पुलवामा हमले के गमगीन माहौल के बीच 26 फ़रवरी 2019 को एक ख़बर भारत के लगभग सभी न्यूज़ चैनलों पर अचानक से फ़्लैश होने लगी । ख़बर के मुताबिक़ ‘भारत ने ख़ैबर पख़्तून इलाक़े के बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों को एयर स्ट्राइक द्वारा तबाह कर दिया है. इस कार्रवाई में तीन सौ से ज्यादा आतंकियों के मार दिया गया है . सरकारी सूत्र बता रहे हैं कि यह सैन्य हमला नहीं था, बल्कि आतंकियों के खिलाफ की गई कार्रवाई थी .’
इस ख़बर के बाद सोशल मीडिया से ले कर राजनीतिक रैलियों में प्रधानमंत्री और भाजपा के नेताओं ने न सिर्फ़ सरकार की पीठ थपथपाई बल्कि नरेंद्र मोदी को एक मज़बूत और जवाबी कार्रवाई में उस्ताद नेता बताया जाने लगा  । उसी दिन प्रधानमंत्री मोदी ने चुरु की एक रैली में कहा- ‘मैंने आज देश वासियों को विश्वास दिलाया कि देश सुरक्षित हाथों में है. 2014 में मैंने मेरे दिल की बात सबके सामने रखी थी और मेरी आत्मा कहती है कि आज का दिवस उसे फिर से दोहराने का दिवस है.’ सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं मिटने दूंगा,
ग़ौरतलब है कि पुलवामा हमले में हमारे 40 से ज़्यादा जवान मारे गये थे । आशंका के बावजूद इस हमले को नाकाम न किया जा सका था । इसलिए सरकार तमाम सवालों से घिरी हुई थी ।लोगों में इस हमले को ले कर काफ़ी ग़ुस्सा था और कठोर कार्रवाई के लिए लगातार प्रदर्शन जारी थे । ऐसे समय में यह ख़बर सरकार की जवाबदेही  के लिए संजीवनी साबित हुई ।
एक चौंका देने वाला  संयोग – 
ख़बरों के मुताबिक़ यह एयर स्ट्राइक 26 फ़रवरी की सुबह हुई थी । इस  स्ट्राइक के दो दिन पहले 24 फ़रवरी के टाइम्स ऑफ इंडिया के 23 वें पेज पर एक लेख छपा है । यह लेख स्वामीनाथन अय्यर ने अपने साप्ताहिक कालम ‘स्वामीनामिक्स’ के अंतर्गत  लिखा है । स्वामीनाथन, मणिशंकर अय्यर के बड़े भाई हैं । वह अधिकतर इस कालम में  आर्थिक मसलों पर लिखते हैं लेकिन 24 फ़रवरी का यह लेख रणनीतिक मसले पर लिखा गया ।
इस लेख में लिखा गया था कि  ‘ पुलवामा में हुआ आतंकवादी हमला नरेंद्र मोदी को भारत में सबसे सख़्त राजनेता के रूप में दिखने  का एक बड़ा लेकिन जोखिम भरा मौका देता है। 1999 के कारगिल युद्ध में अटल बिहारी वाजपेयी की जीत ने उन्हें अगला आम चुनाव जीतने में मदद की थी । क्या मोदी (इसी तरह)  पुलवामा का इस्तेमाल कर सकते हैं ? ग़ौर तलब है कि कई दलों द्वारा एयर स्ट्राइक के संदर्भ में मोदी पर राजनीति करने के आरोप लगाए जा रहे हैं ।
लेख में बताया गया था कि किस तरह की कार्रवाई करनी चाहिए- 
स्वामीनाथन लिखते हैं कि ‘ ज़्यादा सही यह होगा कि अब  नयी तरह के पिलिटिकल थिएटर जैसे कि  2016 में उरी में हमारे सशस्त्र बलों पर हमले के बदले में की गई “सर्जिकल स्ट्राइक” की तरह ही जोखिम में जाए बिना,  कार्रवाई कर जनता की मांग पूरी की जा सकती है । अभी कुछ इसी तरह (कार्रवाई करने ) की जरूरत है।
 
वह लिखते हैं  “मैंने सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक थिएटर इसलिए बताया है क्योंकि वह रणनीतिक रूप से कुछ ख़ास नहीं थी । भारतीय सेना मुश्किल से एक  या दो किलोमीटर पाकिस्तानी इलाक़े में चली गई। उन्होंने जो नुकसान किया वह इतना मामूली था कि पाकिस्तान की पहली प्रतिक्रिया में इस बात से इंकार किया गया कि सामान्य सीमा झड़पों के अलावा इसमें कुछ भी हुआ है। एक पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा, यह कैसे संभव है कि सर्जिकल स्ट्राइक के लक्ष्य का कोई अंदाजा नहीं है?। ” ध्यान रहे कि भारत द्वारा की गई हालिया एयर स्ट्राइक को भी रणनीतिकरूप से कमज़ोर माना जा रहा है ।
सबसे ख़ास बात , स्वामीनाथन लिखते हैं कि “हालांकि इस तरह सर्जिकल स्ट्राइक ने मोदी को एक मज़बूत नेता के तौर पर चित्रित किया और भारतीय मीडिया द्वारा उस सर्जिकल स्ट्राइक का  एक  महान सैन्य सफलता के रूप में स्वागत किया गया था। इस कार्रवाई ने मोदी की छवि को एक मजबूत नेता के रूप में भुना दिया , एक ऐसा नेता , जिसने पाकिस्तान को सबक सिखाया,  जो कि पहले की कांग्रेस सरकारें हिम्मत नहीं कर सकी ।
‘कुछ पुराने निष्क्रिय ,आतंकवादी शिविरों पर बमबारी की जाए ‘
 
स्वामीनाथन चुनावी जीत की रणनीति पर बल देते हुए लिखते हैं कि ‘अभी से ले कर चुनावों के बीच के समये में , क्या मोदी एक और सर्जिकल स्ट्राइक या पाकिस्तान में आतंकवादी शिविरों पर बमबारी कर सकते  है?’ ।’ इसके बाद वह आख़िर पैरा में सरकार को एक सलाह देते है कि कई पुराने आतंकवादी शिविर, या आतंकवादी नेताओं के कार्यालय जो कि ज्यादातर खाली या निष्क्रिय हों , और जहाँ ज़्यादा सुरक्षा भी नहीं है , उन्हें उड़ाने के लिए गुप्त कार्रवाई का उपयोग किया जा सकता है ।इसके बाद जो नुक़सान हो उसे अतिरंजित (बड़ा -चड़ा कर) कर दिखाया जा सकता है? एक बड़ी सफलता का इशारा  देने के लिए बहुत से रचनात्मक वीडियो हेरफेर के ज़रिए बनाए जा सकते  है। वह लिखते हैं  कि “मीडिया आसानी से इस जीत की दास्तां बयां करेगा, और विपक्षी दल अगर आपत्ति जताएंगे तो वे एकतरफा देशभक्ति के ख़िलाफ़ दिखेंगे।”
आश्चर्य की बात यह है कि इस लेख के दो दिन बाद एयर स्ट्राइक हुई । सचमुच स्ट्राइक न सिर्फ़ आतंकी शिविरों पर की गई है बल्कि ऐसे इलाक़ों में की गई है जहाँ ख़तरे की सम्भावना कम हो । यह भी संयोग है कि घटना के बाद मीडिया 24 घंटे इस जीत की दास्ताँ अतिरंजित ढंग से बया कर रहा है जबकि वैश्विक मीडिया जैसे बीबीसी , एसोसिएटेड  प्रेस , न्यूयार्क टाइम्स ने भारतीय मीडिया के दावों पर पर सवाल उठाए हैं ।
(यह रिपोर्ट आशुतोष तिवारी ने लिखी है । आशुतोष  कठफोड़वा के सम्पादकों में से एक  हैं ।)

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