फिलहाल ‘मणिकर्णिका’ फिल्म पर एक ब्राह्मण जातीय समूह ने इतिहास से छेड़छाड़ का आरोप लगाया है. इस बात से आप सभी सहमत होंगे कि ‘उत्तरभारतीय हिंदू ब्राह्मण समुदाय’ बेहद पुरुषवादी रहा है. और उसने पूर्व में कभी ब्राह्मण अस्मिता के लिये झांसी की रानी ‘लक्ष्मीबाई’ तो क्या, किसी भी महिला का उदाहरण नहीं दिया है. और ‘लक्ष्मीबाई’ हमेशा से स्त्री के सशक्तिकरण के उदाहरण के तौर पर प्रयोग की जाने वाली एक चरित्र रही हैं. साथ ही यह भी साफ है कि यह ब्राह्मण समूह कोई भी ऐसा आरोप-प्रत्यारोप लगाने का प्रोत्साहन ‘पद्मावती’ फिल्म को लेकर किये गये राजपूत समूह के सफल (और लोकतंत्र के लिये बेहद घातक) प्रदर्शनों के चलते ही कर रहा है. ऐसे में पीयूष का लिखा यह संपादकीय पढ़ा जाना चाहिये. नहीं तो ऐसे लोगों के हौसले बढ़ते रहेंगे और अकर्मण्यता की प्रतिमूर्ति बन चुके राजनीतिज्ञ देश को गर्त में झोंकते रहेंगे.

-अविनाश द्विवेदी

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देश का एक जाति समूह, अपने छद्म जातीय अभिमान को लेकर आगे आता है। वह कला के ऊपर, एक फिल्म के ऊपर अपनी हिंसक तलवार चलाता है। सरकार नपुंसक की भांति यह तमाशा देखती रहती है। जिन्हें हमने अपने देश को भविष्य का पथ दिखाने के लिए नायक बनाया था। कब वह इतिहास की झूठी व्याख्याओं में जाति समूहों के चमचे बन गए, पता ही नहीं चला। संजय लीला भंसाली की पद्मावती पर कई राज्यों ने बैन लगाया, भंसाली कोर्ट गए। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि फिल्म सभी राज्यों में रिलीज होनी चाहिए। उसके बावजूद भी फिल्म राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और गोवा में नहीं रिलीज हुई। क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश पन्ने भरने की सनक भर रह गए हैं? क्या सरकार यह स्वीकार करेगी कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में विश्वास नहीं रखती और उसका सम्मान नहीं करती? मुझे लगता है कि हर उस नेता और मुख्यमंत्री को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए जो यह कह रहा हो कि हम अपने राज्य में फिल्म नहीं रिलीज कर सकते। वह उसे सुरक्षा नहीं दे सकते।
मैं पूछना चाहता हूँ कि उन्हें सरकार में बैठाया क्यों गया था? आप निर्भया को नहीं बचा सकते। आप किसानों को नहीं बचा सकते। आप अपने सैनिकों को नहीं बचा सकते। आप अपने बच्चों को कुपोषण से नहीं बचा सकते। जब आप कुछ भी नहीं बचा सकते तो खुद ही मर क्यों नहीं जाते? क्या कला अब एक जाति के हिसाब से चलेगी? कायरता के नमूने पहले भी देश में सामने आये हैं। एक महान चित्रकार से उसकी जन्मभूमि केवल इसलिए छीन ली जाती है क्योंकि कुछ लोगों को उसके चित्र अच्छे नहीं लगे। वे लोग जिन्हें यह भी नहीं पता होगा कि दो रंगों को मिलाकर तीसरा रंग कैसे बनाते हैं? उनके लिए जीवन हमेशा एक रंग में ही लिप्त रहा। जिन्हें झंडा पकड़ने की बीमारी हो गयी है। एक लेखक को इसलिए देश निकाला दे दिया जाता है क्योंकि उसके लिखे उपन्यास को पढ़कर एक समाज आहत हो गया और सरकार वोट बैंक बचाती रह गयी। एक फिल्मकार को थप्पड़ लगाए जाते हैं क्योंकि कुछ लोगों ने एक किताब की कहानी को सच मान लिया है और उसपर उनकी बपौती है। कहानियाँ किसी की बपौती नहीं हैं। एक की हज़ारों व्याख्याएं हो सकती हैं। इसी विश्व में एक देश में राम नायक हैं तो दूसरे में रावण। इस विविधता को स्वीकार करना ही होगा। वर्ना अपने कुँएं में मेढक की टर्र-टर्र करते रहो।
यह शर्मनाक है कि एक देश में गुंडों के समूह के सामने सरकार हाथ जोड़े खड़ी है। छप्पन इंच के सीने की माप क्या केवल मैडम तुसाद में मोम का पुतला बनाने के लिए की गयी थी? एक लोकतान्त्रिक देश में महत्वपूर्ण मुद्दों पर हमारे राजनेताओं की चुप्पी ही वह ताबूत गढ़ती है जिसमे हमारा भविष्य दफन हो जाता है। वे गुंडे गाड़ियों में आग लगा रहे हैं, बच्चों की बसों पर पथराव कर रहे हैं, कलाकार से लेकर सरकार तक को धमकी दे रहे हैं, न्याय की सम्पूर्ण प्रक्रिया का मजाक उड़ा रहे हैं और हम बैठ के उनका मुँह देख रहे हैं। क्या पैलट गन कश्मीर के लिए आरक्षित रखे गए हैं, क्या अब सारा सुरक्षा तंत्र केवल नेताओं, उनके परिवारों और पूंजीपतियों की सुरक्षा के लिए नियुक्त कर दिया गया है? क्या प्रधानमंत्री का काम विश्व के नेताओं और उनके बेटा-बेटियों के स्वागत-सत्कार तक सीमित रह गयी है? गांधी का आश्रम पूरी दुनिया को दिखाईये लेकिन उनके विचारों को अपने ही समाज से मिटा दीजिये।
राजपूत होने का घटिया अभिमान पालकर, हिंसक पशु बन घूम रहे इन गुंडों को सबक सिखाने की जरुरत थी पर सरकार का क्या है, उन्हें तो वोट बैंक बनाना था और घृणा, नफरत और हिंसा तो उनकी विरासत ही है। यह एक वाजिब सवाल है कि युद्ध में पाकिस्तान और चीन को हरा देने का दावा करने वाली यह सरकार 1000 गुंडों के सामने घुटने टेके बैठी है। झूठ के छिलके उतरेंगें और वह भयानक चेहरा और वे छुपाई गयी विफलतायें ऐसे ही सामने आएंगीं जिसमे 1992 से लेकर 2002 तक की काली करतूतें छिपाई गयी हैं।

राजपूतों के लिए तो बस इतना ही कहूंगा कि तुम्हारा गुणगान तो महाभारत का शांतिपर्व कर रही रहा है :-

धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम
धिगस्त त्वमरषर्म येनेमामा पदम् गमिता वयं

क्षत्रियों के आचार बल पुरुषार्थ और अमर्ष को धिक्कार है। जिनके कारण हम ऐसी विपत्ति में पड़ गए।

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कैमूर की पहाड़ियों के अंचल में पले-बढ़े पीयूष किशोरावस्था में पहुंच रहे थे कि बनारस आना पड़ा. जहां उनको पढ़ने के दौरान अपने से दोगुनी उम्र के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधछात्रों की सोहबत मिली. जाहिर है दिमाग दौड़ कर उम्र से आगे निकल गया. पीयूष रंजन परमार साहित्यिक गोष्ठियों और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं में ध्रुवतारा हो गये. दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया पर महानगर के कोलाहल को, शिक्षा-साधना के अनुकूल न पाकर उसी साल वापस काशी हिंदू विश्वविद्यालय लौट आये और यहां प्रवेश-परीक्षा के टॉपर के तौर पर राजनीति विज्ञान के छात्र बन गये. फिर चाहे पढ़ाई का मसला रहा हो या पाठ्येतर गतिविधियों का, तीन-साल-धुआंधार गुजारकर पीयूष पत्रकारिता की पढ़ाई करने भारतीय जनसंचार संस्थान वाया कानपुर पहुंच गये. गांधीवादी सिद्धांतों में अडिग विश्वास वाले पीयूष वर्तमान में मुंबई में रहते हैं और सोनी टीवी नेटवर्क में कार्यरत हैं. अभी तक वो 'पेशवा बाजीराव' और 'पहरेदार पिया की' धारावाहिकों की संकल्पना में शामिल रहे हैं.

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