“हम खाली हाथ वापस जाने के लिए इतनी दूर पैदल चल कर नहीं आये हैं। सरकार हमें जेल में डाल दे, हम पर गोलियाँ चला ले लेकिन हमने हमारी जमीनें वापस कर दे। वे हमारी जमीनें हैं, हमारे बच्चों के लिए हैं।“

-गणपत दुगडु शेवटे – एक आंदोलनकारी किसान

180 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर 35000 किसान 11 मार्च को नासिक से मुंबई पहुँच गए। अपनी जमीन पर अपने हक़ और क़र्ज़ माफ़ी के लिए आवाज उठा रहे ये किसान विधानसभा घेरने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। फ़िलहाल प्रशासन ने उन्हें सायन के सोमैया मैदान में रोक रखा है। अखिल भारतीय किसान सभा के झंडे तले हो रहे इस आंदोलन को महाराष्ट्र के सभी बड़े दलों का समर्थन मिल चुका है।

अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक धावले और एक स्थानीय विधायक जे पी गवित इस मार्च की अगुआई कर रहे हैं। कठफोड़वा की टीम से बात करते हुए अशोक धावले ने कहा कि 12 तारीख की आधी रात को ही किसानों का जत्था विधानसभा की ओर कूच करेगा ताकि बोर्ड परीक्षा में शामिल हो रहे छात्रों को कोई परेशानी न हो। इस तरह किसानों ने अपनी नींद की भी बलि दे दी है। धावले जी ने आंदोलन की 3 प्रमुख मांगों का ज़िक्र किया-

1. वन विभाग द्वारा कब्ज़ा की गयी जमीनों का मालिकाना हक़ किसानों को वापस दिया जाये.

2. भाजपा सरकार अपने वादों के मुताबिक किसानों का क़र्ज़ माफ़ करे.

3. किसानों की आत्महत्या को रोकने के लिए समुचित कदम उठाये जाएँ और एम् एस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जायें.

नासिक जिले के सोनगांव के जगन्नाथ शार्दूल ने बताया कि वे जिन जमीनों पर पीढ़ियों से खेती करते आ रहे थे, अचानक वन विभाग ने उन्हें उससे बेदखल कर दिया। उन जमीनों को उन्होंने कुदाल से खेती लायक बनाया था लेकिन अब अधिकांश हिस्से में घास उग आती है। वे अब भी चोरी छिपे कुछ हिस्सों पर खेती करते हैं क्यों कि जीविका के लिए यह जरुरी है लेकिन अब उस जमीन पर उनका मालिकाना हक़ नहीं रहा। ना ही उनके नाम से अब बिमा होता है और ना ही वे लोन ले सकते हैं। इस तरह किसान होना नाम के लिए रह गया है और वे किसानी से जुडी किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं ले सकते। चुकी जमीनें भी बेहद कम हैं, उन्हें खेती के अलावा मजदूरी भी करनी पड़ती है। मुख्यतः मूँगफली, सोयाबीन और मक्का की खेती करने वाले छोटे किसान इससे अधिक परेशान हैं।

आंदोलन की व्यवस्था:

आंदोलन को सुचारु रूप से चलाने के लिए प्रत्येक गाँव से एक गाड़ी आयी है जिसमें उस गाँव से आये लोगों के भोजन पानी की व्यवस्था है। यह व्यवस्था किसानों ने स्वयं मिल कर की है। एक राजनीतिक दल द्वारा भोजन वितरण के बारे में पूछने पर एक किसान ने कहा कि हमलोग उनके आश्रय पर इतनी दूर नहीं आये हैं। हम अपना खाना पीना खुद लेकर आये हैं। आत्मविश्वास और उम्मीद से लबरेज़ ये किसान, झुकने को तैयार नहीं दिख रहे।

आंदोलन की विशेषता:

कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन को महाराष्ट्र के सभी दलों ने अपना समर्थन दे दिया है। कांग्रेस, आप पार्टी, शिव सेना, राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी, राजठाकरे और बहुत से दलों ने समर्थन की घोषणा की है। बहुत से दल आंदोलन को नैतिक और भौतिक सहायता भी प्रदान कर रहे हैं। 11 मार्च को मुंबई के सोमैया मैदान में किसानों के पहुँचने पर राजठाकरे उनको सम्बोधित करने पहुंचे जहाँ किसानों ने ‘राज ठाकरे को लाल सलाम’ कह कर उनका स्वागत किया।

 

आंदोलन में स्त्री भागीदारी एक महत्वपूर्ण पहलू है। एक बहुत बड़ी संख्या में महिलायें भी पैदल यात्रा करते हुए आंदोलन के साथ मुंबई पहुंची हैं।
मुंबई के डब्बा वाला समूह ने आंदोलन में शामिल सभी किसानों के एक दिन के भोजन की जिम्मेदारी स्वयं पर ली है। उन्होंने आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की।

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मुंबई में कठफोड़वा के साथी विनय और सुशील लगातार किसानों के साथ बने हुये हैं. इस लेख के इनपुट और तस्वीरें- विनय और सुशील के मार्फत.

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कैमूर की पहाड़ियों के अंचल में पले-बढ़े पीयूष किशोरावस्था में पहुंच रहे थे कि बनारस आना पड़ा. जहां उनको पढ़ने के दौरान अपने से दोगुनी उम्र के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधछात्रों की सोहबत मिली. जाहिर है दिमाग दौड़ कर उम्र से आगे निकल गया. पीयूष रंजन परमार साहित्यिक गोष्ठियों और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं में ध्रुवतारा हो गये. दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया पर महानगर के कोलाहल को, शिक्षा-साधना के अनुकूल न पाकर उसी साल वापस काशी हिंदू विश्वविद्यालय लौट आये और यहां प्रवेश-परीक्षा के टॉपर के तौर पर राजनीति विज्ञान के छात्र बन गये. फिर चाहे पढ़ाई का मसला रहा हो या पाठ्येतर गतिविधियों का, तीन-साल-धुआंधार गुजारकर पीयूष पत्रकारिता की पढ़ाई करने भारतीय जनसंचार संस्थान वाया कानपुर पहुंच गये. गांधीवादी सिद्धांतों में अडिग विश्वास वाले पीयूष वर्तमान में मुंबई में रहते हैं और सोनी टीवी नेटवर्क में कार्यरत हैं. अभी तक वो 'पेशवा बाजीराव' और 'पहरेदार पिया की' धारावाहिकों की संकल्पना में शामिल रहे हैं.

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