पश्चिमी दिल्‍ली में एक 23 साल के लडके की उसके घर के पास हत्‍या कर दी गई. पुलिस के मुताबिक़ लड़के के 20 साल की एक मुस्लिम लड़की के साथ संबंध थे. इसी बात से छुब्ध हो कर लड़की के परिवार वालों ने कई बार की तनातनी के बाद लड़के का गला रेत दिया.

पुलिस के अनुसार लड़की के माता-पिता, उसके चाचा और 16 साल के भाई को इस रिश्‍ते से आपत्ति थी. उन्‍होंने गुरुवार दोपहर को अंकित को घेर लिया और उसे लड़की से दूर रहने की चेतावनी दी. फिर बहस के बाद लड़की के पिता ने अंकित का गला रेत दिया और भाग गए. हत्‍या के बाद बड़ी संख्‍या में लोग अंकित के घर के बाहर जमा हो गए और रघुबीर नगर में तनाव फैल गया.

देश की राजधानी में घटी यह घटना चौकाने वाली है. सुदूर गाँवों में ‘सम्मान’ के लिए की गयी हत्याओं का सिलसिला अब भी नहीं थमा है और अब लगातार शहरी भागों से भी इस तरह की खबरें आने लगी हैं. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि जब ‘सम्मान’ के लिए की गयी हत्याओं में दोनों पक्ष अलग-अलग धर्म के होते हैं, तो ऑनर किलिंग की घटना को दूसरा रूप दे कर माहौल खराब करने की कोशिश भी की जाती है. अंकित की निर्मम हत्या के बाद इस की शुरुआत भी हो चुकी है.

सुदर्शन न्यूज ने इस घटना को कवर करते हुए लिखा है कि-

“कासगंज के चन्दन की चिता की राख भी ठीक से ठंडी नही हुई थी कि दिल्ली में उससे भी वीभत्स कत्ल हुआ है एक हिन्दू युवक का. इस बार आक्रांताओं ने 23 साल के हिन्दू युवक अंकित का दिल्ली में किया क़त्ल, फिर काटा गया सिर. विदित हो कि समाजवादी पार्टी द्वारा खुल कर हिन्दू विरोध दिखाए जाने के चलते ही अब दुस्साहसिक आक्रांताओं के हौसले आसमान को छू रहे हैं. अरविंद केजरीवाल की घोर तुष्टिकरण की नीति व प्रचंड हिन्दू विरोध के चलते उनके शासी प्रदेश में बुलन्द हौसलों वाले मज़हबी कट्टरपंथी ने दिल्ली में दिखाया है ईराक जैसा नज़ारा… नेताओं के एकतरफा हिन्दू विरोधी बयानों के चलते की राजधानी दिल्ली में एक हिन्दू युवक के सर को काटकर उसकी हत्या कर दी गई है.”

दिल्ली की यह घटना भी सांप्रदायिक भटकाव से अछूती नहीं है. खबर है कि इलाके में साम्प्रदायिक तनाव का माहौल है. पुलिस ने एक कमांडो यूनिट और दो दर्जन से ज्‍यादा पुलिसवाले यहां तैनात कर दिए थे. लड़के के घर के पास, अंतिम संस्‍कार की जगह और अंकित सक्‍सेना के घर के बाहर बीएसएफ जवानों को तैनात किया गया है.

सवाल यह है कि इन सब की जरूरत क्यों पड़ी? ऑनर किलिंग के पिछड़ी सोच सम्बंधी मसले को साम्प्रदायिकता की तरफ कैसे मोड़ दिया जाता है? ध्यान दीजिये यह इस तरह का पहला मामला नहीं है. पिछली साल जब झारखंड के गुमला जिले में 19 वर्षीय एक मुस्लिम युवक को हिन्दू लड़की से प्रेम संबंधों के चलते खंभे से बांधकर बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया तो वहां भी साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़े जाने का प्रयास किया जाने लगा. हालांकि बाद में पुलिस अधीक्षक (एसपी) चंदन कुमार झा ने जानकारी दी कि यह वारदात ‘अफेयर की वजह से हुई और यह सांप्रदायिक घटना नहीं है.’

यह सावधान रहने का समय है. न्यायालय अपना काम करेगा. हत्यारों को जरूरी सजा अवश्य मिलनी चहिये. लेकिन इस तरह की घटना ने एक समाज के तौर पर हमें फेल कर दिया है. दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक जब अंकित के साथ ख्याला इलाके में मारपीट हो रही थी तो उस समय काफी संख्या में लोग तमाशबीन बने हुए खड़े थे. अंकित ने चिल्ला-चिल्लाकर लोगों से मदद भी मांगी थी. उस समय कोई आगे कोई क्यों नहीं आया? हत्या के इतने चश्मदीद होने के बाद इस लड़के को बचाया क्यों नहीं जा सका? लोगों ने बीच में पड़ना ही सही नहीं समझा. यह घटना का सबसे ज्यादा दुखद पहलू है.

इस भयावह घटना को देखते हुए सरकार से एक उम्मीद की जा सकती है. क्या सरकार दो अलग-अलग धर्मों के बीच प्रेम विवाहों को प्रोत्साहित करने में किसी तरह का योगदान दे सकती है? क्या दो भिन्न धर्मों के प्रेमी युगलों को (जिनकी जान को खतरे की सम्भावना हो) सरकार किसी तरह की सुरक्षा मुहैया करा सकती है? क्या सरकार ऑनर किलिंग के खात्मे और अंतर्धार्मिक प्रेम विवाहों के बढ़ावा देने के लिए कोई व्यापक अभियान चला सकती है?

अंकित की हत्या के सन्दर्भ में कानून अपना काम कर रहा है. आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया गया है. कार्रवाई तो उचित है लेकिन क्या कानून के पास इस समस्या का हल है? कानून सिर्फ दवा देता है, रोग पैदा ही न हो यह समाज का काम है. तीन साल पहले मैंने अखबार में एक घटना के बारे में पढ़ा था. एक मुस्लिम परिवार ने अपनी बेटी की सड़क पर गला रेत कर हत्या इसी तरह के प्रेम सम्बन्ध की वजह से कर दी थी. आरोपी पकड़े जाने के बावजूद शर्मिंदा नहीं थे क्योंकि उन्हें यह यकीन था कि उन्होंने यह कत्ल अपने घर की इज्जत की रक्षा के लिए किया है.

यह मानसिकता कब जायेगी कि दूसरे जाति-धर्म के लड़के से अपने जाति-धर्म का लड़का/लड़की हजार कमियों के बावजूद भला है. सिर्फ इतना ही नहीं, अगर इससे कुछ उलट हो तो लड़का या लड़की में से किसी एक की या दोनों की हत्या करना घर की इज्जत की रक्षा करना नहीं है. इसलिए इस तरह के तमाम मामलों को देखते हुए इसके समाज वैज्ञानिक इलाज की जरूरत भी है. नहीं तो लोग सिर्फ सजा पाएंगे और हत्याएं जारी रहेंगी.

यह बेहद आसान है कि इस घटना को सुन कर भावुक होते हुए खुद को एक बिरादरी के प्रतिनिधि के तौर पर बाँट लिया जाये. फिरकापरस्त राजनीति को हर समय ऐसे उन्मादी युवाओं की जरूरत रहती है. क्या इसका कोई हल होगा? कुछ और अंकित या सलमान एक ऐसे मामले की वजह से अपनी जान दे देंगे, जिनसे उनके समाज का कोई भला नहीं होगा. इसलिए यह चिन्तन का समय है. पड़ताल का समय है कि आधुनिकता के तमाम दावों के बावजूद हम इतना क्रूर कैसे होते जा रहे हैं. धार्मिक होने के बावजूद नफरती कैसे होते जा रहे हैं?

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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

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