JNU के हज़ारों छात्र शुक्रवार को दिल्ली की सड़कों पर थे. उनकी कई मांगों में से एक मांग यह भी थी कि अपनी आठ छात्राओं पर यौन शोषण के आरोपी प्रोफेसर अतुल जौहरी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए. लेकिन छात्रों का यह मार्च अन्य वजहों से भी चर्चा में आ गया. मार्च को कवर करने गई हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस की दो अलग-अलग पत्रकारों ने आरोप लगाया कि उनके साथ कथित तौर पर छेड़छाड़ और मारपीट की गई. हिंदुस्तान टाइम्स की पत्रकार (Journalist) ने आरोप लगाया कि जब पुलिस JNU के एक छात्र को बर्बर तरीके से पीट रही थी तब वह उनकी एक तस्वीर ले रही थी. इसी दौरान दिल्ली पुलिस की एक डीसीपी ने अन्य पुलिस (Police) वालों को कहा कि इसका कैमरा छीन कर तोड़ दो. इंटरनेट पर वायरल हो रहे वीडियो में पत्रकार कह रही है कि उसके कैमरे को कुछ न किया जाये.
अतुल जौहरी
ख़बर लिखे जाने तक कैमरे का कुछ अता पता नहीं चला है. साथी पत्रकार के साथ हुई घटना के बाद बाकी पत्रकारों ने भी दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर रोड पर कैमरे रख कर अपना विरोध दर्ज किया.
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बात स्पष्ट होती नजर आ रही है पत्रकारों पर पुलिसिया हमले बढ़ते जा रहे हैं. आखिर क्या वजह है पुलिस का सहारा लेकर सत्ता पत्रकारों के दमन पर उतारू है?
शुक्रवार की घटना ने स्पष्ट किया कि पुलिस अपनी बर्बरता को छुपाने के लिए पत्रकारों को निशाना बना रही थी. पर यह पुलिस/ अर्धसैनिक बलों द्वारा पत्रकारों पर हमले की पहली घटना नहीं है.
बीते 10 मार्च को News18 असम-नार्थ ईस्ट के लिए पूर्वोत्तर को कवर करने वाली पत्रकार एमी सी लौबेई के साथ असम पुलिस ने बर्बर तरीके से मारपीट की.

लौबेई ने बताया कि वो असम मिज़ोरम बॉर्डर पर चल रहे तनाव को कवर करने गई थी. वहां भी घटना दिल्ली की तरह ही थी जहां मिज़ोरम के छात्र संगठन की पुलिस से झड़प हुई. इस पर पुलिसिया कार्रवाई में लौबेई को भी बुरी तरह पीटा गया. घाव कितने गहरे हैं इसकी दास्तां फेसबुक पर उनके पोस्ट बयां कर रहे हैं.
पत्रकारों पर पुलिस का एक बर्बर हमला पिछले साल कोलकाता में भी हुआ. वामपंथी संगठनों के विरोध प्रदर्शन को कवर करने गए पत्रकारों को कथित तौर पर कोलकाता पुलिस ने बेरहमी से पीटा था. पीटने की वजह स्पष्ट नहीं थी.
इन घटनाओं से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि सत्तासीन पार्टियां पुलिस का प्रयोग अपनी नाकामियों को छुपाने के साथ-साथ विपक्ष को दबाने के लिए भी करती हैं.
कुछ ऐसे ही मामले छत्तीसगढ़ से भी आए जहां मानवधिकार उल्लंघनों को रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों को अपनी सलामती के लिए अपने घरों को रातोंरात छोड़ना पड़ा.
स्थिति की भयावहता को इस बात से समझा जा सकता है कि बीबीसी के हिंदी रिपोर्टर आलोक प्रकाश पुतुल और फ्रीलांस पत्रकार मालिनी सुब्रमनियन ने छत्तीसगढ़ छोड़ने का फैसला ले लिया क्योंकि वह वहां सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे.
यहां पुलिस भारतीय संविधान प्रदत्त ‘भयमुक्त वातावरण में जीवन’ के अपने काम को ढंग से नहीं निभा पाई.

सत्ता के दुरुपयोग को सही शब्दों में आईपीएस अधिकारी अभिनव कुमार ने टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते में रखा था. उन्होंने कहा था कि सत्तासीन दल पुलिस का इस्तेमाल शिकारी कुत्तों की तरह करते है जहां उन्हें कई दिनों तक भूखा रखने के बाद जनता पर छोड़ दिया जाता है.

पुलिस तय करे, वह किसके साथ खड़ी है !

जेनएयू की घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने एक बयान जारी कर अपनी सफाई दी है. पुलिस ने कहा कि फोटोपत्रकार के साथ हुई घटना गलतफहमी में हुई और वे लोकतंत्र के चौथे खंभे की कद्र करते हैं.
आंकड़ों के लिहाज से भी समझें तो भारत पत्रकारों के लिए काफी खतरनाक देश माना जाता है. भ्रष्टाचार के मामलों के साथ जनता के संसाधनों की लूट को रिपोर्ट करने के लिए पत्रकारों की हत्या कर दी जाती है. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दो सालों में 142 पत्रकारों पर जानलेवा हमले हुए है. इनमे से 114 मामले 2015 में दर्ज हुए, वहीं 28 केस 2016 में हुए.
अगर इन सारी विकट परिस्थितियों के बीच पत्रकार अपना काम कर रहे हैं तो अब सवाल पुलिस पर भी उठ खड़ा होता है कि वे संविधान से हासिल जिम्मेदारी निभायेंगे, जहां पत्रकार सुरक्षित महसूस करते हुए काम कर सके या सत्ता के शिकारी कुत्ते बने रहेंगे.

देखिये NEWS-18 की जर्नलिस्ट का वीडियो-

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यह लेख रवि कौशल ने लिखा है. रवि कौशल पत्रकार हैं और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के संजीदा विद्यार्थी भी.

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