कोबरापोस्ट (Cobrapost) ने एक स्टिंग सीरीज जारी की है. जिसमें उनके पत्रकार गुप्त कैमरा लेकर स्टिंग कर रहे हैं. इस क्रम में वह हिंदी मीडिया के तमाम डिजिटल पोर्टल के ऑफिसों में जाते हैं. और वहां पर कंटेट के प्रसारण से संबद्ध टीम से बीजेपी या संघ परिवार के व्यक्ति के रूप में बात करते हैं. इस क्रम में वे लगभग सभी के सामने तीन बिंदुओं को लेकर अपनी बात रख रहे हैं. वे बिंदु हैं-
1. डिजिटल माध्यम के जरिए तरह-तरह से सॉफ्ट हिंदुत्व का प्रसारण किया जाये
2. बीजेपी या संघ परिवार के विरोधियों के खिलाफ कंटेट का प्रसारण किया जाये
3. बीजेपी या संघ परिवार के खिलाफ दिखाई जा रही ख़बरों को दबाया जाये
इन सभी बिंदुओं पर लगभग सारे ही समाचार पोर्टलों के पदाधिकारी हामी भरते दिख रहे हैं. इसे देखने के दौरान एक जागरुक दर्शक थोड़ा सा आश्चर्यचकित तो जरूर होता है पर उसका मीडिया से विश्वास पूरा नहीं उठता. जिसके ये कारण हैं-
1. इन सारे ही मामलों में कोई भी ऐसा समाचार पोर्टल नहीं है जो अंग्रेजी में भी समाचार प्रसारित करता हो. हालांकि दैनिक जागरण एक ऐसा समूह जरूर है जिसके पास अंग्रेजी पोर्टल के भी स्वामित्व हैं पर यहां अंग्रेजी के पोर्टल के किसी व्यक्ति से बात न करके हिंदी के पदाधिकारियों से बात की गई है. साथ ही किसी स्वामित्व रखने वाले व्यक्ति से यह बातचीत नहीं की गई है. यह बातचीत पदाधिकारियों से की गई है जो खुद समाचार पत्र में कर्मचारी ही होते हैं. ऐसे में यह बात साफ है कि कोबरापोस्ट को भी पता था कि आसान शिकार कौन हो सकते हैं? इसीलिये जागरण के किसी मेन ऑफिस की बजाए एक छोटे शहर के ऑफिस को चुना गया है.
2. अंग्रेजी वाली बात के अपवाद स्वरूप ‘स्कूपव्हूप’ का जिक्र इस संदर्भ में जरूरी है क्योंकि अपनी आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे स्कूपव्हूप जैसे स्टार्टअप को ऐसे झांसे में ले लेना खासा मुश्किल नहीं रहा होगा.
3. किसी बड़े अंग्रेजी अख़बार का जिक्र इसमें नहीं है. ज़ाहिर है या तो वहां प्रयास नहीं किया गया होगा. या फिर वहां ऐसे फासने में सफलता नहीं मिली होगी.
4. ऐसे कर्मचारी जो ज्यादातर मार्केटिंग से जुड़े हैं, इसके लिये राजी हो रहे हैं, इसके मायने ये हैं कि वे इसे बिल्कुल असहज करने वाली स्थिति नहीं पा रहे हैं. साथ ही उनके ऊपर कंपनी का मुनाफा बढ़ाने का बहुत दबाव भी है. साथ ही एडिटोरियल टीम की बजाए कंटेट मार्केटिंग टीम निर्धारित करने लगी है.
5. इन कर्मचारियों के साथ एक और बात भी समझ में आ रही है कि जरूर इनके लिये किसी व्यक्ति का ऐसे ऑफर करना साधारण बात है. ऐसे में या तो वे ऐसे ऑफरों के आदी हैं. या यह मानकर चल रहे हैं कि ऐसे तो सभी करते हैं, हमें करने में क्या हर्ज है?
6. पत्रकारीय मूल्य ही नहीं पत्रकारिता की समझ भी तेजी से नीचे गिरी है. पत्रकारिता को शोबिज मानकर चले आये पत्रकारों के लिये पत्रकारिता पहचान नहीं तो पैसा बनाने का जरिया हो चुका है. ऐसा पैसा बनाने के चक्कर में वो ये भी भूल जाते हैं कि सामने वाला व्यक्ति जो हमें ऐसा कोई रैंडम ऑफर कर रहा है, जरा उसकी विश्वसनीयता तो जांच ली जाये. ज़ाहिर सी बात है कि पत्रकार ‘पुष्प’ की बातें सुनने के बाद भी वे उन पर शक करने, उनसे सवाल करने के बजाए, अपनी टूटी रीढ़ के चलते बाकायदा उनके ऑफर में रुचि लेते हुये गलतियां करते चले जा रहे हैं.
कोबरापोस्ट के इस स्टिंग से साफ है कि मीडिया जबसे उसके मालिकों के लिये अथाह मुनाफा कमाने की चाहत में प्रयोग होने शुरू हुआ, अपनी विश्वसनीयता खोता चला गया. खासकर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में चिंदी फंडिंग होती है. यहां काम करने वाले मजदूर पत्रकार अंडरपेड हैं. मार्केटिंग टीम पर मुनाफा कमाने का तगड़ा दबाव है. बिकने-बिकवाने को एक नॉर्म बना दिया गया है. खासकर मालिकों के समझौते देखकर नीचे के स्तर के कर्मचारी-अधिकारियों का ऐसे समझौते करने की बात बहुत चौकाने का सबब नहीं होना चाहिये पर चिंता का सबब जरूर होना चाहिये क्योंकि ज्यादातर भारतीयों के पास पहुंचने वाले वर्नाकुलर मीडिया की रीढ़ पूरी तरह टूट चुकी है. दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का चौथा खंभा ढह चुका है. जो इस अशुभ संकेत की ओर इशारा कर रहा है कि भारतीय लोकतंत्र की इमारत अब किसी भी दिन ढह सकती है.

एक नज़र उन अखबारों और चैनलों की लिस्ट पर जो पैसा लेकर न्यूज छापने को राजी हुये-

1- दैनिक जागरण 
2- इंडिया टीवी
3- साधना प्राइम
4- हिन्दी खबर
5- स्कूप हूप 
6- सब टीवी’, ‘
7- अमर उजाला
8- डीएनए
9- यूएनआई 
10- समाचार प्लस
11- 9एक्स’
12- पंजाब केसरी
13- rediff.com

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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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