इस लेख का शुरुआती अंश ‘द इंडियन एक्सप्रेस’  के ‘ऑपीनियन पेज’  पर ‘Dear friend, speak up’ शीर्षक से छपे पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के पत्र का हिंदी अनुवाद है. सिन्हा अब तक भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता थे. वह भारत के पूर्व वित्त मंत्री रहने के साथ-साथ अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में विदेश मंत्री भी रह चुके हैं.

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2014 में हुए लोकसभा चुनावों में जीत के लिए हम सबने जी-जान से मेहनत की. 2004 में जब से यूपीए सत्ता में आई तभी से हम में से कुछ सरकार के शासन के खिलाफ संसद में और बाहर संघर्ष कर रहे थे, जबकि कुछ अन्य अपने संबंधित राज्यों के कार्यालयों में मौज कर रहे थे. 2014 के चुनाव परिणामों से हम सभी के बीच खुशी की लहर दौड़ गई कि एनडीए की इस अभूतपूर्व जीत से हमारे देश के इतिहास में एक नए और गौरवशाली इतिहास की शुरूआत होगी. हमने प्रधानमंत्री और उनकी टीम पर विश्वास कर के पूरी तरह से समर्थन किया. अब जबकि सरकार ने लगभग चार साल पूरे कर लिए हैं, पांच बजट पेश किए हैं और परिणाम दिखाने के लिए उपलब्ध सभी अवसरों का इस्तेमाल कर लिया है. हालांकि इसके अंत में हम कहीं न कहीं रास्ता भटक गए हैं और हमने अपने मतदाताओं का विश्वास भी खो दिया है.
सरकार लगातार दावे कर रही है कि हम तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं लेकिन असल में देश की आर्थिक स्थिति बेहद गंभीर है. एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था अपने बैंकों में नॉन परफॉर्मिंग असेट्स नहीं रखती जो कि हमने पिछले चार वर्षों में किया है. तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसान संकट में नहीं होते, युवा बेरोज़गार नहीं होते, छोटे व्यवसाय नष्ट नहीं होते, बचत और निवेश इतनी बड़ी मात्रा में नहीं गिरते जो पिछले चार सालों में हुए हैं. इससे भी बदतर तो यह कि भ्रष्टाचार ने एक बार फिर अपना सिर ऊंचा कर लिया है, बैंकिंग घोटाले एक के बाद एक बाहर आते जा रहे हैं. यही नहीं घोटालेबाज़ घपला कर के देश के बाहर चले जाते हैं और सरकार असहाय होकर देखती रहती है.
पहले की तुलना में महिलाएं आज कहीं ज़्यादा असुरक्षित हैं. बलात्कारों का दिन प्रतिदिन क्रम बनता जा रहा है और बलात्कारियों के ऊपर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय हम उनके समर्थक बन गए हैं. कई मामलों में तो हमारे ही लोग इन जघन्य अपराधों में शामिल हैं. अल्पसंख्यक विमुख हैं. सबसे खराब बात यह है कि अनुसूचित जाति और जनजाति, जो हमारे समाज के कमजोर वर्ग हैं उन पर अत्याचार और असमानता की खबरें खुलकर सामने आ रही हैं, जो पहले कभी नहीं थीं जिसने उन्हें संविधान में दी गई गारंटियों के लिए भी खतरा पैदा कर दिया है.
हमारी विदेश नीति का कुल योग प्रधानमंत्री द्वारा लगातार की गई यात्राओं में अपने विदेशी गणमान्यों को गले लगाना है चाहे वह इसे पसंद करें भी या नहीं. ये तरीका बेहद ही निष्फल रहा है और खासकर ये हमारे पड़ोस में ही तत्काल रूप से विफल हो गया, जहां चीन लगातार हमारे हितों में कटौती करता जा रहा है. पाकिस्तान के खिलाफ हमारे बहादुर जवानों द्वारा चालाकी से की गई सर्जिकल स्ट्राइक भी बर्बाद हो गई, पाकिस्तान लगातार भारत में आतंक का निर्यात कर रहा है और हम हाथ पर हाथ रखे देख रहे हैं. जम्मू कश्मीर लगातार जल रहा है, वामपंथी उग्रवाद ने शिक्षा लेने से इंकार कर दिया है और आम आदमी पीड़ित है जैसा पहले कभी नहीं था.
पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र पूरी तरह से नष्ट हो चुका है. मेरे दोस्तों ने मुझे बताया कि पहले की तरह अब संसदीय पार्टी की बैठकों में भी सांसदों को अपने विचार रखने का मौका नहीं मिलता है. अन्य पार्टी बैठकों में भी संचार सिर्फ एकतरफा है. वह बोलते हैं आप सुनते हैं. प्रधानमंत्री के पास आपके लिए बिल्कुल भी वक्त नहीं है. पार्टी मुख्यालय एक कॉर्पोरेट ऑफिस बन गया है जहां सीईओ से मिलना पूरी तरह से असंभव है.
पिछले चार सालों में जो सबसे महत्वपूर्ण खतरा उभरा है वह हमारे लोकतंत्र के लिए है. लोकतंत्र के संस्थान लगातार निंदात्मक व्यवहार से अपनी प्रतिष्ठा को कम कर रहे हैं. संसद का स्तर मज़ाक की हद से भी नीचे गिर रहा है. बजट सत्र के समाप्त होने से पहले प्रधानमंत्री ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर लगातार भंग हो रही संसद को लेकर कोई हल निकालने की कोशिश भी नहीं की. बाद में वह दूसरों पर दोष मढ़ने के लिए उपवास पर बैठ गए. सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले बजट सत्र का पहला भाग भी काफी छोटा रहा. मैं इसकी तुलना अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल से करना चाहूंगा जब हम सबको विपक्ष के साथ सामंजस्य बैठाने के कड़े निर्देश दिए गए थे ताकि संसद की कार्यवाही सही तरह से हो सके. इसीलिए हमारे पास किसी भी नियम के तहत स्थगन का प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव और अन्य चर्चाएं होती थीं जिनकी विपक्ष को ज़रूरत थी.
सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस हमारे लोकतंत्र के इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी. इससे यह बात भी सामने आ गई कि किस तरह हमारे देश की उच्चतम न्यायिक संस्था को दुखी करने के लिए मिली अनुमति से सड़ांध पैदा हो रही है. न्यायाधीशों ने भी लगातार बताया कि हमारा लोकतंत्र खतरे में है.
आज, ऐसा प्रतीत होता है कि संचार के साधनों, विशेष रूप से मीडिया और सोशल मीडिया को नियंत्रित करके चुनाव जीतना हमारी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य है और यह भी एक तरह का गंभीर खतरा है. मैं नहीं जानता कि आप में से कितने लोगों को अगले विधानसभा चुनावों में टिकट मिलेगा लेकिन मैं अगर पिछले चुनावों को गाइड मानकर चलूं तो आप में से आधे लोगों को तो टिकट नहीं मिलेगा. टिकट मिलने के बावजूद भी आपके चुनाव जीतने की संभावना काफी दूर प्रतीत होती है. पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा को सिर्फ 31 प्रतिशत वोट मिले थे. बाकी 69 प्रतिशत इसके खिलाफ थे. इसलिए यदि विपक्ष एकजुट हो जाता है तो आप कहीं नहीं ठहरेंगे.
वर्तमान स्थिति यह मांग कर रही है कि आप राष्ट्र हित में बोलें. मुझे यह बताने में खुशी है कि पार्टी के कम से कम पांच अनुसूचित जाति के सांसदों ने उनके समुदाय से किए गए वादों को पूरा न कर पाने के भ्रष्टाचार को ज़ाहिर किया. मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप सभी अपने मुद्दों पर स्पष्ट रूप से हमारे मालिकों के सामने अपनी राय व्यक्त करें. यदि आप चुप रहे तो आप देश के लिए बेहद गलत करेंगे. भविष्य की पीढ़ियां आपको क्षमा नहीं कर सकेंगीं. आज जो सरकार में हैं और जो वह देश की जनता को दे रहे हैं उनसे जवाबदेही मांगने का आपका अधिकार है. देश के हित में पार्टी की जगह बढ़ जाती है, जैसे कि पार्टी के हित में किसी व्यक्ति के हित को छोड़ दिया जाता है. मैं विशेष रूप से आडवाणी जी और जोशी जी को राष्ट्रीय हित में खड़ा होने और यह सुनिश्चित करने के लिए अपील करता हूं कि उन्होंने अद्वितीय बलिदान देकर जो मूल्य तय किए हैं, भविष्य की पीढ़ियां उसकी सुरक्षा करें और उस संरक्षित करने के लिए समय पर सुधारात्मक कदम उठाएं.

इसमें मुझे कोई शक नहीं कि कुछ मामूली सफलताएं भी प्राप्त हुई हैं लेकिन बड़ी असफलताओं ने उन पर पर्दा डाल दिया है. मुझे आशा है कि आप इस पत्र में उठाए गए मुद्दों पर गंभीरता से विचार करेंगे. कृपया लोकतंत्र और देश को बचाने के लिए साहस करें और बोलें.

अब अपनी बात-

निस्संदेह यशवंत सिन्हा बीजेपी के कद्दावरों में से एक रहे हैं. उनका नाम समझदार राजनेताओं में जोड़ा जाता है. उनके वित्तमंत्री के कार्यकाल को भी गौरवान्वित किया जाता है. पर पिछले कुछ सालों से वे लगातार बीजेपी के अंदर ही मोर्चा खोले हुए थे. और न्यू बीजेपी से उनका खिसियाना समझ भी आता है क्योंकि उनके कद और प्रभाव को अचानक से बीजेपी में बिल्कुल घटा दिया गया था. नई बीजेपी में मोदी-शाह की जोड़ी ही सबकुछ थी. पर उनके बेटे को न्यू बीजेपी में शामिल किया गया. उनका बेटा 2014 के कैंपेन (जिसमें सारे ही साम-दाम-दंड-भेद अपनाये गये थे) का हिस्सा रहा. वह भी वो हिस्सा जिसपर विदेशी कंपनी को पैसे देकर उसका मुखिया बनकर बीजेपी के लिये प्रचार कराने का आरोप लगा.
ज़ाहिर है यशवंत सिन्हा से यह बात नहीं छिपी रही होगी कि उनके बेटे ने एक विदेशी पीआर कंपनी का प्रमुख बनने का जिम्मा लिया है ताकि बीजेपी के 2014 के रास्ते को और स्मूथ किया जा सके. ऐसे में कुछ दिन पहले  उनका यह आरोप लगाना, अनभिज्ञ बनना और अब पार्टी छोड़ देना बेहद हास्यास्पद लगता है. आडवाणी और जोशी से उनकी गुहार भी इतनी ही हास्यास्पद लगती है क्योंकि अगर ओल्ड बीजेपी अपना एक फ्रैक्शन क्रियेट भी करने में सफल हो जाये तो वो कहीं भी न्यू बीजेपी के सामने टिकने वाली नहीं है. अच्छा है जल्दी से जल्दी सिन्हा इस बात को समझ लें. हमेशा से सिन्हा ‘द पार्टी विद अ डिफरेंस’ के प्रमुख नाम रहे हैं पर उनके लिये अभी जरूरी है कि वो इस बात को समझ लें कि ‘बीजेपी इज नो मोर अ पार्टी विद डिफरेंसेस.’ साथ ही आडवाणी, जोशी के साथ उन्होंने जो बोया है, उसे ही काट रहे हैं. शायद उन्होंने बीजेपी के अंधराष्ट्रवादी, कम्युनल और बेहद परंपरावादी नैरेटिव को खुद ही कंडेम्न किया होता तो ऐसा वक्त आकर सामने न खड़ा होता.

सॉरी यशवंत जी पर अब बहुत देर हो चुकी है. न आपके पास पाने को कुछ है, न ही खोने को. आप टीवी की सारहीन बहसों के कुछ देर के मुद्दे के अलावा अब भारतीय राजनीति में किसी मायने के नहीं रह गये हैं.

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