साथियों,

मैं इस लेख में जो कुछ लिखूँगा सच लिखूंगा सच के सिवा कुछ नहीं लिखूँगा। मैं सांप्रदायिक नहीं हूँ इसलिए फ़िल्मी फैज़ल की तरह गीता की, क़ुरआन की ,बाइबिल की, गुरु ग्रन्थ की, त्रिपिटक की सबकी कसम खा सकता हूँ।

फरवरी का महीना। फूल, इश्क़, तितली, रंग -रूमान, जादू, निस्बत , इज़हार, इनकार के दिन। भोर की खुनकियों में महमहाते हरसिंगार के दिन। धूप के दुशालों में छाँव की साँवली दुल्हन को छिपाने के दिन। खुली खिड़कियों के कसमसाने के दिन। सादे गालों पर अबीर की हथेलियों के दिन। लगभग हर फरवरी के होठों से मैंने इसी तरह की बातें सुनी थी, लेकिन इस बार का मिज़ाज और माज़रा दोनों ही अलग था।

यूनिवर्सिटी में प्रेम की अलग बयार होती है। क्लासरूम की तरफ भागते लोगों में एक अलग तरह की ताज़गी होती है। हालाँकि क्लास के बाद विद्यार्थी की हालत 1857 के थके हुए सिपाही से भी ज्यादा बदत्तर नज़र आती है। लेक्चर्स, सिलेबस, नोट्स, असाइनमेंट और परीक्षाओं के बीच फँसा हुआ प्यार, तमाम बंदिशों के बाद भी किताब के पन्नों की तरह खुलता हुआ प्यार। सबकी नज़रों से बचकर किसी पेड़ के नीचे दो लोग कीट्स की कविताओं की सप्रसंग व्याख्या कर रहे होते हैं। वैसे भी प्यार की थ्योरी समझाने का बीड़ा तो केवल विद्यापति के छंदों और कीट्स की कविताओं ने ही सदियों से उठा रखा है। वो तो मास्टर ही होते हैं जो कविताओं का सही मतलब बताने की जगह आत्मा -परमात्मा के मकड़जाल में उलझा देते हैं।

ये सारे दृश्य तो सुबह के होते हैं। दोपहर के बाद और ढलती हुई शामों के दृश्य और भी महबूब -तरीन होते हैं। बस आप नज़र पैदा कीजिये, शौके -दीदार तो हो ही जायेगा। उस शाम मुझे भी दीदार हुआ। मगर वो शौके – दीदार नहीं, शौके -चमत्कार था।

वैलेंटाइन वीक की निगाहों में गुलाबी रंग झिलमिलाता हुआ। शाम की कत्थई उँगलियाँ धीरे -धीरे चाँद को छूने कोशिश करती हुईं । यूनिवर्सिटी का ख़ामोश कमरा। नए -नए प्यार की पहली-पहली आमद। कमरे में बीस -बाइस साल का नया जोड़ा बैठा हुआ है ख़ालिस बैचलर । जिसे ज़िंदगी की जोड़ -घटाने -गुणा -भाग से कोई मतलब नहीं। होना भी नहीं चाहिए। गणित तो वैसे भी बुढ़ापे के लिए होती है जब आदमी निन्यानबे के चक्कर में फँसता है।

जवानी का रहस्य तो केमिस्ट्री और बायोलॉजी में छिपा है और फिजिक्स कभी -कभी ओरिएंटेशन के काम आती है। दोनों के बीच कुछ छिटपुट संवाद होते हैं। पूरी दुनिया में वैलेंटाइन के दिनों में प्रेमी अपनी प्रेमिका को फूल, ग्रीटिंग कार्ड, गिफ़्ट, ईयर रिंग्स देता है लेकिन इस कमरे का माहौल अलग है। यहाँ पर प्रेम की परिभाषा अलग है , ज्ञान अलग है, कल्पनाशीलता अलग है, बेसिकली स्टीरिओ टाइप न होकर थोड़ा हाई -लेवल मामला है।

यहाँ लड़का अपनी प्रेमिका को फूल, ग्रीटिंग कार्ड, गिफ़्ट, ईयर रिंग्स नहीं देता। वो उसे माचिस देता है, वीड देता है, काग़ज़ के टुकड़े देता है | वो उसे पहला किस नहीं अपनी झूठी सिगरेट का पहला दूसरा कश देता है। लड़का, लड़की को ज्ञान देता है -वीड फूंकने के बाद ये मोनोक्रोमेटिक ज़िंदगी रंगीन हो जाती है। हिंदी फिल्मों की तरह हसीन हो जाती है।

दोनों के लिए वैलेंटाइन डे कब वीड-एनर्जी डे में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। दोनों उस शाम के काफिर नशे में डूबते हैं। एक -दूसरे की जिस्मानी चादरों पर प्यार की सिलवटें बनाते हैं। जब तक जिस्म का रेशा -रेशा थक नहीं जाता तब तक प्रेम करते हैं। दोनों के सूखे- पपड़ी जमे होठों पर धुआँ लहराता है।

ये लहराता धुआँ उनकी मुर्दा मुहब्बत की ज़िंदा दास्ताँ है।

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यह लेख देवश तनय ने लिखा है . देवेश आइआइटी मुंबई के छात्र हैं. पढाई के साथ -साथ देवेश कविता को अपनी साथी मानते हैं. इनकी कविताएँ देश की कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं .
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