ये सवाल जितने लोगों से आप पूछिए उतने जवाब आपको मिल जाएंगे. कोई इन्हें बेचारा कहेगा तो कोई गरीबी के नाम पर बैठे-बैठे पेट भरने वाला. कोई इनके मां-बाप को दोष देगा तो कोई सरकार को. तमाम तरह के विमर्श इन्हीं के सामने होते रहते हैं और ये बच्चे अपना काम करते रहते हैं.
कठफोड़वा की टीम ने इन्हीं सवालों का जबाब उन्हीं बच्चों से जानने की कोशिश की. जनरल की बोगी में यात्रा करते हुए इन जैसे कई बच्चे सफर में आते गए और कोई पत्थर बजाकर मांगता निकल गया तो कोई सुरीली आवाज में संवेदनशील गीत गाकर हाथ फैलाता गया.
आपको भी अक्सर सफर में ऐसे कई बच्चे मिलते होंगे, और उन्हें देखकर दया दिखाते हुए कई बार हम पैसे निकाल कर दे देते हैं और कई बार इंकार के भाव में सिर हिला देते हैं. लेकिन अक्सर एक बात मैंने हर बार नोटिस की है कि लोग चर्चा करने लगते हैं. कोई इसे इंडिया की समस्या बताकर गहन कारण गिनाने लगता है तो कोई सिस्टम और सरकार के शिकार इन मासूमों पर तरस खाकर एक दो रुपए हाथ में रख देता है.
मैंने हमेशा सोचा है कि ऐसे बच्चों को बैठाकर उनसे बात की जाए और कई बार जब-जब ऐसा किया भी है तो हर बार एक नई कहानी जन्म लेती है.
मुम्बई से आगरा की जनरल यात्रा में इटारसी और भोपाल से ऐसे बच्चों का आना शुरू हो गया. तीन बच्चों से हमने बात की जिसमें से एक की कहानी हम आपके साथ साझा करेंगे.
इस सफर में मैंने समीर और रागिनी नाम के दो बच्चों से बातचीत की है. मैंने उनसे अपनी ओर से सिर्फ सवाल पूछे हैं अपना कोई भी मत या राय जोड़ने की कोशिश नहीं की.
ललितपुर रेलवे स्टेशन से 11 बजकर 34 मिनट पर पंजाब मेल के जनरल डिब्बे के शुरुआती छोर पर दो बच्चे चढ़े. मैं गेट के ठीक सामने वाली ऊपर की सीट पर बैठा था. चढ़ते ही दोनों सहमे हुए गाड़ी के चलने का इंतज़ार करने लगे. जैसे ही यात्रियों का उतरना-चढ़ना बन्द हुआ और गाड़ी ललितपुर स्टेशन छोड़ते हुए झाँसी की ओर बढ़ने लगी, छोटी सी ढोलक पर एक चांटी की आवाज़ सुनाई दी. करीब आठ साल के लड़के ने अपने गले मे लटकी ढोलक में एक डंडी से एक धुन बजानी शुरू की और अपनी 3-4 साल की छोटी बहन को आगे बढ़ने का इशारा किया.
छोटी बच्ची सहमती हुई भीड़ के बीच जगह बनाती हुई, अपने हाथ मे लिए स्टील के गोल घेरे में से अपने शरीर के हिस्सों को पिरोने लगी. उसने पहले अपने हाथों से पिरोते हुए उस गोले को शरीर में से होकर पैरों से निकाल दिया.

उसे इससे ज्यादा करतब नहीं आते थे इसलिए उसने एक दो बार इसे ही दोहराकर सकुचाई आंखों से भाई की ओर देखा. भाई ने ढोलक बन्द करते हुए एक कटोरी निकालकर उसके हाथ मे पकड़ा दी और आंखों से इशारा किया कि सबसे मांग लो.
उस छोटी बच्ची ने सकुचाते हुए सबके सामने से कटोरी घुमा दी, किसी ने एक सिक्का तो किसी ने दस का नोट रख दिया. उन दोनों ने आगे की सीट के सामने भी वैसा ही किया और डिब्बे के दूसरे छोर पर पहुंच गए.
पूरा डिब्बा मांगने के बाद बीच वाले गेट पर बैठकर दोनों अगले स्टेशन का इंतज़ार करने लगे. मैं उनके करीब बैठ गया और धीरे-धीरे बातचीत शुरू की.
बच्चे ने अपना नाम समीर और बच्ची का नाम रागिनी बताया. दोनों का घर झांसी रेलवे स्टेशन के करीब बसे नटपुरवा मुहल्ले में है. दोनों सुबह झांसी से ट्रेन में मांगते हुए ललितपुर आए थे और अभी मांगते हुए लौटकर झांसी जा रहे हैं. झांसी पहुंचते ही उनका काम पूरा हो जाएगा और वे घर चले जायेंगे. सुबह उन्होंने स्टेशन से खरीदकर रोटी-सब्जी खाई थी अभी दाल-चावल लेकर घर जाएंगे और शाम को बनाकर खा लेंगे.
समीर ने बताया कि घर में मम्मी-पापा के अलावा वह पांच भाई-बहन हैं. अभी माता-पिता बिलासपुर गए हैं और घर में कुछ खाने को नहीं है, इसलिए वह ट्रेनों में मांगने चला आया. समीर ने बताया कि वह तीसरी कक्षा में पढ़ता है और सिर्फ छुट्टी के दिनों में ही मांगने आता है, ज्यादातर रविवार को. पर अभी मम्मी-पापा घर में नहीं हैं और भाई-बहन के खाने को कुछ नहीं था तो उसे आना पड़ा.
छोटी बहन को लाने के सवाल पे समीर कहता है कि ये चली आती है, मैं इसको नहीं लाता पर जिद करती है तो ले आता है.
समीर का एक बड़ा भाई है जो छठवीं में पढ़ता है, समीर प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाता है जहां उसका कोई दोस्त नहीं है. कारण पूछने पर वह बताता है कि सब उससे लड़ते हैं और चिढ़ाते हैं. टीचर भी उससे अलग तरह से व्यवहार करते हैं लेकिन वह पढ़ाई जारी रखना चाहता है.

अचानक मुझे याद आता है कि ठाणे के एक सरकारी स्कूल में जहां में गांधी फेलोशिप के दौरान जाता था, वहां पांचवी कक्षा में एक बच्ची पढ़ती थी, जो स्कूल के बाद लोकल ट्रेनों में भीख मांगने जाती थी. मेरी पहली विजिट में ही कक्षा अध्यापिका ने मुझे पूरी क्लास के सामने उस बच्ची की ओर उंगली करते हुए उसका परिचय दिया था. “…देखो वो लड़की बैठी है न, बहुत चालाक है. स्कूल की छुट्टी होने के बाद लोकल ट्रेनों में मुम्बई तक भीख मांगती चली जाती है. स्कूल आते-जाते भी रास्ते में भीख मांगती है. इसके माँ-बाप भी भीख मांगते हैं .अपने भाई के साथ ये भी मांगती रहती है और स्कूल नहीं आती.”
मैं हैरान था, कक्षा में सब बच्चे मजाक उड़ाते हुए हंस रहे थे और वो बच्ची बेंच में धंसी जा रही थी.
अध्यापिका चली गईं तो मैं उस बच्ची के पास गया. उसने मुझसे बात नहीं की. टीचर के जाने के बाद चिढ़ाने वाले बच्चों को वो तीखे स्वर में जवाब देने लगी. मुझे याद है करीब दो महीने तक लगातार कोशिश करने के बाद उस बच्ची ने मुझसे बात करना शुरू किया, मुझे अपने घर ले गई और स्कूल में सुनाई गई सारी बातें बताईं तो मेरे होश उड़ गए. एक बच्चे के लिए स्कूल ही ऐसी जगह होती है जहां वह अपनी सारी पहचानें छोड़कर खुलकर हंसते खेलते रहना चाहता है. उस बच्ची ने मुझे बताया कि टीचर ने पूरे स्कूल के बच्चों और बाकी टीचर्स को उसके बारे में इसी तरह का परिचय दिया है और इसीलिए वो स्कूल नहीं आती.
मुझे उस बच्ची के याद आते ही समीर की कहानी और गहराई से समझ आई. हालांकि समीर ने बहुत सी बातें मुझे नहीं बताईं, सिर्फ इतना ही कहा कि कोई दोस्त नहीं है, सब लड़ते और चिढ़ाते हैं और टीचर्स भी अच्छे से व्यवहार नहीं करते.
बड़े होकर क्या बनोगे? इस सवाल पर पहले तो वह कहता है, ‘कुछ भी बन जाएंगे’ फिर थोड़ा सोचकर बताता है कि डॉक्टर बनना है. मैंने पूछा ‘क्यों?’ तो वह बोला “ताकि दूसरों की जान बचा सकूं.”
समीर ने पिछले महीने से ही ट्रेनों में मांगना शुरू किया है. इसलिए उसका आत्मविश्वास भी कमजोर है और वह डरा हुआ भी दिखता है. घर में जरूरत थी तो छुट्टी के दिनों में चला आता है.
फिर मैंने उससे पूछा “अच्छा समीर! ये तुम्हें कहाँ से पता चला कि ट्रेनों में ऐसे मांगने से तुम्हें पैसा मिल जाएगा.?”
तो वह बोला “ऐसे ही देख-देख के, उधर हम बिलासपुर स्टेशन पे रहते थे, जब पापा गाड़ियों (रेलगाड़ियों) में पानी भरते थे. तब बहुत सारे बच्चे मांगते थे. तो मैंने भी सोचा मैं भी कर सकता हूँ. यहां मेरे बहुत से दोस्त आते हैं मांगने”
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में ही उनका गांव है जहां से कई साल पहले उसके पिता काम के सिलसिले में झांसी चले आए. समीर के मुताबिक बिलासपुर में सब सूखा है कुछ है नहीं वहाँ. उसके पापा बिलासपुर स्टेशन पर रेलगाड़ियों में पानी भरने का काम करते थे जो बाद में छूट गया. इसके बाद उन्हें और कोई काम नहीं मिला तो वह लोग झांसी आ गए.
समीर कहता है कि उसके पापा काम ढूंढने जाते हैं पर कोई काम नहीं मिलता. समीर ने एक दोस्त से ढोलक खरीदी और सिल्वर का गोल तार ले लिया. उसने खुद से ही बजाना सीखा है और उसकी बहन ने देख-देख कर ये सब करना सीख लिया.
समीर ने ही छोटी की बच्ची के दोनों गालों पर लाल रंग से गोल गोल टीका बना दिया है. उसका मानना है उसके गाल हनुमान की तरह फूले हैं तो लोग उसे हनुमान मान कर पैसे दे दें, इसलिए वह अपनी मम्मी की लाली से उसके गालों पर गोला बना देता है. समीर को एक दिन में मांगते हुए 100 से 200 तक रुपए मिल जाते हैं.
समीर कहता है कि उसे यह काम अच्छा नहीं लगता पर वह इससे नफरत भी नहीं करता. बस जब उसके दोस्त उसे स्कूल में चिढ़ाते हैं तो उसे ज्यादा बुरा लगता है. मांगते हुए उसे लोगों की तरह-तरह की बातों को सुनकर कैसा लगता है? इस सवाल पर वह चुप हो गया.
गेट पर बैठे-बैठे बातचीत करते हुए ही बबीना स्टेशन आ गया और वे दोनों दौड़कर पीछे वाले जनरल डिब्बे में चढ़ गए.

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विनय जीतोड़ मेहनत में विश्वास करते हैं. जीवन में कई पहाड़ उन्होंने इसी मेहनत के बल पर चकनाचूर किये हैं. एटा में जन्मे विनय ने 12वीं तक की पढ़ाई गांव से ही की. आगे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया पर एक साल में लगा कि दुनिया का विस्तार कानून के पार भी है तो अगले ही साल क़ानून की पढ़ाई छोड़कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मीडिया स्टडीज में स्नातक करने चले गये. फिर आईआईएमसी से विज्ञापन और जनसंचार में परास्नातक डिप्लोमा किया और अभी ठाणे में गांधी फेलो हैं. 'तब तक जुटना जब तक बदलाव न आ जाये,' उनका मूलमंत्र है. शायद इसीलिये इतनी सी उम्र में ढेरों सफल सामाजिक प्रयोगों का सेहरा उनके सिर बंध चुका है. खूब घूमना, फक्कड़पन, खुशमिजाज़ी विनय की पहचान हैं. विनय को जानने वाले अक्सर कहते हैं की जीवन और विनय एक-दूसरे के पर्याय हैं. फिर भी विनय आज भी यही कहते मिलते हैं- वो तमाम संघर्ष जो मैंने नहीं किये, मुझसे अपना हिसाब मांगते हैं.

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