देश के उत्तर पूर्वी राज्य मेघालय में 27 फरवरी को विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं. और आज इन चुनावों के नतीजे घोषित होने जा रहे हैं ऐसे में राज्य में चुनावी सरगर्मियां फिलहाल अपने चरम पर हैं. अब जनता ने अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए किसे चुना है यह तो नतीजों के बाद ही मालूम पड़ेगा लेकिन मेघालय की जनता की एक बड़ी समस्या से इस लेख में आपको रूबरू करा रहे हैं.

मेघालय में ‘रैट माइनिंग’ टर्म बहुत प्रचलित है. दरअसल मेघालय में कोयला खनन उद्योग कामगारों को चूहे की तरह बनाकर माइनिंग का काम करवाया जाता है. इसी कारण से इसे रैट माइनिंग के नाम से जाना जाता है. मेघालय अपनी प्रचुर प्राकृतिक सम्पदाओं के कारण जाना जाता है. लेकिन यही प्राकृतिक सम्पदाएं जब इस जटिल दुनिया के आर्थिक पहलुओं से मिलती हैं तो उपयोगितावादी दौर में शोषण का सबब बन जाती हैं. विशेषज्ञ मेघालय की जमीन में करीब 64 करोड़ टन कोयले के भंडार का अनुमान लगाते हैं. क्वालिटी के मामले में यह कोयला देश की अन्य जगहों पर पाए जाने वाले कोयले से कहीं ज्यादा बेहतर है. जिसका कारण है कि इस कोयले से किसी भी अन्य खनिज की तुलना में कम राख निकलती है और इस कोयले से पैदा होने वाली तपन भी अन्य जगहों के कोयले के मुकाबले ज्यादा होती है. इसलिए बाज़ार इस कोयले को अधिक पसंद करता है. चूंकि बाज़ार इस कोयले को अधिक पसंद करता है इसलिए यहां के लोग कोयला खनन के बलबूते अपनी जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होते हैं.

मेघालय के अधिकतर कोयला खदानें ‘जयन्तियां’ पहाड़ियों के इर्द-गिर्द के इलाकों में है. यहां की खदानों की खुदाई में मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. ऐसे में इस काम को करने के लिए मजदूर लेटकर खदानों में घुसते हैं और कोयला बाहर निकालते हैं. इसीलिए इस तरह की माइनिंग को अभिजात्य वर्ग की दुनिया ने रैट माइनिंग का नाम दिया है. चूंकि इन खदानों में कोयला निकालने के लिए लेटकर घुसना होता है ऐसे में बच्चों की देह इसके लिए किफायती मानी जाती है और इनका इस्तेमाल इस काम में धड़ल्ले से किया जाता है. इतना ही नहीं रैट माइनिंग यानी कि कोयला खनन जैसे उद्योग में बच्चों के मानवाधिकारों का भी उल्लंघन होता है और पर्यावरण की भी बर्बादी होती है. और चूँकि रैट माइनिंग रोज़गार से जुड़ी है, इसलिए इसकी चर्चाएँ पूरे मेघालय की तस्वीर सामने रख देती है.

उन्नसवीं सदी के मध्य से मेघालय में कोयला खनन की शुरुआत हुई. साल दर साल मेघालय की जमीन से हजारों टन कोयला निकालकर बेचा गया. इसलिए मेघालय और इसके आस-पास के इलाकों से सटी जिंदगी कोयले पर निर्भर होती गयी. समय के साथ-साथ प्रकृति कोयला खनन के बोझ तले तबाह होने लगी. जिसके बाद साल 1970 में सरकार ने कोयला खनन को अपने हाथों में ले लिया. इस वजह से कोयला खनन में कोल इंडिया एकमात्र मालिक बन बैठी. बाद में उद्योग से जुड़े निजी दावेदारों को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया. हालांकि यह व्यवस्था सही से न लागू होने की वजह से निजी दावेदार भी लगातार कोयला खनन करते रहे.

21वीं सदी की शुरुआत में मेघालय से मिलने वाले कोयले की हिस्सेदारी पूरे भारत से मिलने वाले कोयले में करीब 1 फीसदी से अधिक होने लगी. इस समय तक सरकारी रेगुलेशन के अभाव में कोयले के खनन की प्रक्रियाओं में कानून का जमकर उल्लंघन होता था. 21वीं सदी के जागरुक संघर्षों ने इसे उभार कर रख दिया. कोयले की इन खदानों में पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन तो होता ही था साथ में बाल मजदूरी और सुरक्षा से जुड़े नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से बच्चों से काम कराया जाता था. इसी दौर में एक NGO ने दावा किया कि जयंतियां पहाड़ियों में चल रहे कोयला खनन में करीब 70 हजार बच्चे काम करते हैं. तब मानवाधिकारों के ऐसे उल्लंघन की खबर ने सरकार की न सही लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नींद उड़ा दी. साल 2014 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने मेघालय में कोयला खनन पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने का फैसला किया. एनजीटी ने अपने फैसले के दस्तावेज़ में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है और भारत जैसे सबसे बड़े लोकतंत्र में आर्थिक हित सहित किसी भी तरह के हित को जीवन के अधिकार के ऊपर तरजीह नहीं दी जा सकती है.

यही कारण है कि मेघालय के इस बार के चुनाव में ‘रैट माइनिंग’ सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. ये एक ऐसा मुद्दा है जिसमें चुनावी हार-जीत तय करने की ताकत है. खनन बंद होने की वजह से मेघालय का एक बहुत बड़ा तबका सड़कों पर आ गया है. अब हालात ये हैं कि मेघालय के सूतना जैसे क्षेत्रों से रोज़गार के अभाव में लोगों के भूख से मरने की भी खबरें आने लगी हैं.

यहां एक बात यह भी ज़रूरी है कि अगर कोल माइनिंग न रोकी गयी तो मेघालय का प्राकृतिक और इंसानी दोनों भविष्य बर्बाद होते हुए दिखता है. शायद इन्हीं धर्मसंकटों से रास्ता निकालने के लिए हमारी मानवीय सभ्यता राजनीति का सहारा लेती है. चूंकि मेघालय छठवीं अनुसूची के तहत आता है इसलिए संविधान का प्रावधान यह भी कहता है की मेघालय के आर्थिक और परम्परागत मसलों पर निर्णय लेने का अधिकार केंद्र और राज्य की बजाय स्वायत्त क्षेत्र के प्रशासन को होगा. इस लिहाज से मेघालय की आत्मा में बसती जा रही रैट माइनिंग की परेशानी का हल करने का अधिकार दिल्ली में बैठे लोगों की बजाए खुद मेघालय के लोगों के पास है. उम्मीद है की वे अपने भविष्य के लिए जो भी निर्णय लेंगे वह बेहतर होगा.

अंत में इस बात को भी महसूस कीजिये की मेघालय के कोयला खदानों में काम करने वाला एक जागरूक मजदूर कहता है की जब ट्रक की आवाज़ सुनाई देती है तब पेट की भूख देह को बेचैन कर देती है. फिर खाने के बाद पीये जाने वाली पानी की याद आती है. तब मन करता है की मेघालय छोड़कर चला जाऊं. लेकिन बाहर जाऊं भी तो कैसे जाऊं जाने तक के पैसे नहीं हैं…

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खांटी मानवतावादी अजय कुमार समाजविज्ञान और दर्शन की दुनिया से जूझते हुए जीवन बिताना चाहते हैं। कहने के लिए तो इन्होंने अपनी डिग्री bhu से हासिल की है लेकिन खुद की समझ के लिए चर अचर सबकी भूमिका स्वीकारते है। देखना, सीखना और अपना नज़रिया बनाना ही ज़िन्दगी बन जाए इसलिए पत्रकारिता का चुनाव किया। किसी भी विषय को गहराई से समझने-समझाने के समर्थक और घाट-घाट का पानी पीने वाले अजय कुमार राजनीति के जरिये सामाजिक बदलाव की बात में यकीन करते हैं। नो नॉनसेंस पर्सन अजय कुमार किसी साधू की तरह हरदम विचारों की धूनी रमाए रहते हैं.

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