प्रिय साथी,

मनुष्य जितनी व्याकुलता से किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करता है जो उसे तत्परता से सुन सकता हो या जिससे वह बोल सके, उतनी ही अकुलाहट से मनुष्य किसी ऐसे व्यक्ति की भी तलाश में लगा रहता है जिसके साथ वह लम्बे समय तक चुप रह सके.

वह मुझे मेरे जीवन में तब मिला जब प्रेम में बहुत बातें कर के मै खाली हो रही थी। जब दर्जनों प्रेम से गुजरने के बाद भी मेरे भीतर की कोई तह अनछुई ही रह गयी थी। उसे चाहना इश्क़ की तमाम रवायतों के खिलाफ एक सख्त आंदोलन था। आखिर संसार का कोई भी समाज इस बात को बहुत जायज़ नही ठहराता कि पहले से स्थापित एक सुंदर प्रेमिल भवन के ठीक सामने प्यार की एक उदास इमारत का बेवजह ही शिलान्यास कर दिया जाए।

किंतु यह भी तो सत्य है कि दुनिया के तमाम अजायबघर इस बात के गवाह हैं कि अजीबाहट और अजूबों का भी ससम्मान अस्तित्व बना रहना चाहिए। फिर इसमें क्या हैरत या दलील की आवश्यकता कि मैंने इश्क के प्रेमिल खुबसूरत भवन के ठीक बराबर प्यार की उदास इमारत का शिलान्यास किया।
खैर, पाप पुण्य, जायज़ नाजायज़, के उलझाव में न पड़कर मुझे कुछ छिटपुट बातें करनी हैं तुमसे ।बहुत सामान्य और मामूली बातें। कुछ दिनों पहले मैं शहर की सैर के लिए निकली थी।यही अपना शहर। वास्तव में ये कोई सैर नही थी। यह खोज थी।शहर के उन गुम कोनों की जो भव्यता के बीच कहीं दयनीय हालत में पड़े हुए हैं। जानते हो संसार में कितनी ही गुम हो गयी चीजें बरसों से इस इंतज़ार में हैं कि कोई उन्हें ढूंढ लेगा।कितने ही एकांत स्थल किसी प्रेमी जोड़े के प्रेम से महक जाने को प्रतीक्षारत हैं।

इन्ही जगहों के लिए ज्ञानेन्द्रपति कहते हैं कि “वहां उगी है घास, वहां चुई है ओस, वहां किसी ने निगाह तक नही डाली है।” ऐसे ही एक कोने को तलाशा है मैंने। एक एकांत को – जैसे शहर का दूसरा छोर, यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन के पास का किनारा. जब जीवन की निरुद्देश्यता प्रबल मालूम हो रही थी. जब दिन के सन्नाटों में भी अपनी ही साँसों का शोर परेशान करने लगा था, तो मैं अचानक यहां आ गयी थी. यह ‘अचानक आना ’ अब ‘रोज की भटकन ’ में बदल गया हैं.

जब मैं यहाँ आती हूँ, मुझे लगता है, मैं आई हूँ – खाली पड़े ट्रेन के डिब्बों, कागजों, चिह्नों, पत्थरों और बेतरतीबी से उगी कंटीली झाड़ियों की जासूसी करने। एक बहुत सोचने वाला व्यक्ति अक्सर ही इस सवाल में उलझा पाया जाता है कि यदि उसका वजूद ही नही होता संसार में तो क्या हो रहा होता आसपास? या फिर यदि वह कोई अदृश्य द्रष्टा होता तो कैसा होता? एक अदृश्य द्रष्टा बनने के लिए ही मैं इन खाली पड़े ट्रेन के डब्बों के बीच आ जाया करती हूं।

एक रोज़ इसी एकांत में किसी बहुत दुबले फटे हाल व्यक्ति, सम्भवतः जिसके बाल महीनों से नही धुले, और जिसने अपने साइज से काफी बड़ी शर्ट पहनी हुई है ,को इन्ही डिब्बों के पीछे अकेलेपन में उपजी वासना को शांत करते देखा। उसकी उत्तेजना और वेदना का बिल्कुल सटीक अनुमान उसके हाथों की रफ्तार से लगाया जा सकता था। मेरा मन दोनों ही चीजों के लिए व्यथित हुआ।

यह निर्जन कोना कितना अभिशप्त है .कितना अकेला है. इसके हिस्से में समाज की कितनी परित्यक्त भावनाएं आयी हैं. यहां से मोहब्बत की महक नही अकेलेपन की सड़ांध आती है। संसार की उत्पत्ति ही संसर्ग का परिणाम है तो यह व्यक्ति किसी साथी के दारिद्र्य में क्यों है?
इन सभी बेचैनियों से बचने के लिए मैं वहां से वापस मुड़ी। उस एकांत में पटरियों पर एक खाली मालगाडी भी खड़ी रहती है .मालगाड़ी के एक डिब्बे पर कोयले से चित्रित एक दिल दिखा। जिसके आरपार एक तिर्यक तीर था ।जिसमे दिल के ऊपरी हिस्से पर रोमन लिपि का वी और निचले हिस्से पर जे लिखा है। मन अब थोड़ा आश्वस्त हुआ कि यह एकांत भी प्रेमाभिव्यक्ति का आंशिक गवाह है.

खैर,यह खत तुम्हें महज मेरे अजीबाहट से परिचित कराने के लिए नही लिखा गया। आदतन मैं मुख्य विषयवस्तु से भटक कर औनी पौनी बातें करने लगती हूँ। ये एक प्रकार का मेरे खालीपन का नियोजन है।खालीपन यानी रिक्तता।आंतरिक रिक्तता।– जिसे मुझमें यह एकांत और भर रहा है. शहर का यह एकांत –मेरा प्रेम

वास्तव में अलगाव से जन्मे खालीपन के पलों में हमें वे बातें भी याद आने लगती हैं जो जुड़ाव के समय पर हमें बहुत मामूली, छोटी, या विस्मरणीय सी लगती थी।जिनपर बहुत प्रयास के बाद भी ध्यान जा पाना सम्भव नही लगता था। जीवन के कठिन कामों में कोई भूली हुई बात को सयास याद करना शामिल नही है बल्कि किसी याद आयी बात को भुलाना शामिल है। मेरा चातुर्य अक्सर ही किसी याद आयी बात को भुलाने के लिए औनी पौनी बातें करवाता है मुझसे। वैसे भी शांति और संक्षिप्तता तो संतुष्ट मनुष्य की परिचायक है।किंतु मुख्य बात से भटक कर बातों में बातें गढ़ना तो किसी उदास बेचैन व्यक्ति का लक्षण होता है न?

एक दिन उस एकांत में घँटों ट्रेन के डिब्बों के बीच बैठी रही। उसकी साँसों को सुनती रही.| वह मुझे कहीं नही दिखा। उसकी अनुपस्थिति मुझे मेरा कुछ बेशकीमती खोने का भाव महसूस करा रही थी।जब खाली हाथ वहां से लौट रही थी तो वह मुझे सड़क किनारे शराब पिये लगभग बेहोश हालत में दिखा। तो उसके नज़दीक जा बैठी।

आजकल मैं दुनिया की तमाम लावारिश चीजों को अपनी गोद में समेट लेना चाहती हूं। मैंने उससे सम्वाद किया। उसके कानों की तरफ झुक कर धीरे से कहा “फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें, सर ज़रे-बार-ए-मिन्नत-ए-दरबां किए हुए।” चूँकि वह इतने होश में नही था कि “वाह” कह सके इसलिए इसलिए मैंने बिना वाह सुने ही अपने होंठों से उसके माथे पर शुक्रिया अंकित किया और घर चली आयी। देखो साथी, मैं अब समाज से नकार दिए गये पियक्कड़ों को प्यार से चूमने लगी हों. यह प्रेम की प्रचलित रवायतों के खिलाफ एक आंदोलन ही तो है.
यह मेरा एकांत है. प्रेमिल भवन के ठीक सामने प्यार की एक उदास इमारत.

सस्नेह
मेदिनी।
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यह खत मेदिनी पांडेय ने लिखा है. वह दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा रही हैं. मेदिनी साहित्य और समाज शास्त्र में खासी रूचि रखती हैं.
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