राफेल का सवाल जब बवाल बनकर भारत की मौजूदा रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण से संसद में टकराया था तो रक्षामंत्री ने जवाब दिया था, ‘इट इज क्लासिफाइड इंनफॉर्मेसन एंड इट कैननॉट बी डिस्क्लोस्ड.’ हिंदी में जिसका मतलब हुआ, ‘यह गोपनीय जानकारी है और इसका खुलासा नहीं किया जा सकता है.’ चलिए मान लिया कि रक्षा से जुड़ा मसला है, गोपनीयता जरूरी है, इसे रक्षामंत्री ही सम्भालें. लेकिन जो जानकारियां पब्लिक डोमेन में हैं, वह रक्षामंत्री के पद के कार्यकारी कदमों पर सवाल नहीं उठा रही हैं बल्कि रक्षामंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति से लेकर प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति तक की नियत पर सवाल उठा रहीं हैं. आइए, जानते हैं कि राफेल से जुड़ा मामला क्या है?

साल 2000 में सबसे पहले वायुसेना अध्यक्ष अरूप राहा ने फाइटर एयरक्राफ्ट को लेकर चिंता जाहिर की. उनका कहना था कि भारतीय वायुसेना पाकिस्तान और चीन के एक साथ हमले की स्थिति में कमजोर पड़ सकती है. भारत को आने वाले समय में इससे निपटने के लिए तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. यह अंदेशा वाजिब था और उस समय की UPA सरकार ने गंभीरता के साथ इस ओर ध्यान भी दिया.

साल 2007 में UPA सरकार के तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटिनी ने रक्षा विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा करने के बाद 126 फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीद को सरकारी मंजूरी दे दी. भारत सरकार ने एयरक्राफ्ट खरीद के लिए टेंडर जारी किया किया. दावेदार क्रेता यानी कि कम्पनियों ने टेंडर भरा और नीलामी में शामिल हो गईं. कुछ कम्पनियों को नीलामी के पहले स्तर में ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. बाहर निकाली गई कंपनियों में अमेरिका की एक कम्पनी को बाहर का रास्ता इसलिए दिखाया गया क्योंकि वह पाकिस्तान को एयरक्राफ्ट मुहैया करवा रही थी. छंटनी की ऐसी प्रक्रिया को बताना इसलिए जरूरी है ताकि समझा जा सके की देश के लिए रक्षा संसाधन की खरीददारी में प्रक्रियाओं की अहमियत क्या होती है?

साल 2012 में नीलामी की सारी प्रक्रियाओं के बाद सबसे किफायती दावेदार के रूप में फ्रांस की डासौल्ट कम्पनी उभरी. यानी कि भारत सरकार फ्रांस की dasault कम्पनी के साथ एअरक्राफ्ट खरीददारी के लिए करार करने के तरफ आगे बढ़ी. इस करार के तहत dasault कम्पनी करीब 54,000 करोड़ रूपये में 18 राफेल यानी की मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट को फाइनल कंडीशन में देने और 106 राफेल को बेंगलुरु में स्थित हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के साथ मिलकर बनाने के लिए राज़ी होती है. चूँकि इसे हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर बनाने का भी करार था इसलिए राफेल एयरक्राफ्ट से जुड़े टेक्नॉलजी ट्रान्सफर जैसे प्रावधान को भी करार में शामिल किया गया.

पर सबसे जरूरी सवाल तो यही है कि राफेल है क्या?

राफेल मल्टी रोल मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट है. इसे साल 2027 तक भारतीय वायुसेना और नौसेना के उपयोग के लायक बना देने का इरादा है. इसे जमीन से जमीन की लड़ाई, बमबार्डिंग, और दुश्मन पर आक्रमण करने के लिए बनाया जा रहा है. ये पांचवी जेनेरेसन की कॉम्बैट एयरक्राफ्ट है. इसकी खासियत यह होगी की यह कमोबेस स्टील्थ टेक्नोलॉजी से लैस होगी, यानी की किसी भी तरह का रडार इसकी मौजूदगी को डिटेक्ट नहीं कर पायेगा.

पर राफेल विवादों में क्यों है?

हुआ यह कि साल 2012 में dasault के साथ किया गया करार बिचौलियों की मिलीभगत के अंदेशे की वजह से स्थगित कर दिया गया. मोदी सरकार आने के बाद साल फरवरी 2015 में dasault के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स की फैक्ट्री बेंगलुरु में आते हैं और घोषणा करते हैं की dasault के साथ किया हुआ करार पुरानी शर्तों के आधार पर ही हकीकत में बदलेगा. यानी कि अभी तक मामला ठीक ठाक चल रहा था विवादों का खेल इसके बाद शुरू हुआ.

अप्रैल 2015 में भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी फ्रांस के दौरे पर गये. और dasault के साथ पुराने करारनामे की धज्जिया उड़ाते हुए नया करार कर लिया. जिस करार की सबसे आधारभूत कमी यह थी कि करार के लिए न ही रक्षामंत्री की सलाह ली गई, न ही टेंडर निकला गया और न ही नीलामी हुई. कहने का मतलब यह है की करार करने के लिए जरूरी हर तरह की प्रक्रिया को जानबूझकर मार दिया गया. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि रक्षा संसाधनों से जुड़े मसले की गंभीरता बिना प्रक्रियाओं को अपनाए खतरा पैदा करने की भी कुव्वत रखती है, जिसे बहुत अच्छी तरह से जानने के बाद भी माननीय प्रधानमंत्री करार करते समय नहीं अपनाते हैं. और करार भी ऐसा करते हैं जिसकी विषयवस्तु को पचा पाना अभी भी बेहद मुश्किल हो रहा है. इस करार के तहत 58 हज़ार करोड़ की कीमत पर फ्रांस की dasault कम्पनी भारत को 36 राफेल विमान देने पर राज़ी होती है, जबकि करार में राफेल से जुड़ी टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर शामिल नहीं की जाती है.

अब आप ही फैसला कीजिये की साल 2012 में dasault 54 हज़ार करोड़ में 126 राफेल देने के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से जुड़े करार पर राज़ी था, उसी dasault कम्पनी के साथ मोदी जी 58 हज़ार करोड़ में केवल 36 राफेल विमान बिना टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर के साथ खरीदने के नये करार पर राज़ी हुए हैं, इसे कैसे पचाया जाए? क्यों न इस अपच के कारणों को उभारने के लिए कुछ और घटनाओं के तार जोड़ने की कोशिश की जाए. इस लिहाज से यह जानना खटकता है की मोदी जी के फ़्रांस दौरे के कुछ दिन पहले ही अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेन्स नामक कम्पनी रक्षा बाज़ार में एक नई कम्पनी के तौर पर सामने आती है. सितम्बर 2016 में dasault के साथ हुए नये करार को औपचारिक मंजूरी मिल जाती है.

औपचारिक मंजूरी मिलने के 2 हफ्ते बाद, फ्रांस की dasault कम्पनी अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेन्स कम्पनी के साथ 22 हजार करोड़ रूपये का ओफ़्सेट कॉन्ट्रैक्ट कर लेती है. जिसका मतलब यह हुआ की फ्रांस की dasault कम्पनी के सुरक्षा से जुड़े भारत में कलपुर्जे बनाने का 22 हजार करोड़ रूपये का काम रिलायंस डिफेंस के हाथो में है. अब यहाँ समझने वाली और कारणों की तार जोड़ने वाली बात यह है की भारत और dasault कम्पनी के बीच हुए नये करार में टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर का मुद्दा नहीं है और dasault कम्पनी भारत में डिफेंस के कल पुर्जे बनाने के काम में जीरो अनुभव रखने वाली रेलैंस डिफेन्स को 22 हजार करोड़ का काम सौप देती है.ऐसा कैसे हुआ संभव हो सकता है की एक विश्व की एक प्रतिष्ठित एयरक्राफ्ट बनाने वाली कम्पनी लाखों करोड़ रूपये के कर्जे में डूबी साख वाली कम्पनी की सहयोगी कम्पनी से करोंड़ो का करार कर लेती हैं. कहीं ये पूंजीवाद के दौर में क्रोनि कैपिटलिज्म का बेहतरीन उदहारण तो नहीं. चाहे जो भी हो लेकिन राफेल के करार नुमा रायफल से कुछ सवाल तो निकलते हैं जिनका जवाब भाजपा के देशप्रेमी भले ही न मांगे लेकिन सच्चे देशप्रेमी जरुर खोज रहा है.

ये कुछ जरूरी सवाल हैं:

1.) यह फैसला किसने किया की भारत को 126 की बजाए केवल 36 एयर क्राफ्ट चाहिए? क्या इतने बड़े रक्षा करार की जानकारी यूनियन कैबिनेट को नहीं थी ?
2.) किसी वजह के बिना राफेल से जुड़ा पुराना करार रद्द क्यों कर दिया गया और नये सौदे में प्रति राफेल विमान की कीमत पहले की अपेक्षा तीन गुनी अधिक क्यों स्वीकार की गयी ?
3.) टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर से जुड़ा जरूरी क्लॉज़ नए करार से क्यों हटा लिया गया ?
4.) जिस कंपनी को रक्षा मेटेरियल बनाने के क्षेत्र में जीरो अनुभव है उससे 22 हज़ार करोड़ का ओफ़्सेट करार कैसे कर लिया गया?

ये कुछ सवाल है जिनका जवाब मिल गया तो सच्चे देशप्रेमी ये सवाल नहीं उठाएंगे की चुनाव के दौर में पार्टियां चुनावी राफेल वाले विमान का जुगाड़ कैसे करती है?

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खांटी मानवतावादी अजय कुमार समाजविज्ञान और दर्शन की दुनिया से जूझते हुए जीवन बिताना चाहते हैं। कहने के लिए तो इन्होंने अपनी डिग्री bhu से हासिल की है लेकिन खुद की समझ के लिए चर अचर सबकी भूमिका स्वीकारते है। देखना, सीखना और अपना नज़रिया बनाना ही ज़िन्दगी बन जाए इसलिए पत्रकारिता का चुनाव किया। किसी भी विषय को गहराई से समझने-समझाने के समर्थक और घाट-घाट का पानी पीने वाले अजय कुमार राजनीति के जरिये सामाजिक बदलाव की बात में यकीन करते हैं। नो नॉनसेंस पर्सन अजय कुमार किसी साधू की तरह हरदम विचारों की धूनी रमाए रहते हैं.

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