रात को यही कोई 9 के आसपास खबर मिली की केदार बाबा नहीं रहे। मैंने इस सूचना की पुष्टि करने का प्रयास नहीं किया। किया भी नहीं जाना चाहिए। भला कौन वायरल कंटेट की तर्ज पर किसी कवि की मृत्यु का अफवाह उड़ाने में रुचि लेगा! ऐसी सूचनाएं वाकई एकाएक आती हैं, जिसके लिए हम तैयार नहीं रहते।
एकाएक सन 2015 की वह शाम मेरे जेहन में घूमने लगी। तब बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का राधाकृष्णन सभागार निराला स्मृति व्याख्यान (शायद) के लिए विद्यार्थियों और अध्यापकों से लबालब था। वाणिज्य संकाय से राधाकृष्णन हाल की दूरी बहुत ज्यादा नहीं थी। ऐसे में मेरी साइकिल हमेशा कला संकाय के मित्रों के बीच ही अपना पंचर सटवाने में लगी रहती थी।
मुझे आज भी वह लम्हा साफ-साफ याद है जब सभागार के मंच पर हिंदी विभाग के अध्यक्ष बलराज पांडेय सभा के अतिथि वक्ता को बुलाने के लिए डायस पर बोल रहे थे। यह अतिथि और कोई नहीं हिंदी के सौंधे कवि केदारनाथ सिंह हैं।बलराज पांडेय अपनी हिंदी को ज्यों ही भोजपुरी की तरफ मोड़ते हैं मंच पर विराजमान कवि का चेहरा दन्तुलि मुस्कान से भर जाता है। मेरा यह पहला केदारनाथ दर्शन था।
जहां तक मुझे याद है केदारनाथ जी ने अपना वक्तव्य भोजपुरी से ही शुरू किया था। इसका एक शुरुआती हिस्सा मुझे आजीवन याद रहेगा-

जब हमके बलराज जी के फोन आइल त हम पूछनी की के बोलता? बलराज जी? बलिया से कि हिंदी विभाग से? त बलराज जी तेज आदमी हवें, बोललन कि ना बलिया से। तब हम कहनी कि ठीक बा हम आइब तोहार कार्यक्रम में…”

यह बात सभा मे मौजूद कई अध्यापकों और आलोचकों के लिए कलेजे में कील सरीखी थी। शुरुआती कुछ उथलपुथल के बाद सब केदारनाथ जी की कविताओं में संलग्न हो गए। बाद में क्षेत्रवादी और न जाने क्या-क्या के आरोप लगाते हुए कुछ अध्यापक-शोधार्थी-आलोचक बनारस में कई दिनों तक घूमते रहे। चूंकि मैं भी बलिया का बनारसी अड़ीबाज था तो उनसे मुलाकातें होती रहीं। मुलाकातों के बाद मुझे यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया कि हिंदी का अकादमिक समाज सबसे ज्यादा अधीर और अल्पायु है। इसके अंदर की राजनीति का मुकाबला करने में भारतीय राजनीति और उसके दक्षिणावर्ती नायकों को सदियों लग जाएंगे। शायद यही एक कारण रहा होगा जिसके लिए केदार नाथ जी मिट्टी के बुलावे को महंतों के बुलावे से ज्यादा तरजीह दे रहे थे। हिंदी के इस व्यावसायिक समाज के बारे में कुछ ऐसा ही बाद में अशोक वाजपेयी ने भी अपने एक साक्षात्कार में कहा था।

केदारनाथ सिंह से सुनिये उनकी कविता ‘बनारस’-

उस दिन और कल के बीच कई बार हम अपने प्रिय कवि को पढ़ते और सुनते हुए उनके दीर्घायु होने की कामना में रत रहे। इंडिया टुडे के साहित्य वार्षिकी में उनका एक खूबसूरत साक्षात्कार भी साल की शुरुआत में हम सबके बीच आया। मैंने आखिरी बार केदारनाथ सिंह को उनके 83 वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में आयोजित एक गोष्ठी में बनारस देखा था। गोष्ठी प्रोफेसर शाही के घर में थी। शाही जी बनारस केविद्यार्थियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं सो ठीक-ठाक संख्या से उनका हाल भरा हुआ था। पहले से तय था की सिर्फ कवि की ही कविताएं सभी लोग पढ़ेंगे। हालांकि केदार जी बहुत देर तक नहीं बैठ सकते थे इसलिए कुछ शोधार्थी और अध्यापकों को इसका जिम्मा सौंपा गया।
हिंदी के कई प्रबुद्ध नाम के साथ केदारनाथ जी कुर्सी पर कोहनी से अपना चेहरा टिकाए लगभग 3 घण्टों तक सबको सुनते रहे। मैं ठीक उनके सामने बैठ कर फेसबुक से लाइव कर रहा था। सबसे अंत मे प्रोफेसर अवधेश प्रधान जी उनकी कविता ‘उठो मेरे सोए हुए धागों…’ पढ़ रहे थे। कविता के अंत तक उनकी आंखें छलछला गई। गला रुंध गया और सभा मे एक निस्तब्धता छा गई। इस तरीके से किसी कविता की महफ़िल में मेरी मौजूदगी पहले नहीं हुई थी। लगभग कई दफे सभा भावुक भी हुई जिसे केदारनाथ जी भोजपुरी और हिंदी की अपनी पुरानी स्मृतियों के सहारे उसे उबार लेने में सफल रहे।
सबसे अंत मे केदारनाथ सिंह को अपनी कविता पढ़नी थी। विद्यार्थियों ने बाबा ‘बनारस’, बाबा ‘बनारस’ की रट लगाई। इसके अलावा भी हर मुंह पृथक मांग थी। मैं उनकी कविता ‘विद्रोह’ सुनना चाहता था। खैर मेरी तरह कइयों की तमन्ना अधूरी रही। उन्होंने ‘अब जाओ मेरी कविताओं…’ के साथ अपनी मां के निधन पर लिखी कविता सुनाई। जिसमें वे गंगा से निवेदन कर रहे थे।
जैसे दिया सिराया जाता है
कल माँ को सिरा आया भागीरथी में
कई दिनों से गंगा नहाने की
कर रही थी ज़िद
सो,कल भरी दोपहर में
जब सो रहा था सारा शहर कोलकत्ता
मैंने उसे हथेलियों पर उठाया
और बहा दिया लहरों पर
जब वह बहती हुई
चली गयी दूर तो ध्यान आया
हाय,ये मैंने क्या किया
उसके पास तो वीजा है न पासपोर्ट
जाने कितना गहरा-अथाह जलमार्ग हो
जल के कस्टम के जाने कितने पचड़े
कुछ देर इस उम्मीद में
शायद कुछ दिख जाए
खड़ा खड़ा देखता रहा जल के भीतर की
वह गहरी अँधेरी जाम-लगी सड़क
और जब कुछ नहीं दिखा
तो मैंने भागीरथी से कहा –
माँ,
माँ का ख्याल रखना
उसे सिर्फ भोजपुरी आती है
आज केदार बाबा भी गहरी अंधेरी जाम लगी सड़क के पथिक हो गए। उनका ‘जाना’ सचमुच हिंदी की खौफ़नाक क्रिया साबित हुई। सबको उनकी शालीनता और शांत स्वभाव से यह लगता था की अभी बहुत कुछ बाकी है। लेकिन वे ‘सब ठाठ पड़ा रह जावेगा,जब लाद चलेगा बंजारा’ की तर्ज पर हमें अलविदा कह गए। हालांकि उन्होंने जाने से पहले हिंदी को वैश्विक वीजा-पासपोर्ट दिलाने में भरपूर मदद की। उनकी कविताओं का अनुवाद फ्रेंच,अंग्रेज़ी और कई भाषाओं में हुआ। प्रकाश उदय ने बाबा की कविताओं का भोजपुरी में भी अनुवाद किया। यह अनुवाद अब जाकर जीवन से मृत्य में सम्पूर्ण हो चुका है।
केदार बाबा हमारे समाज को सबसे बारीकी से कविता में उकेरने वाले कवि रहे। युवा हो या प्रौढ़ उनकी कविताओं से अपरिचित नही रह सकता। फेसबुक के इस दौर में युवा अपनी प्रेमाभिव्यक्ति ‘तुम्हारी देह ने किसी देह का नमक खाया है’ से करते हुए बाजार की हिंदी को उनके माध्यम से चुनौती दी। उन्होंने जाने से पहले हिंदी के वैभव को जितनी सम्पन्नता दी, इस दौर के सामने उसे अक्षुण्ण रखने की चुनौती है।

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यह लेख आर्य भारत ने लिखा है. आर्य भारत काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. इसके बाद इन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. अपनी ओजपूर्ण शैली के लिये ख्यात आर्य वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं.

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