यह लेख राकेश पांडेय के दक्षिणपंथ की प्रवृत्तियों पर लिखे गये एक लेख का कठफोड़वा की ओर से संपादकीय जवाब है. राकेश पांडेय ने रवीश कुमार के पत्र के जवाब में इस लेख को लिखा है (नीचे दी गई हैडिंग में रवीश कुमार के लेख का लिंक है). इस लेख में राकेश पांडेय ने दक्षिणपंथ की नई प्रवृत्तियों को समझाने का प्रयास करते हुये, उसके बुरे प्रभावों की ओर ध्यान खींचा है. साथ ही साथ एक आदर्श दृष्टि से उसे अपनी गतिविधियों को नियंत्रित करने की सलाह भी दी है ताकि भविष्य में इससे होने वाली समस्याओं को रोका जा सके. कठफोड़वा उनसे विभिन्न बिंदुओं पर वैचारिक मतभेद रखता है. पहले पढ़िये राकेश पांडेय का लेख और फिर पढ़िये कठफोड़वा की ओर से काउंटर नैरेटिव.

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राकेश पांडेय का लेख-

इस शीर्षक से रवीश कुमार ने उन्‍हें गालियां और धमकियां देने वालों को पत्र लिखा है-

‘रितिक और अनुज के दिमाग़ में ज़हर कौन भर रहा है’

यह पत्र बहुत महत्‍वपूर्ण है. इस बहस को आगे बढ़ाना चाहिए.
आज की राजनीति पर उदारवादी स्‍टैंड रखने वाले और विवेचनात्‍मक-वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाए रखने वाले रवीश जैसे बहुत लोगों को अपने दैनिक जीवन में चलते-चलाते भी बहुत आक्रामकता का सामना करना पड़ रहा है, यह एक सच है. मैं कह सकता हूं कि मेरा लिखना-बोलना बहुत सीमित है, फिर भी ऐसी आक्रामकता का सामना मैं भी अक्‍सर करता हूं.
दक्षिणपंथ एक सुविचारित विचारधारा हो सकती है, होनी चाहिए. दुनियाभर के तमाम विकसित लोकतंत्रों में दक्षिणपंथी पार्टियां हैं जिनका प्रतियोगी राजनीति में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है. इनकी मूल दृष्टि यह है कि समाज की कुछ पारंपरिक संरचनाओं को समाज-संस्‍कृति की टेक मानना चाहिए और आधुनिकता की जहाज समुद्र में चाहे जितनी दूर की यात्रा कर ले उसका एंकर कुछ पारंपरिक संरचनाएं होंगी जहां लौटकर हर जहाज को बंधना है. समकालीन समय में जब जनसंख्‍याओं में भौगोलिक गतिशीलता बहुत हुई है और संस्‍कृतियों का घुलना- मिलना बहुत हुआ है तब संस्‍कृतियों में अपने-अपने कथित ‘एंकरों’ को लेकर दुष्चिंताएं बढ़ी हैं इसलिए दक्षिणपंथ का हर तरफ उभार है. दक्षिणपंथ की राजनीति जहां संस्‍कृति को प्रथम निर्धारक मानती है, इसलिए अक्‍सर वैसी पार्टियों में अपने देश की निर्णायक विचारधारा को किसी एक ही धर्म की एक-सी परंपरा पर आधारित मानने की प्रवृति होती है, और इसी बिंदु पर उसका उदारवादी राजनीति से विरोध होता है. उदारवादी राजनीति समाज और संस्‍कृति के लिए नए ‘एंकरों’ की तलाश करती है जिसका आधार वैज्ञानिक तर्कसंगत हो और धार्मिक- सांस्‍कृतिक स्‍तर पर बहुलतावादी हो. पर, दुनियाभर के विकसित लोकतंत्रों में दक्षिणपंथ्‍ा एक जिम्‍मेवार राजनीति करना सीख चुका है और जैसे संस्‍कृति में वह अपने कुछ ‘टेक’ को निश्चित मानता है उसी तरह लोकतंत्र के इस ‘टेक’ पर भी उसे विश्‍वास करना पड़ता है कि दूसरे विचारों की अभिव्‍यक्ति की आजादी को सम्‍मान देना है.
पर, भारत में हम क्‍या देखते हैं. भारत की उदारवादी राजनीति में भी एक सांस्‍कृतिक आक्रामकता का तत्‍व रहा है. भारत की उदारवादी राजनीति के केंद्र में वह पढ़ा- लिखा सॉफिस्टिकेटेड मध्‍यवर्ग रहा है जिसकी तर्क-पद्धति और शब्‍दावली देश के परंपराओं में आकंठ डूबे आम आदमी को बौद्धिक रूप से आक्रांत करती रही है. जाति और वर्ग से उच्‍च इस मध्‍यवर्ग ने दोनों हाथों में लड्डू को एन्‍जॉय किया है. उसका स्‍टेटस बना तो जाति, वर्ग, शहर जैसी पारंपरिक संरचनाओं के आधार पर है, और साथ- ही उसके हाथ में नई वैज्ञानिक तर्कपद्धति की ताकत भी है. इस पढ़े- लिखे सॉफिस्टिकेड विचार और भाषा वाले उदारवादी वर्ग के विरूद्ध देश के साधारण पढ़े लिखे नव-सृजित मध्‍यवर्ग के बड़े हिस्‍से में एक प्रतिक्रिया देखी जा सकती है, और इस प्रतिक्रियावाद को भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा के केंद्र में बैठे आरएसएस और बीजेपी ने भुनाया है. उदारवादी संगठन जैसे एनजीओ, सिविल सोसायटी मूवमेंट, नए राजनीतिक दल, आधुनिक शिक्षा तंत्र आदि देश के नव- सृजित मध्‍यवर्ग को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने और अपनी तर्क- पद्धति समझाने मे उतना सफल नहीं हुए, पर इस मध्‍यवर्ग का बड़ा हिस्‍सा धार्मिक मठों के कैचमेंट एरिया में है और धार्मिक- आध्‍या‍त्मिक आधार पर बनने वाली विश्‍व- दृष्टियों से अधिक रिलेट करता है. रवीश कुमार और आपको हमको गाली देने वाले इन युवाओं की पड़ताल कीजिए तो आप पाएंगे कि ये संविधान के मौलिक अधिकार और मानवाधिकार आदि के तर्कों के मर्म को नहीं समझते हैं पर उनके दैनिक जीवन का अनुशासन किसी न किसी बाबा के उपदेशों पर आधारित है.
रवीश कुमार ने सही लिखा है कि प्रतिक्रियावाद को पोषित करने वाली बीजेपी की राजनीति के लिए यही युवा कभी काल साबित होंगे. दक्षिणपंथ को लोकतंत्र के स्‍पेस में एक जिम्‍मेवार राजनीति करनी है तो उसे बिलकुल परिधि पर जो उसके कार्यकर्ता और समर्थक हैं उसकी हरकतों की नैतिक जवाबदेही लेनी होगी न कि उसे भड़काकर और आगे कर उसका राजनैतिक फायदा उठाना होगा. बुली करके और डराके जो वह सत्‍ता हासिल कर लेंगे उसमें फासीवाद का तत्‍व होगा और उसका वैचारिक आधार नहीं होगा और लोकतांत्रिक जमीन नहीं होगी. आरएसएस, भाजपा और ध्‍ाार्मिक मठों को अपने कार्यकर्ताओं और संभावित समर्थकों को अपनी विश्‍वदृष्टि और विचारधारा के साथ- साथ लोकतांत्रिक कार्य- पद्धति के बारे में प्रशिक्षित करना होगा, अन्‍यथा इन युवाओं के भटकाव के लिए आरएसएस, बीजेपी और दक्षिणपंथी दृष्टि वाले नेता और एलीट जवाबदेह होंगे. पता नहीं इस जमात में लोकतांत्रिक कार्यपद्धति का प्रशिक्षण कितना संभव है.
ऊपर हमने उदारवादी वर्ग की साम‍ाजिक पृ‍ष्‍ठभूमि (आमतौर पर) और वैचारिक चरित्र के बीच जिस विरोधाभास की बात की उस प्रकार का विरोधाभास भारत की दक्षिणपंथ की राजनीति में अधिक प्रबल है, पर फिलवक्‍त दक्षिणपंथ ने अपने उस विरोधाभास को दबा रखा है और वह अपने विरोधी उदारवाद के विरोधाभास से खेल रहा है. दक्षिणपंथ की राजनीति जिस नेता वर्ग और एलीट वर्ग का निर्माण करती है उसके केंद्र में कहीं अधिक उच्‍च- जाति उच्‍च- वर्ग और बड़े शहरों के लोग आसीन हैं, जो अपनी राजनीति की परिधि पर उपद्रव मचा रहे नव- सृजित मध्‍यवर्ग के भटके युवाओं का फायदा उठाकर अपनी राजनीति को कोंसोलिडेट कर रहे हैं.
दक्षिणपंथ को अपनी राजनीति में लोकतांत्रिक जवाबदेही लानी चाहिए. दक्षिणपंथ अपनी राजनीति में वह जवाबदेही ला सकता है या नहीं, या भारत में उसकी राजनीति अनिवार्यत: नियंत्रणवादी और फासीवादी ही है, यह तो आने वाला वक्‍त बताएगा. उदारवाद को अपनी राजनीति और विश्‍वदृष्टि को सामाजिक रूप से विस्‍तृत करना है. उदारवाद को दक्षिणपंथ से प्रतियोगिता करनी है न कि उसके उपस्थित होने की वैधता को ही खारिज करना है. उदारवाद को अपनी ताकत संविधानवाद से प्राप्‍त करनी है, न कि भारतीय दक्षिणपंथ के प्रतिक्रियावादी चरित्र की प्रतिक्रिया में खुद प्रतिक्रियावादी बन जाना है. प्रोग्रेसिव होने का चोला पहने बहुत से बुद्धिजीवी की भाषा- शैली भी गाली- गलौच वाली और विरोधी से तर्क करने और उसे उघाड़ने की कोशिश करने की बजाय उसे खारिज करने वाली मिलती है जो ऊब पैदा करती है. इस बहस में यह बात भी जोड़ी जानी चाहिए कि भारत की कम्‍युनिस्‍ट राजनीति के नेताओं और कर्णधारों को भी अपनी परिधि के उन कार्यकर्ताओं और समर्थकों की जवाबदेही लेनी है जो समर्थक ‘वर्ग- संघर्ष’ की आड़ में व्‍यक्तिगत कुंठाओं और हताशाओं से प्रेरित गाली- गलौच, तोड़फोड़ से लेकर कत्‍लेआम तक करते हैं. अनुशासनहीन कार्यकर्ता कम्‍युनिस्‍ट आंदोलनों के लिए भी बड़े संकट रहे हैं.
रवीश का मौजूदा पत्र रोचक और महत्‍वपूर्ण इसलिए है कि वह विरोधी से तर्क कर रहा है और विरोध कर रहा है. उसे गलत बता रहा है पर उसे ‘नाजायज’ नहीं कह रहा है. कहीं राजेंद्र यादव ने लिखा था, कई बार ऐसा होता है कि आप संवाद करके अपनी वैधता अपने विरोधी को नहीं ट्रांसफर कर रहे होते, बल्कि अवैध मानकर अपने से भिन्‍न जमीन पर उसे वैध बना रहे होते हैं.
जो भी हो, यह विश्‍वास कायम है कि भारत में लोकतंत्र की यात्रा जारी रहेगी.

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अजय की ओर से जवाब-

लेख की कई बातों से आंशिक सहमति व्यक्त भी की जा सकती है पर मैं अपने तर्क ही अलग संदर्भ बिंदु पर बैठकर गढ़ता हूं. मुझे लगता है कि हिंसा मानव की मौलिक प्रवृति है. इसके प्रमाण स्वरूप आप युवल नोहा हरारी की सेपियंस किताब में मेंशन करोड़ों प्रजातियों को हमारे द्वारा मिटा दिये जाने के उदाहरण को ले सकते हैं. या आज भी हमारे मच्छरों और तिलचट्टों के खिलाफ वृहत युद्ध का उदाहरण ले सकते हैं. जैसे छोटे बच्चे स्वाभाविक रूप से चींटा-चींटी मारते मिलेंगे पर धीरे-धीरे समय के साथ समझ और उचित माहौल पाकर उनकी यह हिंसात्मक वृत्ति भीतर ही भीतर आपको दब जाती दिखेगी. फिर भी यह प्रवृत्ति हमेशा हमारे साथ चलती रहती है.
हिंसा को दबाने में भाषा का अहम योगदान है और गजब बात तो यह कि भाषा एक दूसरे तरह की भाषाई हिंसा को योगदान देने में भी मदद करती है. इसलिए 50 साल पहले जिन बातों पर गालियां दी जाती थी, उनपर शिकारी किस्म के लोग आज अधकचरा व्यंग्य या कुतर्क गढ़कर चले जाते हैं. वैसे ही आज की टीवी बहसें रोजना तकरीबन 85 फीसदी हिस्सा कुतर्कों को परोसने में खर्च करती हैं. (अफसोस फिर भी हमारे समय के समाज का अधिंकाश हिस्सा अभी भी अपने समझ की फलक को तंदुरस्त करने के लिए टीवी पर निर्भर है.) वहीं हमारे-आपके जैसे लोगों के मुंह से 4 मिनट टीवी देखने के बाद गाली निकलती है कि सरे आम कोई ऐसे तर्क कैसे गढ़ सकता है? यह काम सिर्फ भाजपा नहीं करती बल्कि कांग्रेस या आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां उससे अधिक करती हैं. क्योंकि वह मानकर चलती हैं कि भाजपा को हराने के लिए भाजपा जैसे खेलना पड़ेगा. इस खेल में वह अधिक भद्दी और बेकार दिखने लगती हैं. उनके तर्क भी बेहद बेकार होते हैं.
जिनके पास भाषा है वह इतनी चालाकी से बात घुमाते हैं कि जिसे बात समझ में आ गयी, उसके जुबान से गाली ही निकलती है. आपने स्वप्न दासगुप्ता को जरूर पढ़ा होगा या अपने आस-पास ऐसे लोगों से जरूर रोज़ाना भिड़ते होंगे, जो सबकुछ जानने के बाद भी चालाकी करते हैं. वकीलों का पूरा पेशा इसी बात पर चलता है. उन्हें हर बात की समझ है, यह भी समझ है कि वह गलत कर रहे हैं, जब तक हम उन्हें नहीं थाम लेते तब तक भावुकता में बहकर या चंद बेईमान समझदार लोगों के इशारे पर संगठित तौर पर इकठ्ठा होकर काम करने वाले एक बहुत भीड़ का सामना किस तरह से करेंगे, मुझे नहीं पता.
सबसे महत्वपूर्ण बात आज के विकास की दौड़ में शिक्षा-संस्कृति में स्किल पर ज्यादा फोकस है, वह व्यक्ति के इनपुट से ज्यादा उसके आउटपुट को बढ़ने में लगी हुयी है. ऐसे में यह प्रवृत्ति दिखना कोई खास आश्चर्य नहीं. इसलिए मानविकी का विद्यार्थी भी अपने समय और जगह के हिसाब से जायज़ तर्क के साथ नहीं जाता बल्कि उसके साथ जाने की कोशिश करता है, जिसमें वह खुद सर्वाइव कर सके या खुद के लिए ज्यादा आसान जीवन हासिल कर सके. ऐसी दशा में किसी से नफरत करने के लिए रोज़ दरवाज़े खुलते हैं, बन्द तो कभी होते ही नहीं. दिक्कत केवल इतनी है कि सोशल मीडिया के सहारे यह दिखने लगे हैं और कुछ नहीं.
और सबसे महत्वपूर्ण बात छिपकर भाषा के सहारे गाली देने का अवसर तब बढ़ जाता है जब पूरी दुनिया बेइमानी की कृत्य से साफ़-साफ नज़र आती हो. जैसे अगर मेरा मेहनताना हर महीने 10 लाख रूपये है और कोई 5 हज़ार में ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए अभिशप्त है, तब मैं जो मर्ज़ी सो कहूं, नैतिक तो कहीं से नहीं हूं. और आर्थिक असमानता की इस भयंकर खाई में आप जिसपर मर्ज़ी उसपर कण्ट्रोल कर लीजिये ,छिपकर या खुलकर किये जाने वाले भाषायी कुकृत्य पर कंट्रोल किया जाना हमेशा असम्भव होगा. मैं अगर पत्रकार होकर अपनी नौकरी की वजह से किसी बड़े नेता की लफ़्फ़ाज़ियां रोज़ सुनता हूं तो किसी नासमझ और आर्थिक रूप से तंग व्यक्ति की भाषायी गलतियां क्यों नहीं बर्दाश्त कर सकता? गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार सबको है लेकिन अगर बहुसंख्यक लोगों को इस अधिकार से विकास का मॉडल वंचित करेगा तो कहीं न कहीं तो इसका विस्फोट होगा.
हो सकता है कि मैं भावुक हो गया हूँ लेकिन आज से 5 साल पीछे जाकर मैं खुद को देखता हूँ तो मुझे हमेशा लगता है कि मैं आज किसी जेल में होता.
अविनाश की ओर से जवाब-
1. आपने अपने लेख में दक्षिणपंथ और पूंजीवाद की गलबहियों को नजरअंदाज किया है.
2. बल्कि पूंजीवाद और दक्षिणपंथ की की गलबहियां आपस में इंटरकनेक्टेड या प्रपोर्शनल होने के चलते हैं. पिछले दशकों में लगातार पूंजी की महिमा बढ़ी है और लोगों के एस्पिरेशन भी. पूंजी एक आभासी चीज है पर हमने इसे सबसे बड़ा सत्य बना रखा है. अक्सर आप लोगों के मुंह से ‘पैसा ही ईश्वर है’ या ‘पैसा ही आखिरी सच है’ जैसे डायलॉग सुनते होंगे. पैसे की इस महिमा ने इसे शेयर करने की प्रवृत्ति भी घटाई है. इसमें इंडिविजुअलिज्म के उभार को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है.
3. दक्षिणपंथ जैसी शेयर्ड सब्जेक्टिविटी पूंजीवादी धूर्तों का हथियार बन गई है. आप बहुत कोमलता से इस विषय को ट्रीट करके निकल जा रहे हैं.
4. जिसे आप सम्मान देना कह रहे हैं. उसे मैं चतुराई से अपने पीछे भीड़ जुटाना कहूंगा. जिस प्रैक्टिकल दक्षिणपंथ का मुजाहिरा पिछले पचास सालों में हुआ है. दूसरी विचारों से सामंजस्य (जिसका आप अपने लेख में इशारा करते हैं) के नाम पर उनकी यूएसपी को ही खत्म कर खुद में घोल लेना इसकी प्रवृत्ति है. एक बात से आप भी इंकार नहीं करेंगे कि दक्षिणपंथ अक्सर हीनभाव से पनपता दिखा है जिससे वह उदारवाद से कहीं आक्रामक रूप में सामने आया है.
5. आपकी नव-सृजित मध्यवर्ग की सॉफिस्टिकेटेड विचार-भाषा वाले उदारवादी वर्ग के विरुद्ध प्रतिक्रिया की बात को स्वीकार करता हूं पर इसमें आप पिछले दो दशकों में हुये ज्ञान के लोकतंत्रीकरण को अनदेखा करते हैं. ज्ञान (वास्तविक ज्ञान नहीं बल्कि सूचनाएं और जानकारियां) आज अंगूठे की नोक पर रखा हुआ है. नव-सृजित मध्यवर्ग अंगूठे के नोक वाली बात को जानता भी है. यह भी प्रतिक्रिया की एक वजह है. आप इसे इस रूप में नहीं देख रहे. पर उसे केवल सूचनाएं हासिल हैं नव-सृजित मध्यवर्ग इस बात को नहीं स्वीकारता. फिर भी वह समझता है कि वह ज्ञान के चैनलाइजेशन में पूर्णत: सक्षम है या फिर उनमें नीर-क्षीर विवेक की अगाध क्षमता है. यह भी प्रतिक्रिया और अविश्वास की वजह है.
6. इसलिये यह भी पक्का है कि ऐसे में रवीश कुमार की यह बात गलत ही साबित होगी कि ये युवा कभी बीजेपी की राजनीति के लिये काल साबित होंगे. ऐसा कभी नहीं होगा. वे हमेशा काम ही आयेंगे.
7. आखिरी बात यह कि आप इसी लेख में एक बार इससे बचने को लोकतंत्र की दुहाई देते हैं और एक बार नैतिकता की. यहां पर बड़ी गलती हो रही है क्योंकि नैतिकता सब्जेक्टिव है.
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