अपनी असाधारण समझ से दुनिया को अचंभित करने वाले वैज्ञानिक और ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ के लेखक स्टीफेन हॉकिंग अब हमारे बीच नहीं रहे. हॉकिंग की मृत्यु ठीक उसी दिन हुई जिस दिन ये दुनिया महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्मदिन मनाती है. ये बात भी दिलचस्प है कि दोनों वैज्ञानिक अपने अपने समय के ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ भी रहे. आइंस्टीन अपने समय में संकीर्ण राष्ट्रवाद और इससे उपजे द्वितीय युद्ध की विभीषिका देख चुके थे. इसीलिए उन्होंने अपने दौर में अंतराष्ट्रीयवाद को अपने लेखन में प्रमुखता से जगह दी. कभी वक़्त मिले तो उनका ‘व्हाई सोशलिज्म‘ नाम का लेख पढ़िए, समाज मे पब्लिक इंटेलकटुअल्स की जरूरत समझ में आएगी. यही वजह थी कि आइंस्टीन ने इज़राइल के पहले प्रधानमंत्री होने का प्रस्ताव इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि इस राष्ट्र की बुनियाद में एक विशेष धर्म की श्रेष्ठता को तरजीह दी जा रही थी.

इसी परंपरा को हॉकिंग ने अपने दौर में जारी रखा. हॉकिंग जब कैंब्रिज में अपंगता के बीच अपनी पढ़ाई कर रहे थे, तब पूरी दुनिया अमेरिका द्वारा वियतनाम पर थोपे गए युद्ध की मुख़ालफ़त कर रही थी. छात्रों के हज़ारों समूह सड़कों पर उतरे हुए थे. ये असर इसलिए भी था क्योंकि अमेरिका अपनी शक्तिशाली इमेज को बनाए रखने के लिए हज़ारों युवकों की बलि दे रहा है. यह बात तत्कालीन विदेश सचिव रोबर्ट मैकेनमरा की रिपोर्ट में साफ हो चुकी थी. न्यूयॉर्क टाइम्स और बाद में वाशिंगटन पोस्ट इस रिपोर्ट को छापकर पत्रकारिता को एकदम नए स्तर पर ले गए.

हॉकिंग, अपनी बीमारी के बावजूद, ऐसे विरोध प्रदर्शनों में शिरकत करते रहे. वे बताते रहे कि वैज्ञानिक होने का मतलब यह कतई नहीं है कि आप अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से दूर रहें.

यह बात 2009 की होगी जब इज़राइल के सैनिकों ने दुनिया भर से राहत सामग्री को इकट्ठा कर फिलिस्तीन जा रहे फ्लोटीला नामक जहाज पर हमला कर दिया. गाज़ा पट्टी पर कई दिनों तक बमबारी जारी रही. कई लोगों की मौत हुई जिनमें ज्यादातर बच्चे थे. इस घटना के परिप्रेक्ष्य में ही पूरी दुनिया मे बीडीएस आंदोलन उभरा. BDS का मतलब बॉयकॉट, डाइवेस्टमेन्ट और सैंक्शन से है. इस आंदोलन से जुड़ी प्रमुख हस्तियों में एक हॉकिंग भी थे जो इजराइल के युद्ध अपराधों को अक्षम्य मानते थे.

इसी तरह हॉकिंग अपने देश में बहुचर्चित और लाभकारी योजना नेशनल हेल्थ स्कीम के निजीकरण को भी चुनौती दी. ‘दी गार्डियन’ में अपने लिखे लेख में हॉकिंग ने सुलभ जनकल्याणकारी स्वास्थ्य योजना के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने बताया कि इस योजना के कारण ही वह लंबे समय तक इलाज लेते रहे और दुनिया को अपनी असीमित ज्ञान से इस बह्मांड को समझने में मदद की. हॉकिंग का उदाहरण भारत के वैज्ञानिकों को संदेश देता है कि वे अपनी सामाजिक भूमिका को समझें. सत्ता को खुश करने के लिए पिछली इंडियन साइंस कांग्रेस में पुष्पक विमान पर शोध पत्र छापे गए. हॉकिंग इसलिए ज्यादा प्रासंगिक हो जाते है क्योंकि वे अपने दौर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभा रहे थे, अवैज्ञानिकता का विरोध कर रहे थे, सत्ता के खिलाफ स्टैंड ले रहे थे.

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यह लेख रवि कौशल ने लिखा है. रवि कौशल पत्रकार हैं और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के संजीदा विद्यार्थी भी.

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