सरकार एयर इंडिया की खस्ता हालत की वजह से इसकी 76 फीसदी हिस्सेदारी बेचने जा रही है. सिविल एविएशन मिनिस्ट्री (CAM) ने घाटे में चल रही एयर इंडिया और इसकी दो सब्सिडरी में हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है. एयर इंडिया पर कुल 470 अरब रुपयों का कर्ज़ है. एयर इंडिया की बोली लगाने के लिए न्यूनतम बोली 50 अरब रुपए तय की गई है. नीलामी में भाग लेने वालों को 28 मई को शॉर्टलिस्ट किया जाएगा.
भारत सरकार ने अर्नेस्ट एंड यंग को इस ट्रांजैक्शन के लिए अपना सलाहकार नियुक्त किया है. देश में हर चीज़ का आज निजीकरण किया जा रहा है. कारण हमेशा यही बताया जाता है कि सरकार इसे अच्छी तरह से चलाने में नाकाम है इसलिए यह घाटे में है और व्यवस्थित नहीं है और इसका हल सिर्फ निजीकरण ही रह गया है.
यह निजीकरण हर जगह हो रहा है. यह अपने आप नहीं होता है कि सरकारी शिक्षा संस्थान खराब हालत में है तो निजी कंपनियों के हाथों में आकर इसे संवार दिया जाएगा. यही पूँजीवाद है और यही पूँजीवाद का खेल सरकार द्वारा शिक्षा, स्वास्थ, परिवहन और सभी क्षेत्रों में खेला जाता रहा है.
एयर इंडिया के निजीकरण का विषय 2000-01 से शुरू हुआ मगर आज तक सरकार इसे पूरी तरह से निजी नहीं बना पायी थी. मौजूदा सरकार ने आधा काम कर दिखाया.  आइये जानते हैं कि एयर इंडिया के अलावा ऐसे कौन कौन से क्षेत्र हैं जो सरकारी पकड़ से निकलकर निजी कंपनियों के हाथों में जा रहे हैं और क्यों-:
बिजली का निजीकरण: अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग को प्राइवेट कंपनियों के हाथों में सौंपे जाने का विरोध हो रहा है. वहां के सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि सरकार ही बिजली विभाग में हुए घाटे के लिए ज़िम्मेदार है और साथ ही साथ यूपी सरकार के कई दफ्तरों का लगभग 1000 करोड़ रुपए बिजली विभाग को देने बाकी है. कर्मचारियों ने अब विरोध के लिए आन्दोलन करने का फैसला किया है. बिजली कर्मचारी अब 9 अप्रैल से 72 घंटे काम करके विरोध प्रदर्शन करेंगे. वे जानते हैं कि बिजली का निजीकरण सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है.
स्वास्थ सेवाओं का निजीकरण: पि‍छले कुछ सालों में भारत में स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं का नि‍जीकरण भी बहुत तेजी से बढ़ा है. टीबी को भी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के नि‍जीकरण की बीमारी ने घेर लि‍या है. रि‍वाइज्‍ड नेशनल टयूबरकुलोसि‍स कंट्रोल प्रोग्राम (RNTCP) के तहत टीबी के नोटि‍फि‍केशन का प्रावधान कि‍या गया है. RNTCP की वेबसाइट के अनुसार बहुत कम टीबी के मरीजों को सरकारी और गैर सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थाओं में अधिसूचित कि‍या गया है.
पि‍छले 6 सालों में ही नि‍जी अस्‍पतालों में जाने वाले मरीजों का आंकड़ा 60 हजार से बढ़कर 3,95,838 पर पहुंच गया है, जबकि दूसरी ओर सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं में सूचि‍त होने वाले मरीजों की संख्‍या में महज 35 हजार मरीजों की ही और बढ़त हुई है. इससे एक साल पहले नि‍जी अस्‍पतालों में केवल 7000 मरीज अधि‍सूचि‍त कि‍ए गए.
अगर मरीजों की संख्‍या में बढ़त होनी थी तो वह समानांतर रूप से दोनों ही क्षेत्रों में होनी चाहि‍ए थी. इसका मतलब यह है कि टीबी के इलाज के लि‍ए सरकारी संस्‍थाओं पर लोगों का भरोसा तेजी से कम हुआ है.
लोगों का सरकारी स्वास्थ सेवाओं पर भरोसा कम होने का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है? इसका मतलब गरीबों को ज़बरदस्ती निजीकरण की ओर ढकेला जा रहा है.
भोपाल के रेलवे स्टेशन का निजीकरण: सरकार अब रेलवे स्टेशनों को भी निजी कंपनियों के हाथों सौंप रही है ताकि वहां भी लोग एअरपोर्ट जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल कर पाएं. रेल संचालन की ज़िम्मेदारी रेलवे विभाग के पास ही होगी मगर ट्रेन के टिकट और खाने- पीने की व्यवस्था यह सभी प्राइवेट कंपनियों के हाथ में होंगे. इस ‘विकास मॉडल’ के लिए बंगलुरु, आनंद विहार, पुणे, चंडीगढ़, सिकंदराबाद का चयन किया गया है.
हबीबगंज ISO प्रमाणित रेलवे स्टेशन है मगर पिछले साल मार्च में सरकार ने इसके आधुनिकीकरण का फैसला किया और इसे निजी कंपनी बंसल ग्रुप को दे दिया गया. भारतीय रेल स्टेशन विकास निगम लिमिटेड (आईआरएसडीसी) और बंसल ग्रुप के बीच समझौते पर हस्ताक्षर के बाद से यह देश का पहला प्राइवेट रेलवे स्टेशन बन गया है, जिसके तहत रेलवे विभाग सिर्फ गाड़ियों का संचालन करेगा और कंपनी स्टेशन का संचालन करेगी, जिसमें स्टेशन पर पॉर्किंग, खानपान आदि का एकाधिकार होगा.
प्राइवेटाइज़ होने के बाद यात्रियों को मिलने वाली सुविधाओं के दाम बढ़ाए गए, जिसका खूब विरोध हुआ. हालांकि विरोध होने के बाद दाम  कम तो किये गए मगर अभी भी कोई मध्यम वर्गीय व्यक्ति रेट लिस्ट देखेगा तो खुद को रेल के सफ़र से दूर पायेगा.
निजीकरण को सही बताने के लिए हमेशा यही तर्क दिया जाता है कि आम लोगों तक अच्छी सुविधाएं केवल निजी कंपनियों के द्वारा ही दिया जाना संभव है मगर वास्तव में स्थिति कुछ और है. सुविधाओं के निजी हो जाने बाद वह आम जनता की पहुंच से और भी ज्यादा दूर हो जाती हैं.
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