गांधी की यादों में डूबी 30 जनवरी, 1 फरवरी को हवा में उड़ा दी जायेगी. इसमें गांधी जैसा कुछ भी नहीं होगा. यह केवल इस साल ही नहीं होगा बल्कि पिछले सालों में होता आया है, और आगे भी होता रहेगा. 30 जनवरी को गांधी की मौत पर मातम होगा और 1 फरवरी को ऐसा जश्न मनाया जाएगा जिसमें गांधी जिस अंतिम व्यक्ति की बात करते हैं उसकी कोई पूछ नहीं होगी.

हम यह नहीं कह रहे हैं कि 1 फरवरी को प्रस्तुत किया जाने वाला बजट भारतीय जनता की भलाई के मंशा से प्रस्तुत नहीं किया जाएगा बल्कि यह जरुर कह रहे हैं की इसमें गांधी की सामजिक-आर्थिक सोच रत्ती भर भी नहीं झलकेगी. गांधी का ग्राम स्वराज अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद दुनिया में मौजूद सभी समस्यायों के समाधान के लिए एक बेहतर आर्थिक मॉडल है. लेकिन फिर भी भारतीय नीति निर्माता इसकी तरफ नहीं बढ़ेंगे. ये लोग मानने के लिए तैयार नहीं होंगे की गांधी के ट्रस्टीशिप से भी कुछ उधार लिया जा सकता है. गांधी एक ऐसे समाज का आदर्श रचते हैं, जिसमें व्यापार पर जोर नहीं होगा. सबकी कमाई अधिशेष के रूप में जमा होगी और सबमें बाँट दी जायेगी, हम यह मानते हैं की यह एक आदर्श मॉडल है, जिसे जमीन पर लागू करना बहुत मुश्किल है लेकिन हम यह भी मानते हैं कि भारत की प्रगतिशील कर संरचना, जिसमें अमीरों से अधिक कर वसूलने और गरीबों को कर ढाँचे से अलग रखने की प्रथा है, उसमें भी गांधी के ट्रस्टीशिप के पुट दिखाई देते हैं. परन्तु परेशानी यह है की असलियत की जमीन पूरी तरह से दरकी हुई है. यह जमीन समाज के रवैये का प्रक्षेपण करती है. इस साल के आर्थिक सर्वे के एक अध्याय का लब्बोलुआब यह है की जिस देश की सरकारें कामचोर होती हैं उस देश के नागरिक कर आदयगी के प्रति मनचोरी दिखाते हैं. इस अध्याय की कुछ पंक्तियाँ इस तरह हैं “भारत में कुल करों में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा न्यूनतम है. आर्थिक और राजनैतिक विकास प्रत्यक्ष करों के अनुषंगी होते हैं. यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर दिया गया तथ्य नहीं है. अन्य देशों के विपरीत भारत में प्रत्यक्ष करों पर विश्वाश की प्रवृत्ति गिरती हुई प्रतीत होती है.” इस पंक्ति की स्पष्टता इस आंकड़े से भी हो सकती है कि व्यक्तिगत आयकर में भारत की मात्र एक फीसदी के करीब की आबादी शामिल है.

गांधी भारत को गाँवों के देश के रूप में रचना चाहते थे. उन गाँवों के रूप में जिनमें स्थानीयता को अहमियत मिल सके. कोई केंद्र की सत्ता बहुत दूर बैठकर लोगों पर राज़ न करें. आज़ाद भारत के तात्कालीन माहौल की वजह से प्रशासन इस ओर बढ़ने पर डरता दिखा. 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद गांधी की सोच को अमल में लाने की कोशिश की गयी. लेकिन यह भी अब कागज़ी बनकर रह गया है. राष्ट्र का भूत और देश की दिखावटी शान इतनी मजबूत है की लोग न तो स्थानीय शासन के बारे में सोचते हैं और न ही यह समझने की कोशिश करतें हैं कि स्थानीय शासन से ही उनकी समस्याएं पूरी तरह से हल हो सकती हैं. इस साल के आर्थिक सर्वे के आंकड़ें कहते हैं कि ग्राम पंचायतें एक व्यक्ति पर मात्र 999 रूपये खर्च करती हैं जबकि राज्य सरकारें इसकी अपेक्षा प्रति व्यक्ति लगभग 15-20 गुना अधिक खर्च करती हैं. शासन के लिए ‘थिंक ग्लोबली और एक्ट लोकली’ का मंत्र देने वाले गांधी के गाँवों की यह हालत है. बजट में इस कमी को पाटने के लिए कल्याणकारी उपमा लगाते हुए निश्चित तौर पर कोई योजना बनाई जाएगी. क्योंकि यही चलन रहा है. स्थानीय शासन से जुड़े 29 विषय जैसे कृषि और भूमि सुधार, लघु सिंचाई, लघु उद्योग, ग्रामीण संचार, निर्धनता आदि पर खूब योजनायें बनाई जाती हैं. जनता देश के मदहोशी में गुम रहती है. साल भर भाजपा और कांग्रेस करती हैं और स्थानीय शासन से जुड़े इन मुद्दे के प्रति जवाबदेहिता की कमी की वजह से प्रति व्यक्ति केवल 999 रूपये खर्च किये जातें हैं. बाकी पैसा काल के गाल में बवाल मचाने चले जातें है .

इस समय के नीति निर्माता निजीकरण को विकास का पर्याय मानते है. आर्थिक सर्वे ने तो क्रोनी कैपिटलिज्म के मुकाबले क्रोनी सोशलिज्म की बात कर दी है . माने की भाई भतीजावाद केवल पूंजीवाद का मसला नहीं है ,बल्कि समाजवाद का भी मसला है. भारत के आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्मनियम एक इंटरव्यू में कहते हैं कि लाइसेंसी राज में नौकरशाहों को होने वाली कमाई समाजवाद के भाई भतीजेवाद का नायब उदहारण है. और सोशलिज्म के प्रति आग्रह भारत के विकास में सबसे प्रभावी अड़ंगे की तरह काम करता है, इसलिए अगर विकास चाहते हैं तो ओल्ड स्टाइल थिंकिंग माने कि समाजवादी रुख का त्याग कर दीजिये. बिना प्रतिस्पर्धा न ही कोई जीत मिल सकती है और न ही कोई विकास सम्भव है. इस मूलभूत सोच से बनाये जाने वाला भारत का हर बजट गांधी को 30 जनवरी के एक दिन बाद आने वाले 1 फरवरी को हर साल मारेगा. क्योंकि प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता को ही गांधी हिंसक होने का जरिया मानते थे. गांधी अपनी स्वराज की अवधारणा में व्याख्यायित करते हैं- ‘अनियंत्रित इच्छाएं प्रतियोगिताओं को जन्म देती है.’ प्रतियोगिताएं हमेशा कुछ लोग को आगे बढ़ने का मौका देती हैं और बहुतों को पीछे छोड़ देती हैं. ऐसी दशा में हिंसक होने का माहौल हमेशा बना रहता है और अहिंसा को अपना पाना बेहद मुश्किल होता है. गांधी की इस अवधारणा का सत्यापन दुनिया के किसी भी कोने में प्रकाशित असमानता से जुड़ी रिपोर्टों से किया जा सकता है. वह बता सकती हैं कि हमारा हर बजट दुनिया को ऐसे तैसे कैसे भी चलाए रखने का ढोंग है, जिसमें कुछ लोग सम्पन्न होते जातें हैं और बहुतों को मातम के अंधियारे में धकेल दिया जाता है. आखिर कब तक गांधी की तस्वीर नोटों पर छापकर श्रृद्धांजलि देने के दिखावे के साथ यह ढ़ोंग चलता रहेगा.

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खांटी मानवतावादी अजय कुमार समाजविज्ञान और दर्शन की दुनिया से जूझते हुए जीवन बिताना चाहते हैं। कहने के लिए तो इन्होंने अपनी डिग्री bhu से हासिल की है लेकिन खुद की समझ के लिए चर अचर सबकी भूमिका स्वीकारते है। देखना, सीखना और अपना नज़रिया बनाना ही ज़िन्दगी बन जाए इसलिए पत्रकारिता का चुनाव किया। किसी भी विषय को गहराई से समझने-समझाने के समर्थक और घाट-घाट का पानी पीने वाले अजय कुमार राजनीति के जरिये सामाजिक बदलाव की बात में यकीन करते हैं। नो नॉनसेंस पर्सन अजय कुमार किसी साधू की तरह हरदम विचारों की धूनी रमाए रहते हैं.

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