मोहनदास करमचंद गांधी, यह नाम आधुनिक भारत के इतिहास को दो स्पष्ट काल खंडों में बांटता है- गांधी के समय का भारत और गांधी के बाद का भारत. गांधी के बाद के भारत की यात्रा 30 जनवरी 1948 से शुरू होती है. सत्तर साल के बाद ये यात्रा आज कई अंतरविरोधों से घिर चुकी है. भारतीय समाज और भारतीय लोकतंत्र में सामंजस्य का यह अंतरविरोध धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद, आर्थिक न्याय और जातीय अस्मिता के साथ सामाजिक न्याय जैसे मौलिक संविधानिक उद्देश्यों पर केंद्रित है. इन मसलों के राजनीतिक निहितार्थ खोजने पर लगभग साढ़े पांच फीट के अजानबाहु इस शख्स की हत्या की कई वैचारिक गुत्थियां सुलझती नजर आती हैं.

लोकतंत्र के इन बुनियादों मसलों को लेकर गांधी की प्रतिबद्धता और नीयत को लेकर तमाम सवाल खड़े किए जाते रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहे तो एक होड़ मची हुई है कि कैसे गांधी युग की स्थापनाओं को चुनौती दी जाए और उसे डिकंस्ट्रक्ट या रिकंस्ट्रक्ट किया जाए. कभी-कभी ऐसा लगता है कि चर्चा के केंद्र में आने के लिए बौद्धिकता का अघोषित आधार ही इसे मान लिया गया है. मजेदार तो यह है कि इस होड़ में वाम के एक बड़े तबके से लेकर दक्षिणपंथ तक सभी ने पूरी निष्ठा से अपनी भूमिका निभाई है. नतीजतन जिन लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर गांधी की दृष्टि बहुत साफ थी और जिससे नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) जैसे वैश्विक नेताओं को अपनी राजनीतिक दृष्टि विकसित करने का मौका मिला था, उसे लेकर आज भारतीय समाज अविश्वास और अंतरद्वंद की स्थिति में फंसा हुआ है.

अब यह तथ्य सर्वविदित है कि गांधी 1947 में देश के बंटवारे के समय तक आते-आते अलग-थलग पड़ गए थे. गांधी जी के परपोते तुषार गांधी अपनी किताब Lets kill Gandhi में कहते हैं कि आखिरी के कुछ सालों में गांधी अलग-थलग पड़ गए थे. उस समय गांधी जी ने व्यथित हो कर कहा था कि एक खुद को मेरा शिष्य (जिन्ना) कहता है तो दूसरा खुद को मेरा बेटा (नेहरू) कहता है लेकिन दोनों ही मेरी नहीं सुनते हैं. उन्हें लगने लगा था कि दोनों ही देशों में उनके लिए जगह नहीं रह गई है. यह यूं ही नहीं था जिससे गांधी आखिरी वक्त में अकेले पड़ गए थे बल्कि गांधी की राजनीतिक प्रतिबद्धता को साकार रूप देने का साहस किसी में भी बचा नहीं रह गया था जो बाद के सालों में तो और भी दुरूह हो गया और आज तो सिर्फ तस्वीरों तक ही महदूद रह गया है.

गांधी से इतनी समस्या होने के बावजूद भारत के तमाम राजनीतिक दल प्रतिकात्मक रूप से गांधीवादी राजनीति ही करते हैं लेकिन लोकतंत्र और अंतिम जन के प्रति प्रतिबद्धता को त्यागकर. गांधी की हत्या ने जिस तरह से भारतीय राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया है वो गांधी की प्रतिबद्धता और असर को साफ तौर पर बयां करता है. भारतीय राजनीति के जिन मौलिक लोकतांत्रिक मूल्यों पर गांधी की हत्या का व्यापक असर पड़ा है उसमें सबसे अहम है धर्मनिरपेक्षता को लेकर लचर रूख अख्तियार करना और फलस्वरूप इसका दिशाहीन हो जाना. ऐसे ही हालात में सांप्रदायिकता ने अपने लिए एक स्वीकृत जगह राजनीति से लेकर समाज तक में बना ली है.

बंटवारे के बाद मुसलमानों के खिलाफ पैदा हुई भावना को सबसे पहले राममंदिर के नाम पर सुनियोजित तरीके से संप्रदायिकता का जामा पहनाने की कोशिश की गई. यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता कि गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचने वाले मुख्य अभियुक्त वही लोग थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद के विवादित भाग में राम की मूर्ति स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाई थी. इस संबंध में कृष्णा झा और धीरेंद्र झा ने अपनी किताब Ayodhya : The Dark Night में विस्तार से बताया है कि गांधी की हत्या और राममंदिर विवाद की शुरूआत कैसे एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई है और एक ही षड्यंत्र के दो हिस्से हैं. 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या होती है और 22 नवंबर 1949 की रात को बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति स्थापित करने का षड्यंत्र रचा जाता है. इन दोनों ही मामलों में षड्यंत्रकारी हिंदू महासभा से जुड़े लोग होते हैं. कृष्णा झा और धीरेंद्र झा अपनी किताब में बताते हैं कि बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति स्थापित करने का मकसद था कि हिंदुओं को बड़े पैमाने पर उकसाकर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक लाभ लेना. इस किताब के मुताबिक महात्मा गांधी की हत्या और राम मूर्ति की स्थापना के लिए खास वजह से सोच समझकर दिन का अलग-अलग पहर चुना गया था. महात्मा गांधी की हत्या दिन-दहाड़े भरी भीड़ के सामने की गई थी तो बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति रात के सन्नाटे में चोरी-चुपके रखी गई. इसका कारण यह था कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद हिंदू महासभा के लोगों ने सबक लिया कि सरकार से सीधे तौर पर टकराहट से बचना है ताकि इसका भरपूर राजनीतिक लाभ उठाया जा सके. हालांकि हिंदू महासभा को उस वक्त उनकी सोच के मुताबिक तो सफलता नहीं मिली लेकिन बाद के दिनों में रामजन्म भूमि विवाद ने भारत की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया.

लगभग साठ सालों तक हवा देने के बाद जब रामजन्म भूमि विवाद की ताप भारतीय राजनीति में ठंडी पड़ने लगी तो गौहत्या और लव जिहाद जैसे नए सांप्रदायिक विवाद पैदा किए गए. आइए अब गौहत्या पर भी उस गांधी के विचार जान लेते हैं जिसे हिंदू महासभा अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता था और आज भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में इसे लेकर एक मंतव्य है. गांधी जी अपनी किताब ‘हिंद स्वराज’ में लिखते हैं, “मैं जैसे गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं. जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है. तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की खातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए. अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है. अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए. यही धार्मिक कानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं.”

गौहत्या को लेकर गांधी जी के उपरोक्त विचार से जाहिर है कि वो गोरक्षा के नाम पर फैलाए जाने वाले नफरत की मानसिकता पर अपने तरीके से जोरदार चोट करते हैं और सांप्रदायिक शक्तियों के रास्ते में बाधक दिखते हैं. गांधी की हत्या और भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति के अवमूल्यन की शुरुआत में एक बहुत गहरा संबंध दिखता है. गांधी प्रतीक हैं उस हिंदुस्तान के जो बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद, आर्थिक न्याय और सामाजिक न्याय जैसे फ्रांसिसी क्रांति से उपजे आधुनिक लोकतांत्रिक अवधारणाओं पर खुद को तैयार कर रहा था जबकि गांधी की हत्या इस ओर इशारा करती है कि भारत जैसे जटिल समाज में इसकी ईमानदार गुंजाइश अभी भी खोजी जानी बाकी है.

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यह लेख  तारेंद्र किशोर ने लिखा है. तारेंद्र किशोर पत्रकारिता का अध्यापन करते रहे हैं. वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकार हैं .

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