वे लोग और हैं जो अब मुहब्बत नही करते. जिनकी आँखों मे अब किसी का इंतज़ार नही है. जिनके होठों पर कोई शायरी नही है. जिनकी डायरी के पन्नो पर अधूरी कवितायें नही है.जिनके गीतों में किसी का ज़िक्र नही है। शायद वे मानते हैं कि इश्क़ में जिंदगी तो है पर इश्क़ से कोई ज़िंदगी नही है। जिंदगी की जद्दोजहद में उन्होंने अपने इश्क़ को वहीं छोड़ना बेहतर समझा जहाँ से उन्होंने इसकी शुरुआत की।

अब इश्क़ का कोई महीना नही है। अब रह गयी है सिर्फ एक याद जिसकी तस्वीरों में आज भी दिख जाती हैं कभी कभी मोहल्ले की गली और बाजार के चौराहे से गुजरती हुई प्रेमी जोड़ों की बेचैन आँखें। इस भीड़ में वह इश्क़ न जाने कहाँ गुम हो गया पता भी नहीं चला। अफ़सोस इस बात का है कि किसी ने भी उसको ढूंढने की कोशिश तक नहीं की। सालों पहले किसी दिन इस शहर ने उनके इश्क़ को भुला दिया और शामें उदास रहने लगीं। मुहब्बत को बंद कर दिया जाता था। उसका इंतज़ार बच जाता था। लेकिन मोहब्बत उन दिनों सीमाओं में कैद रहकर भी आज़ाद हुआ करती थी। उनदिनों हवाओं में बेचैनी नही थी। मोहब्बत के फूल उनदिनों सूखते नही थे।

आज मोहब्बत किताबों में छिपे गुलाब से शुरू नही होती बल्कि ये वीडियो चैट से शुरू हो जा रही है। प्रेम हमारे फ़ोन के बीच उलझा हुआ है। यह कितनी जल्दी का प्रेम है न. ना कुछ खोने का गम है ना पाने की खुशी। प्रेम को भी पकना पड़ता है जैसे आम पकता है। ज़ल्दीबाज़ी में अक्सर आकर्षण के कच्चे अनुभव को प्रेम समझा जा रहा है। अब प्रेम के पकने का इंतज़ार अब कोई नही करता।

इश्क़ एक धीमी साँस है।एक धीमा संगीत है। फुसफुसाहट है। एक खुशनुमा साँझ है जिससे जीवन की भोर खिलती है। उन लोगों ने जिन्होंने अब इश्क़ को कहानी मान लिया है वो अब एक मशीन की तरह ज़ीने लगे हैं। उनके जीवन मे घड़ी सबसे जरूरत की चीज़ है। उनके जीवन मे पैसा ही भूख है। उनके जीवन मे इश्क़ अब बस एक ख़्वाब है जो कभी हुआ था उन्हें भी। इश्क़ करना इसलिए भी छोड़ दिया गया क्योंकि गलत इंसान से सही उम्मीद की गयी। विरह की शाम आयी, वेदना की नदी भी और पूरे इश्क़ को ही फ़िज़ूल कह दिया गया। इश्क़ करना इसलिए भी भुलाया गया क्योंकि काँधे पर ज़िम्मेदारियाँ लाद दी गईं। पैरों को जब बाँध दिया जाने लगा तब से ही इश्क़ उनकी ज़िंदगी से खो गया।

वो लोग जो अब इश्क़ नही करते बेपरवाह नही है, अब वो समझदार हैं। इतने समझदार हैं कि अब वो घुटन को अपना नसीब समझते हैं। वो अपनी दुनिया मे खुद से बने गुलाम हैं।

मैं उनको कहना चाहता हूँ प्रेम ही तुम्हे आज़ादी दे सकता है। मुक्त होने के लिए प्रेम की ज़रूरत है। प्रेम कोई खेल नही है जिसमे हार जीत हो। प्रेम तो एक यात्रा है जो अनंत तक जाती है। प्रेम सृजन है अपनी ही ज़िंदगी का सृजन। प्रेम कभी घुटन, अवसाद, नशा नही है। प्रेम तो एक सुबह है जिसकी ओस में हमारी जिंदगी चमक उठती है। प्रेम वो आईना है जिसके सामने खड़े होकर हम जानते हैं कि हमारे होने का एक मतलब है। प्रेम सृष्टि के अस्तित्व में है जिसके बगैर हम सब अधूरे हैं। प्रेम वो भाव है जो जीवन यात्रा के पलों को ज़िंदगी देता है।
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यह लेख आशुतोष सिंह ने लिखा है. आशुतोष का नाम लेते ही बनारस याद आता है। ‘इश्क़ में लंका होना’ इनकी चर्चित फेसबुक सीरीज रही है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र हैं। बनारस का अख्खड़पन खून में घुल-मिल गया है।

चित्र साभार : पियूष कुँवर कौशिक

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