पिछले कुछ दिनों से बिहार के सात जिले साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहे हैं. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो परेशान करने वाले तो हैं ही, लेकिन यह भी स्पष्ट तौर दिखाते हैं कि प्रशासन सांप्रदायिक दंगों को रोकने में नाकाम रहा है. नहीं तो एक चप्पल उछाले जाने से इतनी सांप्रदायिक स्थिति का खड़ा होना असंभव होता. एक वीडियो में प्रशासन का एक आदमी भीड़ के बीच से एक हवलदार के साथ चुपचाप निकलता दिख रहा है. यह अनदेखी मुझे बाबरी विध्वंस की उन तस्वीरों की याद दिला रही है जब अयोध्या के बड़े अधिकारी बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के दौरान दूर लगे मचान पर चाय की चुस्कियों का मजा ले रहे थे. बिहार की घटना से पहले आपको दो घटनाओं के बारे में बताना चाहता हूं ताकि संकट का अंदाजा आपको भी हो सके.
अक्टूबर 2014 की बात है. दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में सांप्रदायिक घटनाएं घटी थीं. क्योंकि मैं छात्र राजनीति में सक्रिय था इसलिए मेरे संगठन एसएफआई ने फैसला लिया कि हिंसा से पीड़ित लोगों से मुलाकात की जाए. जब इलाके में पहुँचे तो अनजान सा सन्नाटा फैला हुआ था.लोग शक भरी नजरों से एक दूसरे को देख रहे थे. इसी बीच, हमारी टीम शफीक (बदला हुआ नाम) से मिली. वे एक आम शख्सियत के उम्रदराज आदमी थे. हमने जब घटना के बारे में जानना चाहा तो वे अपनी राख हो चुकी तीन मंजिला दुकान में ले गए. दुकान आलीशान रही होगी क्योंकि ढेर सारा सामान बिखरा पड़ा था. यह आदमी जो मेरे सामने सामान्य ढंग से खड़ा था, नुकसान के अनुमान के सवाल पर फफक कर रोने लगा. उसने बताया कि उसके घरवाले सदमे में हैं. बेटा बेसुध पड़ा है और बिटिया की सिविल परीक्षाओं की कोचिंग अधर में लटक गई है. जब वो थोड़ा संभले तो कहा कि उनकी दुकान को इसलिए भी निशाना बनाया गया क्योंकि वो कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे.
ये बात भी समझ में आई कि दंगाई आग लगाने से ज्यादा यह संदेश देना चाहते थे कि अल्पसंख्यकों के पास राजनैतिक विकल्प चुनने की भी छूट नहीं है. इस घटना ने मुझे दंगों की मानवीय कीमत बताई.
इस बड़े किस्से के बाद छोटा किस्सा भी सुन लीजिए. दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में 2013 में आम आदमी पार्टी एक राजनैतिक शक्ति बनकर उभरी थी. तभी एक चौंका देने वाली घटना हुई. टीवी शो पर पार्टी का चेहरा रही महिला नेता शाज़िया इल्मी चुनाव हार गयी थीं. वो आरके पुरम चुनाव क्षेत्र से लड़ रही थीं. जब हार के कारणों की जाँच-पड़ताल हुई तो अपुष्ट तौर पर पता चला कि आरकेपुरम में मोतीबाग इलाके के सिख मतदाताओं ने इल्मी को इसलिए वोट नहीं दिया था क्योंकि वो मुसलमान थीं. मोतीबाग में रहने वाले अधिकतर सिख बंटवारे के बाद दिल्ली आए थे और आज भी 1947 की त्रासदी भूल नहीं पाए थे. नफरत में घुटा हुआ समाज एक ज्वालामुखी होता है जो अंदर से धधक रहा होता है.
यही बात बिहार के परिप्रेक्ष्य में भी समझनी जरूरी है. नीतीश कुमार बिहार के तीन दफा मुख्यमंत्री रह चुके हैं. राजनैतिक मजबूरियों को ध्यान में रखते हुए नए गठबंधन बनाना और पुराने गठबंधन तोड़ना भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है.
लेकिन इस हिंसा में उनके लिए कई निहितार्थ छुपे हुए हैं. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट ने आंकड़ों के माध्यम से समझाया कि भारत में सांप्रदायिकता का चेहरा भी बदल रहा है. इसकी एक बानगी उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले देखने को मिली जहां hindutva की शक्तियों ने नियमित तौर पर सांप्रदायिक तनाव बनाए रखा .भले बड़े दंगे ना हों, लेकिन छोटी घटनाएं ध्रुवीकरण को कम होने नहीं देतीं.
रिपोर्ट बताती है कि 2010 से 2016 के बीच उत्तर प्रदेश में 12000 सांप्रदायिक घटनाएं हुईं. ऐसी घटनाएं बड़े दंगों के मुकाबले कहींं ज्यादा प्रभावकारी होती हैं क्योंकि वो लोगों के जेहन में लम्बे समय तक बनी रहती हैं.
दूसरा पहलू यह है कि ऐसी परिस्थितियों में हमेशा फायदा भाजपा का हुआ है. ऐसी घटनाएं आने वाले समय में सुनिश्चित करेंगी कि भाजपा अपने वोट प्रतिशत के साथ सीटों की संख्या भी बढ़ाए. क्या नीतीश कुमार को राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत मंजूर होगी ?
सांकेतिक तस्वीर
तीसरा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि नीतीश कुमार भले ही राजनैतिक अवसरवाद के शिकारी हों, अभी तक उन पर बौद्धिक तौर पर भ्रष्ट होने का आरोप नहीं लगा. इससे मेरा तात्पर्य यह है कि क्या नीतीश सत्ता के लिए बिहार को ऐसा राज्य बना देंगे जहाँ लोग एक दूसरे को शक की नजरों से देखें, जिसकी फिजा में सांप्रदायिक जहर घुला हो. अपनी मेहनत से न जाने कितने शहरों को खड़ा करने वाला बिहारी मजदूर अब हिन्दू बिहारी और मुस्लिम बिहारी कहलाने लगेगा? क्या नीतीश इन सवालों के साथ बौद्धिक रूप से भ्रष्ट नेता कहलाएंगे!!

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यह लेख रवि कौशल ने लिखा है. रवि कौशल पत्रकार हैं और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के संजीदा विद्यार्थी भी.

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