उत्तर प्रदेश के लिए बीते दो सालों से मार्च का महीना राजनीतिक विश्लेषणों का होता आया है. 2017 में तीन-चौथाई बहुमत के बाद प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री चुनने के लिए खूब दिमाग लगाया गया. इस बार चर्चा के केंद्र थे पूरब के दो केसरिया ठिकाने. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनावों में गठबंधन जीत गया, लेकिन जमीनी स्तर पर कई ऐसे सवाल हैं, जिन पर ध्यान नहीं दिया गया. कम मतदान प्रतिशत के बीच भारतीय जनता पार्टी के कोर वोटर वोट डालने नहीं निकले. इसकी एक वजह नाराजगी भी है. बीजेपी ने हिंदुओं के ध्रुवीकरण का दांव चला, लेकिन मुस्लिम एक ही रहे. तमाम बातों के बीच विश्लेषकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यूपी के लोग मोदी को एक उम्मीद के तौर पर देखते हैं. वह आते और जनता से सीधा संवाद करते तो तस्वीर अलग होती.

फूलपुर लोकसभा सीट

– दलित और पिछड़ों के वर्चस्व वाली सीट पर 2014 में केशव प्रसाद मौर्य ने कब्जा जमाया था. पिछड़े वर्ग से आने वाले मौर्य पर आरोप है कि उन्होंने क्षेत्र के ब्राह्मण, बनियों और राजपूतों की पूरी तरह उपेक्षा कर दी. जिस बाहरी पटेल उम्मीदवार को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया, वो इलाहाबाद में बाहरी माना गया. यहां बहुतायत में मौजूद पटेलों को यह अखर गया.
– मतदान 37 प्रतिशत हुआ. इलाहाबाद उत्तरी सीट, जहां बीजेपी के परंपरागत अगड़ी जाति के वोटर बहुतायत में हैं, वहां 21 प्रतिशत वोट डाले गए. मतलब साफ, आलस या नाराजगी. बीजेपी हिंदुओं का ध्रुवीकरण चाहती थी, लेकिन मुस्लिम एक हो गए. माफिया डॉन अतीक अहमद और गठबंधन के उम्मीदवार के बीच मुस्लिमों के वोट का बंटवारा 30:70 का रहा.
– गठबंधन के जीतने के बाद सबसे अहम पक्ष यह है कि चुनाव प्रचार से लेकर विजय जुलूस तक बीएसपी के कार्यकर्ता कहीं नहीं दिखे. जानकारों का कहना है कि सपाई ही बसपा के झंडे लेकर माहौल बना रहे थे.

गोरखपुर लोकसभा सीट

– मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस सीट पर 2014 में 5 लाख से ज्यादा वोट मिले थे. दूसरे नंबर वाले प्रत्याशी को 4 लाख 35 हजार वोट मिले. इस बार सपा को 4 लाख 56 हजार और भाजपा प्रत्याशी को 4 लाख 34 हजार वोट मिले. गोरखपुर शहर से बीजेपी को मोटे तौर पर एक लाख वोटों की लीड मिलती थी, जो इस बार घटकर 35 हजार रह गई. मतलब, वोटरों की उदासीनता. कारण कई हैं इसके.
– बतौर सांसद योगी जनता की शिकायतें तुरंत सुनते थे. अधिकारी उनके नाम से कांपते थे, लेकिन अब सब कुछ नौकरशाही के हाथ चला गया. जनता के महाराजजी उनसे दूर हो गए.
– बीजेपी की गुटबाजी बड़ा कारण रही. कई स्थानीय विधायकों की कोई नहीं सुनता तो कोई अपनी पीड़ा बताता है.
– पिछले लंबे समय से गोरखपुर ने मठाधीशों को ही अपना प्रतिनिधि बनाया है, लेकिन इस बार मठ से कोई नहीं था.
– संघ की खामोशी के बीच युवा वाहिनी ने काम किया लेकिन नतीजा हार के रूप में सामने है. माने संघ और बीजेपी जो काम कर सकते हैं युवा वाहिनी के बस का नहीं. हिंदू युवा वाहिनी आज भी योगी आदित्यनाथ का जेबी संगठन ही है.

अब सुनिए खरी-खरी

बीजेपी से जनता को अपार आशाएं थीं, लेकिन सब अधूरी हैं. योगी आए तो एंटी रोमियो दस्ता दिखा, लेकिन कुछ महीनों में ही दस्ते लापता हो गए.
गली-गली गुंडागर्दी हो रही है, लेकिन सरकार के पास न जाने कौन से आंकड़े पहुंचते हैं और उन्हें जनता की बात सुनाई क्यों नहीं देती?
योगी कहते हैं कि प्रदेश में एक साल में एक भी दंगा नहीं हुआ, लेकिन बुधवार को संसद में बताया गया कि यूपी में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक हिंसा हुई.
सरकार कुछ मंत्रियों के इर्द-गिर्द घूम रही है. ये मंत्री अफसरों के साथ थे मतलब जनता से पूरी तरह संवाद खत्म. योगी भी लखनऊ मीडिया के अलावा हर जगह मीडिया से दूरी रखते हैं.
जमीनों पर कब्जे हटाने की मीडिया कार्रवाई के बीच बड़े पैमाने पर नए सिरे से कब्जों का खेल शुरू हो गया.
यह सरकार भी लखनऊ और ब्रैंडिंग से बाहर नहीं आ पाई. एक भी प्रॉजेक्ट जमीन पर नहीं आया. जनता क्रोध में है. केंद्र का एक भी प्रॉजेक्ट जमीन पर नहीं दिखा.
बीजेपी के कोर वोटर बहुत नाराज हैं. नोटबंदी, जीएसटी और अब नए किस्म की स्थितियों में वे पार्टी से कुपित हैं. उनके लग रहा है कि केंद्र-प्रदेश ने उन्हें छला है. ये तकरीबन वैसा ही मामला होता दिख रहा है, जैसा बीएसपी के कोर वोटर के नाराज होने पर मायावती के साथ हुआ था.
योगी और भाजपा की यूपी टीम विधानसभा सीट तो जीतने में सक्षम है लेकिन बड़े मुकाबलों का इनमें माद्दा नहीं दिखता.

अब क्या होगा?

मोदी-शाह को हल्के में सबसे बड़ी भूल होगी. ये दोनों उपचुनाव में पहुंचे ही नहीं. मोदी के तरकश में इतने तीर हैं कि वह विपक्ष को आसनी से ढेर कर सकते हैं. संघ के काडर ने दोनों जगह काम नहीं किया. संघ ने बड़े पैमाने पर अपने प्रचारकों और संगठन को बदला है. नाराज कार्यकर्ताओं को समझाया जा रहा है कि अच्छे दिन आएंगे.
बीते दिनों नागपुर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि जो सफलताओं में व्यक्ति नहीं परिस्थितियां भी अहम होती हैं. इसे समझिए. निशाना कौन है?
शायद बीजेपी संघ की उम्मीदें नहीं पूरी कर पाई. 2019 में जीतना है तो स्वयंसेवकों के बिना यह असंभव है. संघ का भरोसा जीतना होगा.
अखिलेश भले ही दो सीट जितवा लाए, लेकिन शिवपाल फैक्टर को कोई न भूले. मुलायम भले ही पुत्रमोह में बीएसपी से गठबंधन स्वीकार कर लें, लेकिन शिवपाल दुश्मनी नहीं भूलेंगे. पलटवार तो होगा, शायद अगले साल बीच चुनाव में. मुलायम के तैयार किए नेताओं ने बड़े पैमाने पर गठबंधन का विरोध किया है.
फूलपुर में बसपाई नहीं दिखे. लंबे समय से खामोश बसपा कैडर को जगाकर एसपी के साथ चलने के लिए मनाना इतना आसान नहीं होगा. गठबंधन की बात तो ठीक है, लेकिन कहीं विपक्ष के तुरुप के इक्के कुछ जल्दबाजी में तो नहीं खुल गए?

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लेखक वरिष्ठ रिपोर्टर हैं और कई राष्ट्रीय अखबारों में सेवायें दे चुके हैं. वर्तमान में एक राष्ट्रीय मीडिया हाउस से संंबद्ध.

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