमिका या पत्नी से हमे उसी मात्रा में रश्क होता है जितना कि हमे प्रेमी से इश्क़ होता है। मगर तुम्हारे सम्बन्ध में यह बात अपवाद है। अक्सर ही मैं कोई बेहद ज़रूरी काम छोड़कर ये गाने लगती हूँ कि “हम तुम कितने पास हैं,कितने दूर हैं चाँद सितारे”।

इस गाने का वास्तविक सन्दर्भ तो यह है कि यह तुमने अपने विवाह से पूर्व अपनी पत्नी के लिए गाया था। लेकिन मेरे लिए इस गाने का सन्दर्भ बस इतना होता है कि होटल से लौटते वक्त हम दोनों की बातचीत में अचानक ही ये गीत तुम गुनगुनाने लगते हो। तुम्हारे सम्बन्ध में प्रेम के आगे मेरी ईर्ष्या गौड़ हो जाती है।गाने का वास्तविक सन्दर्भ मुझे याद न आकर तुम मुझे याद आते हो। वास्तव में होना भी यही चाहिए कि भले राग और द्वेष का वजन समान हो लेकिन राग का कद हमेशा द्वेष से बड़ा होना चाहिए। बहरहाल, प्रेम का यह बहीखाता यहीं स्थगित कर के तुम्हारे खत का जवाब देने की कोशिश करती हूँ।

यहां ज़िन्दगी एकदम पंच सितारा है।बड़ा आराम है यहां।मेरी महात्वाकांक्षाओं को हमेशा इतने ही भौतिक सुख सुविधाओं की चाहत थी।पहाड़ों का एकांत भी है यहां।मगर कई बार झुंझलाहट भरी ऊब होती है इन चीजों से। अब लगता है कि अमीर बड़े मंजे हुए शायर थे जो इतना सटीक फ़र्माते थे कि “हर बात में लज्जत है, अगर दिल में मज़ा हो।”

एकांत तो वैसे भी भीड़ के परिप्रेक्ष्य में गठित कोई सम्प्रत्यय है पर निरी नीरवता में एकांत, एकांत नही, अकेलापन होता है। माहे मोहब्बत का यह अकेलापन भीतर ही भीतर चीख रहा है और लोग मेरे चेहरे पर मौन व गम्भीरता पढ़ते हैं।

साथी! मैं आऊंगी अबकी मिलने तुमसे।तुम्हारे शहर दिल्ली। ताकि हमारे बीच की कुछ उदासी मुक्त हो सके।
सस्नेह

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यह खत मेदिनी पांडेय ने लिखा है. वह दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा रही हैं. मेदिनी साहित्य और समाज शास्त्र में खासी रूचि रखती हैं.
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