‘रेड'(Raid) देखी, अच्‍छी लगी! ‘ईमानदार अफसर’ और ‘भ्रष्‍ट नेता’ को लेकर हिंदी सिनेमा ने जो स्‍टीरियोटाईप गढ़ रखा है यह सिनेमा भी उससे पूरी तरह तो नहीं पर बहुत हद तक अलग लगी। हिंदी सिनेमा के स्‍टीरियोटाईप में ईमानदार अफसर भले शपथ संविधान और कानून की खाता है पर अपनी हुड़-हुड़ दबंगीय के लिए वह जो तालियां बटोरता है उसके पीछे नैतिकता और साहस के बारे में उच्‍च वर्गीय और उच्‍च जातीय संकीर्ण दृष्टि अधिक काम करती है। भ्रष्‍ट नेता आमतौर पर कथित निम्‍न जाति सरनेम लिए और गंवई होता है जिसके पीछे जो ताकत होती है वह ‘जनता’ नहीं बस ‘भीड़’ होती है।

बहरहाल, ‘रेड’ का नायक एंग्री नहीं विनम्र है। वह आम आदमी सा है जो अपनी ताकत का स्रोत मात्र अपने संविधान, कानून, ब्‍यूरोक्रेसी के मूल सिद्धांतोें और अपनी मानवीय उसूलों को मानता है। वह प्रेमी है और उसकी ईमानदारी उसकी पत्‍नी पर भारी नहीं है, बल्कि पत्‍नी उसके साथ उसकी ईमानदारी में भागीदार है। वह मातहतों के प्रति पेशेवराना जवाबदेही समझता है, और इस नाते उसे मातहतों की ओर से ताकत मिलती है। मातहतों के साथ कोई हमप्‍याला हमनिवाला जातिवादी वर्गवादी कनेक्‍शन अनुपस्थित (या अंडरटोन्‍ड) है, पेशेवराना कनेक्‍शन मुखर है।
ब्‍यूरोक्रेसी में अनौप‍चारिक रूप से एक थ्‍योरी चलती है कि भ्रष्‍ट से भ्रष्‍ट तंत्र और नेता को भी अपने घर का चौकीदार ईमानदार चाहिए होता है। भ्रष्‍ट से भ्रष्‍ट तंत्र में भी एक छोटे से अनुपात में ही सही पर ईमानदार अधिकारियों की कुछ न कुछ जरूरत और कुछ न कुछ वकत होती है। ‘रेड’ का नायक इस स्थिति का अपने पक्ष में लेवरेज करता है यानि फायदा उठाता है। यह एक अदना सा अफसर नायक, प्रधानमंत्री से भिड़ता तो नहीं है पर प्रधानमंत्री तक को घुमा देता है। उसके नायकत्‍व का एक आयाम उसका यह चातुर्य है।
नायक सिस्‍टम के भ्रष्‍टाचार के एक पक्ष के विरूद्ध सिस्‍टम के ही एक दूसरे पक्ष का तमंचा नहीं है, बल्कि कानून और ईमान के शासन के प्रति अपने आग्रह में वह गरीब और अाम आदमी और देश का भला देखता है, और मानता है कि यह भलाई आते-आते आएगी।
आजकल की हिंदी फिल्‍मों में नायक अगर ईमानदार अफसर है तो वह आपको सत्‍तापक्षी टाईप का मिलेगा और भ्रष्‍ट नेता विलेन आपको विपक्षी टाईप का मिलेगा। यह नायक कसमें किसी देशभक्ति की खाता मिलेगा, पर अपने ही देश के अपने जैसे बोलने दिखने वाले आदमी को पसंद करता और अपने ही देश के अपने से अलग बोलने दिखने वाले आदमी को नापसंद करता और उनसे लड़ता मिलेगा। पर, ‘रेड’ की कहानी 1980 के दशक की कहानी है जिस दौर की फिल्‍मों में अामतौर पर विलेन सत्‍तापक्षी होता था और नायक गरीब या आम आदमी। ‘रेड’ में भी विलेन सत्‍तापक्षी टाईप का है, और नायक जिस देश के लिए खड़ा है वह देश आम आदमी के ह़कों के रूप में परिभाषित है। यह हाल के दिनों में जैसा आस्‍वाद बनने लगा है उससे थोड़ी अलग बात है। 80 के दशक का नायक एंग्री था पर किसी का तमंचा बन इस्‍तेमाल होता था या प्रतिहिंसा में अपनी ही एक भ्रष्‍ट दुनिया बना लेता था। उसी दशक की कहानी को ‘रेड’ एक अलग लेवल पर ले जाता है जहां नायक की प्रतिहिंसा स्‍खलित नहीं होती है।
मैं यहां बातें फिल्‍म के कला पक्ष और तकनीकी पक्ष पर नहीं कर रहा, बस विषय पर कर रहा हूं। तकनीकी स्‍तर पर कई खूबियां हैं तो कई खामियां भी। पर फिल्‍म की वैचारिक सुस्‍पष्‍टता ने उसकी स्क्रिप्‍ट को भी अच्‍छा-खासा कसा बनाया है। कोई कहानीनुमा विस्‍तार नहीं है और सारा स्क्रिप्‍ट एक घटना के इर्द- गिर्द कुछेक दिनों के घटनाक्रम में बुना है। पर फिल्‍म लगातार बांधे रखती है। फिल्‍म में उसके विचार के साथ उसका बहुत मजबूत पक्ष चरित्र चित्रण है। सांसद रामेश्‍वर सिंह (सौरभ शुक्‍ला) के चरित्र की नाटकीयता एक कद्दावर सामंती नेता के यथार्थ चरित्र को इंटेंस करती है, यह नाटकीयता यथार्थ से कहीं दूर ले जाती और भटकाती नहीं है।
यह सच है कि ब्‍यूरोक्रेसी मात्र सत्‍ता के पीछे चलती एक भेड़चाल मात्र नहीं होती है, यह भूले बिसरे नायकों की एक ऐसी दुनिया भी है, जिन नायकों ने बहुत सेल्‍फलेस काम किया है और औचित्‍य का श्‍ाासन और माहौल बनाने में गुमनाम योगदान दिया है। फिल्‍म दावा करती है कि वह ऐसे नायकों को समर्पित है। अपने इस दावा को निभाने में फिल्‍म बहुत हद तक सफल हुई है।

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कठफोड़वा.कॉम के लिये यह रिव्यू पांडेय राकेश ने लिखा है. वह वर्तमान में प्रशासनिक अधिकारी हैं और समाजविज्ञान और मनोविज्ञान पर गहरी पकड़ रखते हैं.

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