किताबें बहुत जरूरी हैं. अच्छी किताबें अक्सर किसी समस्या या विषय के तमाम पहलुओं को सामने लाती हैं. ऐसे में हम जान पाते हैं कि हमारा मन जो सोचता है, वही एकमात्र सोच नहीं है. हमारे किसी मामले में जो विचार होते हैं, वही एकमात्र विचार नहीं हैं. हमारा किसी समस्या से निपटने का जो तरीका है, वही एकमात्र तरीका नहीं है. और किताबें हमारे ऊपर यह प्रभाव डालकर हमें कहीं ज्यादा समावेशी बना देती हैं. इससे हमारा सर्वज्ञानी होने का अहंकार तो कम होता ही है. साथ ही दूसरे का पक्ष सुनने और जानने की सलाहियत भी आती है.
जिससे हम विविधता का महत्व समझते हैं और उसकी सार्थकता से जुड़ते हैं. पर ऐसा भी संभव है कि आप किताब न पढ़ते हों और बस बातचीत के आधार पर किसी समस्या पर फैसले ले लेते हों. पर बातचीत की प्रक्रिया के बारे में आपको एक बात समझनी चाहिये. कई बार बातचीत के दौरान सहमतियां हमारे भीतर अकाट्य सत्य की तरह काम करने लगती हैं और असहमतियां प्रकांड झूठ की तरह. बड़े ध्यान से अगर हम देखें तो पाएंगे कि दुनिया की सारी परेशानियां सहमतियों और असहमतियों के बीच एक-दूसरे के लिये पनपने वाले असम्मान और नफरत से पैदा होती हैं. चूँकि किताबें बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से सहमतियों और असहमतियों के बीच पुल बनाने के लिए सबसे बेहतरीन कच्चे माल का काम करती हैं, इसलिए किताबें पढ़ना जरूरी है.
फिर भी यह सवाल उठता है कि क्या किताबों के बिना ज़िन्दगी नहीं गुजारी जा सकती है? बिल्कुल गुज़ारी जा सकती है, हम में से अधिकांश लोग बिना किताबों के ही ज़िन्दगी जीते हैं. ये अलग बात है कि जीवन का नज़रिया उनके लिए हमेशा एकपक्षीय और तथाकथित सरल बना रहता है. इसलिए जटिल दुनिया में पनपने वाली गैरजरूरी महत्वकांक्षाएं और उनका लालच सबसे अधिक बर्बाद अपढ़ लोगों को ही करती है. इसका बखूबी इस्तेमाल निजी लाभ के लिए अनैतिक मंशा वाले लोग करते आ रहे हैं और करते रहेंगे. हालांकि इन अनैतिक मंशा वाले लोगों में किताबी और गैरकिताबी दोनों दुनिया से जुड़े लोग शामिल होते हैं. यानी कि भ्रष्ट आचरण  की मंशा पढ़ और अपढ़ दोनों में पनपती है.

पर चूँकि पढ़े हुए लोगों के पास सोचने के संसाधन बहुत होते हैं, इसलिए जब किसी भी कारण से ये भ्रष्ट होते हैं तो सभ्यताएं बर्बाद होती हैं. इसलिए किताबों से भी अधिक महत्वपूर्ण नीयत है जो पढ़ और अपढ़ दोनों में मौजूद होती है. बस अंतर इतना है की ‘पढ़’ में नीयत मौजूद होने पर उसे जीवन के तमाम उलझनों से अचानक मुक्ति मिल जाती है, वह दुनिया की जटिलता को समझने के बाद भी बहुत सरल बना रहता है लेकिन ‘अपढ़’ में नीयत मौजूद होने के बाद भी उसे मुक्ति नहीं मिल पाती,वह जीवन के तमाम उलझनों में फंसा रहता है, और उसके सरल जीवन के साथ दुनिया की जटिलताएं बहुत अन्याय करती हैं.
अब सवाल यह उठता है कि दुनिया में तो असंख्य किताबें हैं. क्या सबको पढ़ना जरूरी है? तो जवाब यह है कि बिल्कुल नहीं! केवल कुछ मूलभूत विषयों की आधारभूत किताबों को पढ़ना भी काफी है. ऐसा इसलिए क्योंकि  जरूरी और आधारभूत किताबें पढ़ने के बाद साधारण दुनियावी समझ हमारा मस्तिष्क पा जाता है. और हमारा मनोमस्तिष्क कुछ विशिष्ट प्रकार के हल निकालने लगता है, जिनके सहारे तमाम तरह की परेशानियों को सुलझाया जा सकता है.
किताबें शब्दों के समूह का घर होती हैं. भाषाओं की दुनिया को समझने का सहारा होती है. इसलिए जब शब्द और भाषा की सार्थकता समझ में आने लगे तब किताबों का काम पूरा होने लगता है. किताबें पाठक के मन में दायित्व बोध पैदा करने लगती है कि पाठक को भी कुछ लिखना चाहिए. अब सवाल उठता है कि लेखक लिखें क्या? तो जवाब यह है कि लेखक शब्दों और भाषाओं से पैदा हुई असहमतियों को दर्ज करता चले, भावों को उकेरता चले और सबसे बड़ी बात जो शब्द किताबों से अछूते रह गए हैं उन्हें सजाता चले. वेदों से लेकर संविधान तक की यात्रा यही है. किताबें पढ़िए समझ जाएंगे कि क्यों वेद संविधान से कमतर हैं और कैसे भविष्य में संविधान से बेहतर भी रचनाएँ किताबों की शक्ल लेंगी.
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खांटी मानवतावादी अजय कुमार समाजविज्ञान और दर्शन की दुनिया से जूझते हुए जीवन बिताना चाहते हैं। कहने के लिए तो इन्होंने अपनी डिग्री bhu से हासिल की है लेकिन खुद की समझ के लिए चर अचर सबकी भूमिका स्वीकारते है। देखना, सीखना और अपना नज़रिया बनाना ही ज़िन्दगी बन जाए इसलिए पत्रकारिता का चुनाव किया। किसी भी विषय को गहराई से समझने-समझाने के समर्थक और घाट-घाट का पानी पीने वाले अजय कुमार राजनीति के जरिये सामाजिक बदलाव की बात में यकीन करते हैं। नो नॉनसेंस पर्सन अजय कुमार किसी साधू की तरह हरदम विचारों की धूनी रमाए रहते हैं.

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