“हम हिंदू गाय को अपनी माता मानते हैं, उसे पवित्र मानते हैं. मुसलमानों ने गाय को मारा है. यह जागने और बदला लेने का समय है. उनके इस क्रूर कृत्य के लिए उन्हें पीट-पीटकर मार डालना चाहिए. मुस्लिमों के वेष में शैतान, जिन्होंने गाय काटने जैसा यह क्रूरतापूर्ण कृत्य किया है, उन्हें मार देना हमारा असली धर्म और पवित्र कर्तव्य है.”
घबराने की बात नहीं है. यह पम्फलेट आज-कल का नहीं है. यह पर्चा आज के 33 साल पहले का है. तहलका की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1985 में हिंदुत्व वादी कट्टरपंथियों ने दंगों के दौरान इस पर्चे को बड़े पैमाने पर फैलाया था. तब यह पम्फलेट हिंदूवादी संगठन हिंदू युवक मंडल द्वारा प्रकाशित किया गया था. इस पम्फलेट के जरिये यह अफवाह फैलाई गयी थी कि मुसलमानों ने सरयूदासजी मंदिर की एक गाय ‘जसोला’ का सिर काटकर उसे मंदिर के दरवाजे पर छोड़ दिया है. इतिहासकार मानते हैं कि 1985 के दंगों में इस अफवाह में अहम किरदार निभाया.
1985 के दंगे हुए आज 33 साल हो चुके हैं लेकिन स्थिति कमोबेश उसी तरह की है. बीती 28 फरवरी को राजधानी नई दिल्ली के रामलीला मैदान में चल रहे गौ माता प्रतिष्ठा आंदोलन में शामिल राजस्थान गौ रक्षा कमांडो फोर्स के अध्यक्ष एसएस टाइगर मंच से कहते हैं कि ‘जहां भी गाय की हत्या होते हुए देखेंगे, वहां सरेआम गोली मार देंगे. हमें किसी कानून या संविधान की परवाह नहीं है, जहां गाय कटेगी वहां पर ही कसाई कटेगा.’ आज के तीन साल पहले 28 सितंबर 2015 को उत्तर प्रदेश के दादरी में एक बुजुर्ग मुसलमान को गाय गोमांस खाने के आरोप में कट्टरपंथियों की भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था. गुजरात के ऊना जिले में गौ-रक्षा के नाम पर दलित युवकों की बेरहम पिटाई ने दलित राजनीति में एक आक्रोश पैदा कर दिया था. देश में ऐसी तमाम घटनाएँ रुकने का नाम नहीं ले रही हैं.
गाय के नाम पर फैलाये जा रहे उन्माद की क्या कोई राजनीतिक वजह है?  देश के प्रधानमन्त्री स्वयं यह बात कह चुके हैं कि ‘हम कैसे लोग हैं. गाय के लिए आदमी को मार देते हैं.’ प्रधानमन्त्री की इस औपचारिक अपील के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों से गाय के नाम पर निर्दोष लोगों को परेशान करने और हत्या तक कर देने की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं. इसकी वजह क्या है.
प्रधानमन्त्री की भावुक अपील का असर भी कथित गौ भक्तों पर क्यों नहीं हुआ? इसकी वजह यह तो नहीं कि प्रधानमन्त्री खुद गौ-राजनीति को सत्ता हासिल करने के लिए इस्तेमाल करने के हक में हैं.
दरअसल ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि बिहार विधानसभा चुनाव में वोटिंग से महज एक दिन पहले बीजेपी ने अखबारों में आधिकारिक तौर पर ‘बीफ’ से जुड़ा एक विज्ञापन छपवाया था. 4 नवंबर 2015 की सुबह के अखबारों में बीजेपी की ओर से छपवाए गये इस ऐड में नीतीश कुमार को उनके महागठबंधन साथियों द्वारा बीफ (गाय के मांस) को लेकर दिए गए बयानों के लिए ‘लताड़ा’ गया है.
ऐड में एक महिला गाय को गले लगाए हुए भी दिखाई दे रही थी. बीजेपी अपनी इस ऐड में पूछ रही थी कि नीतीश कुमार गठबंधन के साथियों द्वारा ‘गाय की बार बार बेइज्जती’ पर कुछ कहते क्यों नहीं हैं?  इस ऐड में हरेक बयान को छापते हुए, बीफ शब्द को लाल रंग से हाइलाइट किया था. सवाल ये है कि क्या नरेंद्र मोदी गाय के नाम राजनीति करके सत्ता हासिल करने के इस प्रयास से अवगत नहीं थे?
यही नहीं, प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपने गुजरात के दिनों के दौरान दिए गये एक भाषण में कहा था  कि,
‘भारत के वेदों के मुताबिक, पेट रूपी कुंड में अग्नि है. इस अग्नि में अगर सब्जी, फल या अनाज डाला जाता है तो इस अग्नि कुंड को यज्ञ (बलिदान) कुंड कहते हैं, लेकिन अगर इस अग्नि में मांस डाला जाता है तो यह ‘श्मशान भूमि’ की अग्नि बन जाती है, यानी चिता की आग बन जाती है. यज्ञ की अग्नि जीवन, ऊर्जा, शक्ति और धर्मनिष्ठा प्रदान करती है, जबकि ‘श्मशान’ की अग्नि गंदगी को गंदगी में और राख को राख में बदल देती है.’
इस भाषण से जाहिर है कि प्रधानमन्त्री स्वयं मांसाहार को खाने- पीने की व्यक्तिगत रूचि के द्रष्टिकोण से अलग हट कर देखते हैं.
तहलका की ही एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान जो कई नारे उछाले गए थे उनमें से दो थे, ‘मोदी को मतदान, गाय को जीवनदान’ और ‘बीजेपी का संदेश, बचेगी गाय, बचेगा देश.’ रिपोर्ट बताती है कि ये नारे भाजपा के ‘गौ विकास प्रकोष्ठ’ द्वारा गढ़े गए थे.
पिछले सात सालों में, यानी 2010 से 2017 के बीच, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा की 63 घटनाएं सामने आईं हैं. डाटा जर्नलिज़्म की जानी-मानी संस्था इंडिया स्पेंड के मुताबिक़ इनमे से 97 फीसदी वारदातें नरेंद्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद हुई हैं. पिछले ही साल जून में झारखंड के रामगढ़ में हुई अलीमुद्दीन अंसारी की हत्या के जुर्म में हाल ही में भाजपा नेता समेत 11 दोषियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई है.
इस तरह की घटनाओं और आंकड़ों को देख कर कहा जा सकता है कि हिंदुत्व वादी ताकतों के लिए गाय सिर्फ एक उपयोगी पशु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक मसला है. पिछले कुछ दशकों से हिंदुत्व की राजनीति ने अपने लिए नये प्रतीक गढने शुरू किये हैं. इन प्रतीकों का चुनाव इस विश्वास पर आधारित है कि इनके जरिये लोगों के भीतर एक भावुक उन्माद फैलाकार धार्मिक आधार पर एक रिलीजियस राष्ट्रवाद पनपाया जा सकता है. आंकड़ों को देखें तो यह कोशिश सफल लगती है. आज गाय का इस्तेमाल हिन्दुत्ववादी राजनीति एक धार्मिक राष्ट्रवाद के भावुक प्रतीक के तौर पर करने में सफल रही है.
गाय पर हो रही राजनीति के विषय में एक बात बेहद दिलचस्प बात सब को जाननी चाहिए. दरअसल आज की हिंदुत्व वादी राजनीति ने भले ही गौ वध और गाय को एक पशु से इतर उसके धार्मिक गौरव को आज के हिंदुत्व की व्यवहारिक व्याख्या में एक प्रतीक के तौर पर शामिल कर लिया है लेकिन हिंदुत्व को एक सिद्धांत के तौर पर परिभाषित करने वाले संघ के आदर्श वीर सावरकर इसके उलट थे.
वीर सावरकर ने मराठी भाषा में ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’ नाम से एक किताब लिखी थी. इस किताब को स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक प्रकाशन, मुंबई ने प्रकाशित किया था. इसी किताब में एक अध्याय गाय के बारे में है. सावरकर ने इस अध्याय को गाय के बारे में जो भी लिखा है , वह नीचे बिन्दुवार दिया जा रहा है.
1- ईश्वर सर्वोच्च है, फिर मनुष्य का स्थान है और उसके बाद पशु जगत है. गाय तो एक ऐसा पशु है जिसके पास मूर्ख से मूर्ख मनुष्य के बराबर भी बुद्धि नहीं होती. गाय को दैवीय मानना और इस तरह से मनुष्य के ऊपर समझना, मनुष्य का अपमान है.
2- यदि गाय की पूजा इसलिए की जाती है कि वह इतनी उपयोगी है तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी देखभाल इतनी अच्छी तरह से हो कि उसकी उपयोगिता ज्यादा से ज्यादा बढ़ सके? यदि गाय का सबसे अच्छा उपयोग करना है तो सबसे पहले आपको उसकी पूजा बंद करनी पड़ेगी. जब आप गाय की पूजा करते हैं तो आप मानव जाति का स्तर नीचे गिराते हैं.
3- गाय एक तरफ से खाती है और दूसरी तरफ से गोबर और मूत्र विसर्जित करती रहती है. जब वह थक जाती है तो अपनी ही गंदगी में बैठ जाती है. फिर वह अपनी पूंछ (जिसे हम सुंदर बताते हैं) से यह गंदगी अपने पूरे शरीर पर फैला लेती है.
4- गाय की अच्छी देखभाल करें क्योंकि वह उपयोगी है. इसका मतलब है कि युद्ध के समय, जब यह अपंग हो सकती है,  इसे न मारने की कोई वजह नहीं है.
5- यदि हमारे हिंदू राष्ट्र के किसी अभेद्य नगर पर हमला होता है और रसद खत्म हो रही है तो क्या हम नई रसद आने तक इंतजार करेंगे? तब राष्ट्र के प्रति समर्पण, सेना की कमान संभाल रहे नेता के लिए यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह गोवध का आदेश दे और गोमांस को खाने की जगह इस्तेमाल करे.
6- यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है कि गाय पूज्य है, जैसी मूर्खतापूर्ण और सरल धारणा ने देश को हानि पहुंचाई है. इतिहास बताता है कि हिंदू साम्राज्यों को इस मान्यता की वजह से हार का मुंह देखना पड़ा है. राजाओं को अक्सर युद्ध हारने पड़े क्योंकि वे गाय की हत्या नहीं कर सकते थे.
इन बिन्दुओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि सावरकर गाय को एक पशु से ज्यादा नहीं मानते थे. उन्होंने गाय को कभी हिंदुत्व का प्रतीक नहीं बनाया. फिर आखिर क्यों आज की हिंदुत्ववादी राजनीति ने गाय को एक राजनीतिक पशु बना दिया है?  क्या आज के हिंदुत्ववादी इस मसले पर हिंदुत्व का विचार देने वाले सावरकर से इत्तेफाक नहीं रखते.
यह लेख आप कठफोड़वा.कॉम पर पढ़ रहे थे. आगे भी हमारे लेख और वीडियोज़ पाते रहने के लिये हमें फेसबुक और ट्विटर पर लाइक करें और यूट्यूब पर सब्सक्राइब करें-
कठफोड़वा फेसबुक
कठफोड़वा ट्विटर
कठफोड़वा यूट्यूब
SHARE
Previous articleकहीं बिहार दंगे में उछली चप्पल नीतीश कुमार की तो नहीं है?
Next articleनिजीकरण के तीन फैसले जो दिखाते हैं कि अब सरकार के बस में देश संभालना नहीं रहा
आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here