सुशांत कुमार शर्मा जेएनयू से हिंदी साहित्य में स्नातक करने के बाद, दिल्ली विश्वविद्यालय से एमफिल पूरी करके वर्तमान में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं। उत्तर भारत के तीन प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर चुके रसिकमन सुशांत कुमार शर्मा की साहित्य, समाज और संस्कृति में गहरी रुचि है।
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मुझे उस सारे साहित्य और उन सभी साहित्यकारों से एक शिकायत रही है जिन्हें आंचलिक कहा जाता है। कारण बहुत सीधा सा है। जिसे हम आंचलिक कहते हैं वह किसी खास स्थान और परिवेश से जुड़ा होता है। जो इसे लिखते हैं वे सारे सत्व और तत्व इन स्थानों से लेते हैं और भाषा को त्याग कर संपर्क भाषा या साहित्यिक भाषा या प्रभु भाषा में लिखते हैं। मुझे यह किसी परिवेश का साहित्यिक शोषण लगता है। क्योंकि किसी ने भाषा ली भी तो बस इतनी कि फ्लेवर आ जाये, बनी बनाई दाल में छौंक भर भाषा, ऊंट के मुंह में जीरा। पर क्या करें? विषयवस्तु का लोभ साहित्यकार छोड़ नहीं सकता और गणमान्य बनने की चिंता उसे किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखने की जहमत उठाने नहीं देती। ऐसे में साहित्यकार वही करता है जो आंचलिकता के नाम पर बहुतों ने किया और अब लगभग यह विधा लुप्तप्राय हो चली है। ऐसे में साहित्यकारों को अगर कहीं से प्रेरणा लेनी चाहिए तो फणीश्वरनाथ रेणु सबसे अच्छे प्रेरणास्रोत हो सकते हैं। उक्त शिकायत रेणु से इसलिए नहीं होती कि रेणु ने कभी आंचलिकता को सार्वजनीन भाषा के दबाव में नहीं लिखा वरन सार्वजनीन को आंचलिक बीहड़ से रास्ता निकालते हुए अपना पथ खोजने के लिए छोड़ दिया। कभी ले गये सघन खेतों में तो कभी रेता के थार में ले जाकर अचंभित किया। कभी नदी किनारे तो कभी अभाव का आभूषण धारे उन बस्तियों में खिलखिलाती जिन्दगी से परिचय कराया। रेणु ने हिंदी भाषा को एक नया रंग और ढंग दिया। खेत की मेढ़ों पर संभल कर चलना सिखाया।
रेणु ग्रामीण भारत के चितेरे हैं। सरकंडे की कलम और कांच-कईन की कूंची को केले के पत्ते से बना ली गई स्याही, गेरु और घोंघे की शल्क से बनाये गए चूने की घोल में डुबो कर जब पियरी माटी और पिन्डोर से पुती भित्तियों पर ग्रामीण समाज की महागाथा लिखते हैं तब लगता है कि सामा चकवा, पिड़िया, जाट जाटिन महज कल्पनाएँ और रिवाज नहीं। कभी-कभी तो एक छोटी सी छेनी और ब्रश लेकर अंचल की माटी में दफन सभ्यता को खोजकर उसे झाड़ कर जब चमका देते हैं तब लगता है कि ‘बड़ी बहुरिया और हरगोबिन’ का रिश्ता किसी भी कोख के रिश्ते से बढ़कर है। रेणु उसके कथाकार हैं जो हमारा असल है, रेणु उसके कथाकार हैं जिसे हम वर्तमान में लेकर चले बिना स्वयं को भारतीय नहीं कह सकते, रेणु उसके कथाकार हैं जो भविष्य में हमारी सभ्यता का दलील देने के लिए बचा रहेगा। अतः रेणु मेरे लिए उस परम्परा के लेखक हैं जिसमें कालिदास, जयदेव, विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, जायसी, मीरा, घनानंद, मीर, नजीर आते हैं। विचारों से सोलह आने ठेठ और शिल्प में तो ठेठपन अपने सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ अवतरित होता है। क्या हम कबीर को आंचलिक कह सकते हैं? क्या हम तुलसी और सूर को क्षेत्रीय कह सकते हैं? नहीं! तो फिर रेणु आंचलिक कैसे? रेणु लोक के कथाकार हैं आंचलिक नहीं।
रेणु को पढ़ना जितना आनंददायक है उतना ही जोखिम भरा। रेणु को पढने के लिए हिंदी का छात्र या शिक्षक होना काफी नहीं। क्योंकि रेणु ने अपने लेखन में एक व्रत का पालन किया है। उन्होंने न तो कभी शिकायत की न कभी उपदेश दिया। ऐसे में रेणु का साहित्य भ्रम उत्पन्न कर सकता है। किसी को भी यह लग सकता है कि यह सबकुछ सिर्फ मज़े के लिए है। दरअसल ऐसा नहीं है। रेणु स्वयं को पढ़े जाने से पहले अपने पाठक से कुछ मांग करते हैं। यह मांग जितनी ही जायज है उतनी ही जरूरी। रेणु को पढ़ने की पहली शर्त है लोक को जानना। वे लोक परिचय के लेखक नहीं लोक के गहरे सरोकारों के लेखक हैं। सामर्थ्य तो इतना है कि सिरचन जैसे कहार-कुम्हार के घर की इमली वाली कढ़ी और बाबू साहब के यहाँ की सजाव दही वाली कढ़ी का स्वाद लेखन के माध्यम से महसूस करा दें पर आपको इन स्वादों से पूर्व परिचित होना पड़ेगा। शहर में रहने वाला वह वर्ग जो डेढ़ सौ रूपये किलो बथुआ खरीद उसका रायता बना अपने रेफ्रीजेरेटर में ठंडा कर लंच में खाता है वह क्या समझेगा बड़ी बहुरिया के बथुआ साग उबाल कर खाने की पीड़ा को? वह वर्ग जो बड़े-बड़े मॉल में जाकर हजारों रूपये में चिक शितलपाटी खरीदता है वह क्या समझेगा कि खाने के बाद सिरचन ने छोटी बहु से गमकौआ जर्दा और पान न पाने पर क्यों अधूरी शितलपाटी छोड़कर चला गया? रेणु के लेखन में संघर्ष है, असंतोष है, प्रतिकार है अन्याय का। पर इन सबका ढंग बड़ा सहज और भोला भाला है।
ऐसे में अगर आप भारतीय गांवों को नहीं जानते, भारतीयता से आपका परिचय नहीं, माफ़ कीजिये आप रेणु को नहीं समझ सकते।
रेणु के लेखन की कई सतहें हैं। रेणु के वे आलेख जो सोशलिस्ट आन्दोलन और नेपाल क्रांति से जुड़े होने के दौरान लिखे गये, जो नक्षत्र मलाकार, चारू मजूमदार और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं के संपर्क में आने के दौरान लिखे गये उनमें रेणु का स्वरुप बिलकुल अलग है। अपने रिपोर्ताज ऋणजल-धनजल में जो रेणु दिखते हैं वह बिलकुल अलग रेणु हैं लेकिन कहानियों में जो रेणु उपस्थित होते हैं वह एक वृहत्तर रेणु का दिग्दर्शन कराता है। वैचारिक आलेखों में रेणु की धार उतनी ही कत्तई नहीं दिख पड़ती लेकिन जब उन विचारों को आत्मसात कर वे कथा में उतरते हैं तो रेणु का फलक विशाल हो जाता है। सर्वे सेटलमेंट को लेकर लिखी गई उनकी एक कहानी है लाल पान की बेगम। इस कहानी में सिर्फ एक बार ‘सर्वे सितलमिट्टी’ शब्द आया है, अगर ध्यान से न पढ़ा जाय तो सारी कहानी नाच देखने और मीठी रोटी बनाने के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाएगी। सर्वे सेटलमेंट से भारतीय मध्यवर्ग में एक नया आयाम बना, ग्रामीण मध्यवर्ग। इसके पहले या तो जमींदार थे या भूमिहीन। सर्वे सेटलमेंट के समय उन्हीं ग्रामीण भूमिहीनों को कुछ जमीन प्राप्त हुई। जैसे ही जमीन मिलती है बिरजू का बाप अपनी पत्नी से वादा करता है कि बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच देखने जायेंगे। बैल तो खरीद चुका है पर अपनी गाड़ी नहीं है। अतः गाड़ी खोजने निकला है। इधर बिरजू की अम्मा आशा और निराशा में डूब उतरा रही है। गाँव भर के लोग जो अपनी ही स्थिति में थे अब स्वयं को इनके समक्ष भूमिहीन महसूस कर जलने लगे हैं। सारी कथा इन्हीं तत्वों के बीच बुनी गई है पर बीच बीच में रेणु ने जो संकेत दिए हैं उनपर ध्यान दीजिये तो कहानी का दूसरा ही पहलू नजर आता है। बाबू साहब लोगों का सरकश नाच के बाघ की तरह घुमड़ कर आना और धमकाना, पड़ोसियों का यह कहना कि बिरजू की मां के घर रात में बिजली-बत्ती वाली गाड़ी आती थी, साहब आते थे इसलिए जमीन हासिल हुई। यह पूरा-पूरा पसमंजर गांवों के उस दौर को चित्रित करने में सक्षम है जिसमें ग्रामीण मध्यवर्ग का उदय हो रहा था। तकनीकी का ग्रामीण समाज में प्रवेश और टूटती रूढ़ियों का जैसा मोहक चित्रण रेणु ने पंचलैट कहानी में किया वह अन्यत्र कहीं नहीं पाया जा सकता। दरअसल रेणु की दृष्टि इतनी पैनी है कि परिवेश का कोई कोना छूटता नहीं। उतनी बेचैनी में भी बागड़ बकरे की कुकुरमाछी पर उनका ध्यान चला जाता है। रेणु के लिए गाँव जैसा है वैसा ही हमेशा रहता है। उसमें कुछ भी ऐसा नहीं जिसे छोड़ दिया जाय, उसमें कुछ भी महत्वहीन नहीं। वे गाँव से अच्छी-अच्छी चीजें चुनकर सिर्फ आंचलिक टेस्ट पैदा करने वाले कथाकार नहीं वरन वे गाँव को सम्पूर्णता में ले आते हैं। यही कारण है कि उनकी आंचलिकता से शिकायत नहीं होती।
रेणु की भाषा का अगर विश्लेषण किया जाये तो यह धारणा और भी स्पष्ट होगी। आंचलिक कथाकार अपनी भाषा को बरतते समय इसका ध्यान अवश्य रखते होंगे कि उनकी भाषा में क्षेत्रीयता का पुट उतना ही आवे जितने से उस भाषा का रंग भी आ जाये और अन्य भाषा-भाषियों को उसे समझने में समस्या भी न हो। ऐसे में भाषा बाधित होती है और उस लोक या अंचल के भाषा का वह फ्लो या वह रवानी पाठक तक नहीं पहुँच पाती। रेणु कभी इस बात की परवाह करते से नहीं जान पड़ते। रामायण को रमैन, नोट को लोट, सर्वे सेटलमेंट को सर्वे सितलमिट्टी, धड़ल्ले से लिखते चले जाते हैं। गालियों की बौछार करते हुए जरा भी नहीं चूकते। पुतखौकी का भतार, भाईखौकी, पतुरिया, हरजाई, रांड जिस भी सन्दर्भ में इनका प्रयोग होता है पूरा परिवेश मन में झंकृत हो उठता है। यह जीवंत भाषा कभी रेणु अपने हाथ से जाने नहीं देते। इस भाषा में अगर किसी को समस्या आती है तो वह सीधा संकेत है कि आपको लोक परिवेश से परिचित होने की और आवश्यकता है।
रेणु की कहानियों की सजीवता का दूसरा बड़ा पहलू है उनके पात्रों का सजीव होना। रेणु के पात्र बहुत सजीव हैं, चूंकि ग्रामीण हैं इसलिए भोले भी हैं और लंठ भी। रेणु पात्रों का निर्माण नहीं करते बल्कि परिवेश से उनका चयन करते हैं। चूंकि वे पात्र चयनित होते हैं अतः वे रेणु के इशारों पर नही चलते बल्कि रेणु को पात्रों के पीछे-पीछे चलना पड़ता है। वे रेणु की भाषा नहीं बोलते बल्कि रेणु को उनकी भाषा में लिखना पड़ता है। ऐसा लगता है कि रेणु ने किसी स्थान पर एकत्रित कर किसी घटना के सभी पात्रों को वह घटना याद दिला दी हो और याद आते ही सब अपनी अपनी भूमिका में आ गए हैं। रेणु अघटित यथार्थ और अघटनीय संकल्पनाओं के भावुक ह्रदय विचारक नहीं। न तो उनका ध्यान अघटित की ओर जाता है न उनकी चाहना किसी अघटनीय के यूटोपियन चिंतन से तृप्त होने की है। वे यथार्थ के साथी हैं वह यथार्थ चाहे जितना सुन्दर और सुडौल हो, कुरूप और अनगढ़ हो। नैना जोगिन और मिरदंगिया जैसी कहानियों में इस यथार्थ के अनगढ़पन को कितनी तन्मयता से उकेरा गया है देखने योग्य है।
ग्राम्य जीवन और ग्रामीण यथार्थ की बात आते ही प्रायः गाँव के सादेपन, भोलेपन की चर्चाएँ होने लगती हैं। कम से कम इतने पर तो आम राय है कि ग्रामीण समाज शहरों से ज्यादा असली होता है। इसका एक अर्थ यह भी है कि ग्राम्यबोध अपने लिए एक अलग मनोविज्ञान की मांग करता है। रेणु के लेखन में ग्रामीण मनोविज्ञान की प्रभूत राशि दिखाई देती है। चिंतित बिरजू की अम्मा बेटी चम्पिया को इस बात के लिए मारती है कि वह जंगी की पुतोहू से ठेठर बैस्कोप (थिएटर बॉयोस्कोप) का गीत सीखने जाती है लेकिन वही बिरजू की अम्मा जब रूपा का मंगटीका पहन बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच देखने जा रही होती है, जंगी की पुतोहू का दुःख देखा नहीं जाता। उसे बुला अपनी गाड़ी में बिठाकर मीठी रोटी खाने को देती है और चम्पिया से गीत गाने के लिए कहती है। सलीमा वाला गीत गाने पर गोधन को गाँव से बाहर करवाने वाली सुनरी पंचलैट जलने पर उसे अपने घर खाने पर बुलाती है। यह ग्रामीण समाज है जिसके ह्रदय में क्रोध, घात आदि अधिक समय तक नहीं टिकते। रेणु ने जितनी गहनता से इनकी पड़ताल की है किसी और के बूते की बात नहीं। रूठे हुए सिरचन का मुफ्त में चिक और सितलपाटी पहुंचा देना सिर्फ इस बात से कि गाँव की बेटी खाली हाथ गई तो लोग उसे ताने देंगे! हरगोबिन संवदिया बड़ी बहुरिया का संवाद नहीं पहुंचा पाता क्योंकि उससे बड़ी बहुरिया का दुःख बयां नहीं किया जा रहा! थोडा सा तम्बाकू पाकर मखनी बुआ का गदगद हो जाना। यह सहृदयता गाँव का प्राण तत्व है जिसे रेणु के लेखन की संजीवनी कह सकते हैं।
भाव से भाषा तक रेणु ग्राम्य श्री के उपासक हैं। वह गाँव जो मनुष्यता की आदिम भावना को सहेज कर रखता है। अतः रेणु उस गाँव के माध्यम से विश्व व्यापी मानवता के सहज संवेगों के लेखक हैं। रेणु जंगल में गाय चराते चरवाहे की बंशी और पहाड़ी ढाल से बेरोक-टोक बहते झरने की रवानी के लेखक हैं।

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