महात्मा गांधी स्वतंत्र भारत की आबोहवा में लगभग पाँच महीने से कुछ दिन ज्यादा जिंदा रहे। तमाम नेता और सुधारक जिस दिन चमकती दिल्ली में स्वतंत्रता का जश्न मना रहे थे। गांधी उससे कोसों दूर नोआखाली में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों को रोकने कलकत्ता में सुहरावर्दी के साथ थे ‘हैदरी महल’ में रुके थे। नोआखली की प्रतिक्रिया स्वरूप कलकत्ता जल रहा था। स्थितियां विकराल और जटिल होती जा रही थी। अखंड भारत का भूगोल इतना बड़ा था की कराची का असर बिहार में दिखता तो नोआखाली का कोलकाता में। आज़ादी के महीनों पहले से गांधी ऐसी यात्राओं में व्यस्त थे। ऐसे में उन्होंने जिन्ना और नेहरू दोनों से अपील भी की थी कि वह अपने नागरिकों को सुरक्षित रखें।

गांधी देश के तमाम बड़े नेताओं के साथ इस चुनौती पूर्ण माहौल को लेकर सम्पर्क में थे। जब वह कलकत्ता से वापस दिल्ली आए तो उन्हें बिड़ला भवन में ठहराया गया।शाम का वक्त गांधी प्रार्थना में देर से पहुंचे। किसी व्यक्ति ने कहा बापू आज तो देर हो गयी। नियति को भांपते हुए गांधी बोले कोई बात नही इसके लिए ईश्वर मुझे सजा जरुर देगा। किसे पता था की ईश्वर उसके 15 मिनट बाद ही ऐसी सजा सुना देगा जिसके लिए देश तैयार भी नहीं था।

गांधी की हत्या के बाद जिस नथूराम गोडसे की छवि हिंदुस्तान के अखबारों ने छापी। वह हतप्रभ करने वाली थी। पुणे में रहने वाले एक अखबार का सम्पादक, मोटरकार से घूमने वाला युवक, देश के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति का हत्यारा निकला। उस हाड़-मांस की देह का, जिसके लिए विज्ञान के महानायक आइंस्टीन ने कहा था, हमारी अगली पीढ़ियों को विश्वास भी नही होगा की एक हाड़-मांस का आदमी पृथ्वी पर कभी चलता भी था।

एक ऐसा व्यक्ति जिसको ब्रिटिश संसद से लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति भवन तक ने अपने कीर्तिमानों में साथ संजोया। उसको समझने में भारत का युवा गोडसे से इतनी बड़ी भूल हो गई। गोडसे कोई पागल नही था। लेकिन गांधी के उस अबोध शरीर पर गोलियां चलाते वक्त ऐसी कौन सी क्रूरता थी जिसके सामने वह मजबूर था।

यह प्रश्न आज भी गांधी के निधन के 70 साल बाद जस के तस बने हुए हैं। आज भी युवा भारत के हाथों में क्रूरता के हथियार लहराते हुए देखे जा सकते हैं। ऐसे में एक व्यक्ति जिसकी स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक मूल्यांकन हुआ है।उसकी प्रासंगिकता के पीछे कोई न कोई वजह तो जरूर होगी।

इन वजहों को अगर आज देखा जाए तो बातें और स्पष्ट होकर सामने आ जाएंगी। आज जब समूचे विश्व में युद्ध एक उद्योग की तरह पनप चुका है। जिसमें दुनिया के युवाओं को सबसे ज्यादा रोजगार। राष्ट्राध्यक्षों को सबसे ज्यादा निवेश और तीसरी दुनिया के देशों को सबसे ज्यादा नुकसान हासिल हुआ है। हर देश अपनी सीमाओं पर माईन रोप रहा। ऐसे में क्रूरता की सभी हदें पार करने वाले व्यक्ति भी भारत आते समय एक बार राजघाट अवश्य जाता है। चाहें वह इराक और अफगानिस्तान के नरसंहार के जिम्मेदार जार्ज बुश हो या फलीस्तीन के बर्बादी के अधिनायक नेतन्याहू। सबके लिए गांधी एक अनिवार्य प्रार्थना स्थल हैं। जिनके सम्मुख होकर विश्व को अपनी काया के मानवीय होने का सबूत देते हुए दिखते हैं।

‘महात्मा’ टैगोर द्वारा दी गयी उपाधि थी। टैगोर उस समय गीतांजलि गाकर समूचे विश्व के सामने वैश्विक मानव होने का उद्घोष कर चुके थे। गांधी उसी मनुष्य के अंदर अहिंसा के मीटर फिट करने में तल्लीन थे। गांधी देख चुके थे दो विश्वयुद्ध में हताहत युवकों की आबादी। जापान से लेकर अमेरिका तक के हादसे से उनके विशाल हृदय को कचोट रखा था। अपने समय मे उन्होंने भारत में ही भगत सिंह और सुभाष जैसे उत्साही लोकप्रिय युवाओं को भी देखा। कुछ लोगों को लगता है कि गांधी इनकी लोकप्रियता से भयभीत थे। ऐसे में उनको एक बार गांधी पर किताबें न सही कुछ लेख तो अवश्य पढ़ने चाहिए।

गांधी का भय इन युवाओं से नही था। उनको भय था इन युवाओं के अंदर उमड़ रही रोमांटिक अराजकता से। वे हिटलर और मुसोलिनी को देख चुके थे। ऐसे में उनके सामने यह भय तो था ही कि इस देश के युवा भगत सिंह को अपना हीरो मानते हैं। यह मुख्यधारा और लोकप्रियता का द्वंद था जो आज भी हमें देखने को मिलता है। गांधी के लिए हिंसा और प्रतिक्रियावादी होना युवाओं के मनोवृत्ति को कमजोर करने जैसा था।

गांधी को पता था की युवाओं के बाजुओं में सुलगते ईंधन का उपयोग कुछ पेशेवर शातिर कभी भी कर सकते हैं। ऐसे में उन्होंने प्रतिरोध के लिए असहयोग और सविनय अवज्ञा का रास्ता चुना। उनको पता था की अगर पिस्तौल और बम से देश को आज़ाद कराने का प्रयास किया जाएगा। ऐसे में बस निजाम बदलेगा लेकिन हिंसा का स्वरूप वही रहेगा।

भारतीय जनतंत्र के लिए असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों की जरूरत है रक्तपात की नही। इसेगांधी से बेहतर उस समय समझने वालों की संख्या सीमांत गांधी जैसे कुछ बुजुर्ग लोगों तक ही सीमित थी।

आज जब कासगंज में गणतंत्र दिवस के दिन किसी किशोर की हत्या हो जाती है। देश के अतीत के अल्बम से ऐसे ही किशोरों और युवाओं की तस्वीर सामने आती हैं। बेरोजगारी, अशिक्षा से पगे जवानों का एक धड़ा असलहा और त्रिशूल के रास्ते धर्म की सत्ता के लिए मारे जा रहे हैं। शहरों में गांव विसर्जित होते जा रहे। ऐसे में गांधी की अहिंसा और उनकी सामाजिक आर्थिक इकाई गांव फिर से प्रासंगिक होते हुए दिखाई देते हैं।

गांधी की प्रासंगिकता उनकी दूरदृष्टि के कारण और व्यापक हो जाती है। आज जब देश मे गोरक्षकों के नाम पर उत्पात और खून खराबा बढ़ रहा। गांधी ने उस समय कहा था। जब भी हमने ज़िद की तो गोकशी बढ़ी। उनकी राय में गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा थी। और ऐसी सभा का होना गांधी लिए बदनामी की बात थी।

आज समूचे विश्व मे बढ़ रही हिंसा के समानान्तर देश मे नस्लीय भावनाएं जागृत हो रहीं। युवाओं के बीच गोडसे को प्रचारित किया जा रहा। धर्म और धर्मान्धता के लिए गोरक्षक और बजरंग दलों में बेरोजगार युवाओं को बरगलाया जा रहा है। जंगी जहाजों, टैंकों को देश की ताकत बताया जा रहा। ऐसे में महात्मा हमारे सामने आज भी एक कसौटी की तरह खड़े हैं। हम जब भी अपनी मनुष्यता से पशुता की तरफ जाने लगेंगे हमें महात्मा के सम्मुख खड़े होकर प्रार्थना करनी पड़ेगी। देश की ब्रांडिंग की ब्रांडिंग की आजकल राजनेता बात कर रहे हैं। पर इन नेताओं को अपनी और देश की ब्रांडिंग से पहले मन और मानवीयता को ध्यान में लाना होगा। यह ध्यान उन्हें जनता के हृदय में उतरने में मदद करेगा। क्योंकि देश कोई ब्रांड का रैपर नहीं है। यह जनता के श्रम और आस्था से निकली महात्मा की विरासत है। इसको सम्भालना किसी ब्रांड के बस की बात नहीं।

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यह लेख आर्य भारत ने लिखा है. आर्य भारत काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. इसके बाद इन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. अपनी ओजपूर्ण शैली के लिये ख्यात आर्य वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं.

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