24 फरवरी को JNU एंट्रेंस के परिणाम घोषित हुए। 12 सीटों के लिए हिंदी के कुल 749 उम्मीदवारों में से महज़ 4 चुने गए। यानि सफलता का प्रतिशत मात्र 0.53 रहा। फिर इन चार सफल प्रतिभागियों में से कोई भी जेएनयू का नहीं है। मतलब कि जेएनयू के सभी एमए पास खेत रहे। स्टूडेंट जेएनयू के, परीक्षा जेएनयू की और सभी फेल होने वाले भी जेएनयू के ही, ऐसे में आक्रोश स्वाभाविक था। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की अधिकारिक भाषा बनवाने के मूड में चल रही भारत सरकार के लिए इसे एक बड़ा झटका माना जा सकता है क्योंकि देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू में हिंदी की कमर टूट गई है। आज दो हफ़्ते होने को आए सैकड़ों छात्र रिज़ल्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं और अलग-अलग माध्यमों से पुनर्मूल्यांकन की माँग रख रहे हैं। ऐसे में पहली नज़र में ही धाँधली का अंदेशा होने के बावजूद कार्रवाई का काँटा ज़ीरो से ऊपर नहीं बढ़ रहा है। प्रशासन छात्रों को डिपार्टमेंट की ओर टरका रहा है तो डिपार्टमेंट प्रशासन पर पूरे मामले को डाल कर बचने की कोशिश कर रहा है। न्याय देने को कोई पहल नहीं कर रहा है या मूड में नहीं है। इस पूरे मामले को एक कांस्पिरेसी थ्योरी की मदद से समझने का प्रयास कर सकते हैं, जो इस वक्त कैंपस में स्टूडेंट्स के बीच चर्चा में है-
आमतौर पर हर साल के सितम्बर में होने वाले जेएनयू छात्र संघ चुनावों के ट्रेंड को अगर फॉलो करें तो पाएँगे कि वामपंथ के आँगन में शुरूआती रुझान दक्षिणपंथी एबीवीपी के पक्ष में होता है। बैलेट गिनने का काम जिन दो-तीन दिनों में पूरा होता है उनमें तमाम टीवी चैनल और आजकल के वेब चैनल आंखें गड़ाये रहते हैं कि सम्भावना बने कि वे देश को चौंकाने वाली एक न्यूज़ दें, ‘लालगढ़ के टूटने और भगवा हो जाने की ख़बर’
इन दो-तीन दिनों में बाहर चाहे जो अटकल लगे लेकिन इस रुझान से यहाँ के वामपंथी एकदम नहीं घबराते। ना एबीवीपी के लोग ही रस्मी उत्साह से आगे बढ़ पाते हैं। बाहर से इतर भीतर का हाल भीतर के लोग ही जानते हैं। भीतर वाले जानते हैं कि छात्रसंख्या के हिसाब से विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज़ अभी बाक़ी है। वोट के लिहाज़ से इसका वहीं महत्त्व है जो भारत के संसदीय चुनावों में उत्तर प्रदेश का है। यहीं वो स्कूल है जो रुझानों को दाहिनी ओर से हाँक कर लेफ्ट साईड कर देता है। मतलब कम्युनिस्ट पार्टी के रेल का इंजन यहीं बदलता है और वह दौड़ पड़ती है। इतनी कि नतीज़ों में अपने विरोधी को क़रारी शिक़स्त दे और आधी सदी के इस रेड फोर्ट में एक कड़ी और जोड़ दे।
स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज़ में जैसे कि नाम से स्पष्ट है, भाषा की पढ़ाई होती है। हिंदी से लेकर ज़र्मन और फ्रेंच-इतालवी तक। हालाँकि आधिकारिक तौर पर इस बात की रोक है तब भी तमाम विदेशी भाषाओं के विद्यार्थी बीए में आते ही ट्रांसलेशन वगैरह का काम करके पैसा कमाने लगते हैं। विदेशी भाषाओं से मेरा मतलब विशेष तौर से यूरोपीय भाषाओं और व्यापारिक महत्त्व की अन्य भाषाओं से है। इसी दौरान कुछ तो अच्छा-ख़ासा कमाने लगते हैं। गाँव-देहातों और दूर-दराज़ से आए ये छात्र बाईक/बॉडी और तमाम तरह के उपभोगवादी सुखों की ओर चल पड़ते हैं।
ऐसे में एक लैंग्वेज ग्रुप है जिसे इस तरह से कमाने की सहूलियत नहीं है। उनकी भाषा और साहित्य उन्हें क्रान्ति और पंडिताऊपन की ओर ही ले जाती है। ये समूह है हिंदी-उर्दू-अरबी-फ़ारसी। इन्हें HUPA अर्थात् हुपा कहा जाता है। ये बाक़ी सबसे अलग होते हैं। जेएनयू की हिंदी की बेल जहाँ नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय जैसे ‘मार्क्सवादियों’ के हाथों बोई और फैलाई गई, अपने शुरुआती दिनों से ही पूँजी-बाज़ार और सत्ता-समाज से विद्रोह का झण्डा बुलन्द करती रही है। बाक़ी की तीन भाषाएँ पढ़ने इस देश के उस समुदाय से आते हैं जो दक्षिणपंथी या यूँ कहें तो हिंदूवादी उभार को रोकने के लिए किसी भी अन्य पार्टी का साथ दे सकती है, बशर्ते वह राईट को हरा सकने की स्थिति में हो। तो स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज़ के अन्य छात्रों की अपेक्षा हुपा के लोग कम्युनिस्ट पार्टियों को वोट देते हैं। यहीं एकमुश्त बढ़त लेफ्ट का किला बचा देती है।
संवेदनशील जम्मू कश्मीर, अशांत असम और जातिवादी हरियाणा तक बीजेपी फतह कर चुकी है। बंगाल, तमिलनाडू और केरल लक्ष्य पर हैं। आज जबकि पूरा देश धीरे-धीरे दक्षिणपंथ की प्रतिनिधि पार्टी बीजेपी के शासन में आता जा रहा है ऐसे में जेएनयू पर शासन करना किसी राज्य को जीत लेने से कम महत्वपूर्ण नहीं है। जेएनयू को जितने का मतलब थोक भाव में उस बौद्धिक वर्ग को अपने पाले में करना है जो किसी पार्टी की सत्ता के लिए विपक्ष बन जाते हैं और मुश्क़िलें खड़ी करते हैं। इस विश्वविद्यालय को बनाने वाली काँग्रेस पार्टी ने यहाँ के छात्रसंघ चुनावों को चाहे बच्चों का वार्षिक इलेक्शन समझ कर कभी इसे जितने की गंभीर कोशिश नहीं की हो मग़र बीजेपी इसे पूरी गंभीरता से ले रही है।
राजनीतिक जीत के हिसाब से असम्भव से लगने वाले प्रदेशों को बीजेपी ने न तो राजनीतिक विकल्प बन कर जीता है और ना ही उस जगह के हिसाब से अपने विचारों को छोड़ कर या बदल कर। त्रिपुरा और नागलौंड की जीत काफी हद तक तोड़-फोड़ और लेबल लगा देने की राजनीति की जीत है। ऐसे में जेएनयू में भी बड़े ही बारीक़ तरीक़े से डेमोग्राफी बदला जा रहा है। वर्तमान रिज़ल्ट इसी डेमोग्राफी को बदलने की एक बानगी भर है।

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अंकित दुबे जेएनयू के पूर्व छात्र हैं. उन्होंने यहां से भाषा संस्थान के अंतर्गत ही पढ़ाई की है.

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