अनिमेष मुखर्जी बंगाली हैं पर कलकत्ता से नहीं हैं, फर्रुखाबाद से हैं. पर आप एक भद्रलोक बंगाली की तरह इनसे चित्रकला से लेकर मूर्तिकला और राजनीति से लेकर सिनेमा तक की चर्चा आसानी से कर सकते हैं. ऊब जायें तो गिटार भी सुना देंगे. घाट-घाट के पानी की तर्ज पर उत्तर भारत के शहर-शहर की धूल फांकी है. फिलहाल भ्रमण कर रहे हैं और अपने खाने-खिलाने के शौक पर ध्यान दे रहे हैं.

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सत्यजित रे का नाम आपने जरूर सुना होगा. हो सकता है उनकी फिल्में न देखी हों. भारतीय सिनेमा में जिन निर्देशकों को सबसे ज्यादा इज्जत बख्शी गई, वह सत्यजित रे हैं. सत्यजित रे की आलोचना का भी कारण यही है. कहा जाता है उन्होंने अपने सिनेमा में भारत की गरीबी को बेचा. जो कहीं न कहीं सही भी है आप उनकी दुर्गा देखें, अपू संसार देखें उसमें जिस तरह कलकत्ता को दिखाया गया है उससे ये बात साफ झलकती है.
उनकी एकमात्र हिंदी फिल्म को देखिये. आप किसी भी हिंदी सिनेमा के प्रेमी से पूछिये क्या वो कहेगा कि शतरंज के खिलाड़ी एक ऐसी फिल्म है जिसे देखा ही जाना चाहिये? नहीं. उसकी मस्ट वॉच लिस्ट में गाइड, प्यासा, आवारा, रंग दे बसंती, चक दे इंडिया का नाम हो. लेकिन इसमें शतरंज के खिलाड़ी का नाम ज़्यादातर आखिरी आता है. लेकिन लोकप्रियता के पहलू और पूर्वाग्रहों को हटा कर देखें तो भी रे महान कहे जा सकते हैं.
उन्हें महान बनाने का सबसे बड़ा श्रेय उनके संगीत को जाता है. जिस तरह उन्होंने चारूलता में रवींद्र नाथ टैगोर की रचनाओं को किशोर कुमार से गवाया. बंगाली भद्रलोक की परिकल्पना थी कि रवींद्र संगीत को सिर्फ शांति निकेतन वाले ही गा सकते हैं. क्योंकि उसे गाने का एक निश्चित तरीका होता है जैसे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का होता है. इसमें मुंह बंद कर के आ को औ गाया जाता था. फिर अचानक से रे का रवींद्र संगीत का वर्जन आता है जिसमें वह आ को औ नहीं आ ही गवाते हैं. इसे किशोर कुमार गाते हैं खुले गले से बॉलीवुड गानों की तरह जैसे वह बॉलीवुड के रोमांटिक गानों को गाते हैं वैसे ही उन्होंने आमी गो चीनी गो तुमारे गाया. आज की तारीख में किशोर कुमार का वर्जन इससे ज़्यादा पॉपुलर हो गया. रे ने रवींद्र संगीत को एक अलग पहचान दे दी.

सत्यजीत की रे की रेंज की बात की जाए तो जैसे स्पिलबर्ग ने हर जॉनर का सिनेमा बनाया है. वैसे ही रे ने हर तरह की  फिल्में बनाईं. पीरियड ड्रामा की बात करें तो शतरंज के खिलाड़ी, बच्चों की फिल्म गोपी गाइन बागा बाइन. रे ने जिस भी जॉनर में फिल्म बनाई वह अपने आप में मुकम्मल साबित हुई.
अब अगर बात की जाए रे की लेखनी की तो यहां बता देना ज़रूरी है कि कोई भी फिल्म तीन स्तर पर बनती है शूटिंग, राइटिंग और एडिटिंग. जैसे स्क्रीनप्ले और उपन्यास दोनों बताते एक ही कहानी हैं लेकिन दोनों में कहानी कहने का तरीका बहुत अलग होता है. इसका उदाहरण मनोहर श्याम जोशी की किताब का एक अंश है जिसमें वह बताते हैं कि कृष्ण जब सोकर उठते हैं तो वह सबसे पहले अर्जुन को देखते हैं जबकि उनके पास पहले दुर्योधन पहुंचा होता है. लेकिन चूंकि दुर्योधन कृष्ण के सिर के पास बैठा होता है इसलिए वह उसे नहीं देख पाते. अब इसी कहानी को जब भागवत कथावाचक के मुंह से जब आप सुनेंगें तो वह आपको अलग ही तरीके से सुनाते हैं. तो ये जो स्क्रिप्टिंग का फर्क है वही स्क्रीनप्ले और उपन्यास में है जो कि रे की राइटिंग में दिखता है.

हाल ही में रे की कहानी पर एक शॉर्ट फिल्म बनी थी. फिल्म का नाम था अनुकूल जो एक रोबोट की कहानी है जो कि एक परिवार का हिस्सा है, नौकर की तरह काम करता है जिसमें उसको भगवत गीता के दर्शन से जोड़ा गया. इस तरह का इंटलैक्ट आपको रे की राइटिंग में मिलता है. ऐसे बहुत सारे साहित्यकार हैं जिन्होंने स्क्रीनप्ले लिखे जैसे मनोहर श्याम जोशी, राही मासूम रज़ा, अमृतलाल नागर, प्रेमचंद. लेकिन ऐसे फिल्मकार कम हैं जिन्होंने कहानियां लिखीं और वह उतनी ही मौजूं साबित हुईं. रे इस मामले में इक्कीस साबित हुए हैं कि एक आदमी जो डायरेक्शन की जितनी समझ रखता है, उतनी ही स्क्रीनप्ले, म्यूज़िक और कहानी भी परख रखता है.
रे के ऐसे कई अनुभव भी रहे हैं जिसमें उन्होंने खुद बताया है कि उन्होंने किसी लेंस का क्यों इस्तेमाल किया. मिचेल कैमरा जो कि एक कुख्यात कैमरा कहा जाता है उसका कैसे इस्तेमाल होता है यह उन्होंने खुद बताया. इन सारे अनुभवों के बीच में कहा जा सकता है कि रे के सिनेमा के एक पक्ष को आप उठाएं तो आप उसकी आलोचना कर सकते हैं. क्योंकि उनका कोलकाता पीकू फिल्म जैसा नहीं दिखता जो खूबसूरत है जिसमें रोमेंटिसिस्म है. उनकी फिल्मों के कोलकाता में झुग्गियां हैं, बेरोज़गारी है, गरीबी है. लेकिन अगर समग्र रूप से रे के सिनेमा को देखा जाए तो वह अपने आप में पूर्ण साबित होता है जो उनको महान बनाता है.
यही कारण है कि जब सत्यजीत रे की मृत्यु हुई तो सौमित्र सेन जो एक बड़े कलाकार माने जाते हैं जिन्हें कई बड़े पुरस्कार भी मिल चुके हैं वह स्टेज पर एक प्ले कर रहे थे. जैसे ही उन्हें रे की खबर मिली प्ले को बिना कुछ कहे बीच में रोक दिया गया और सेन बीच स्टेज में से चले गए. पब्लिक ने भी इस पर कोई विपरीत प्रतिक्रिया नहीं दी. सेमिनार, भाषण, फिल्म के शो बीच में रोक दिए गए और किसी ने कोई भी आपत्ति नहीं की. जिस गली में सत्यजीत रे का घर था जहां उनका शव रखा गया उसमें लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई थीं. लोगों ने उन पर इतने फूल चढ़ाए कि उनके घर में जगह तक नहीं बची. पूरी गली फूलों से पट गई थी.

आखिर में सत्यजीत रे के जो एक्टर्स या कैरेक्टर्स रहे उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रही. शर्मिला टैगोर ने उनकी फिल्मों में काम किया. कई लोग सिनेमा में काम करते रहे कई लोग पूरी तरह से अलग हो गए लेकिन किसी ने भी उनके सिनेमा से वैसी पहचान नहीं पाई जैसी अरुण गोविल को राम के किरदार से मिली. या यूं कहें कि उन एक्टर्स की पहचान में सत्यजीत रे के उन किरदारों का कोई रोल नहीं रहा. अरुण गोविल कभी भी राम के किरदार से उबर नहीं पाए. लेकिन शर्मिला टैगोर, संजीव कुमार, फ़ारुख़ शेख़, सईद मिर्ज़ा जैसे कलाकार कभी उनके किरदारों की पहचान में बंधे हुए नहीं रहे.

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