सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा की गयी प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐतिहासिक और अप्रत्याशित थी. हालांकि इसमें ऐसा कोई खुलासा नहीं हुआ, जिसके लिए अमूमन प्रेस कॉन्फ्रेंस की जाती है. खुलासे की सम्भावना लिए पत्रकार जजों को अपने सवालों से उकसाते रहे लेकिन जज आपनी न्यायिक प्रतिबद्धता को निभाते हुये टस से मस नहीं हुए. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जजों द्वारा अपनी तरफ से दिखाया गया संतुलन उन सारी बहसों को खारिज करता है जो इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को राजनीतिक करार देकर खारिज कर रही हैं.

यह बात उचित हो सकती है की हर घटना समझने के लिए एक षडयंत्रकारी रवैया रखना चाहिए और घटना को षड्यंत्र के चश्मे से भी देखना चाहिए कि आखिरकार परदे के पीछे है क्या? सामने चल रही घटना हमेशा परदे के पीछे चल रही घटना से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. इसलिए ऐसी जांच-परख का पैमाना प्रस्तुतीकरण और जीवन के आचरण होते हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में चार जजों की अभिव्यक्ति का प्रस्तुतीकरण बेहद संतुलित था. किसी ने भी पत्र में मौजूद प्रवृत्तियों के सिवाय कुछ भी नहीं कहा और देश के नाम अपनी जमीर की बात कही.

जस्टिस चेमलेश्वर ने अधिकांश समय माइक संभाल रखा था. जस्टिस चेलमेश्वर ही एक ऐसे न्यायधीश थे जिन्होंने सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट की नियुक्तियों के लिए प्रस्तुत मोदी सरकार के बिल का समर्थन किया था. जब संविधान पीठ के 5 जजों में से 4 जजों ने नेशनल ज्यूडिसियल अपॉइंटमेंट बिल को न्यायालय की प्रधानता पर हमला होने की वजह से अस्वीकार कर दिया था. केवल जस्टिस चेमलेश्वर ही इस मत के विरुद्ध थे कि जजों की नियुक्तियों में न्यायालय की प्रधानता का होना जरूरी नहीं है.

बहुत सारे लोगों का मानना है की जजों की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस वाली गतिविधि से उच्त्तम न्यायलय की छवि को धक्क्का पहुंचा है. लोकतान्त्रिक संस्थाओं को अपने भीतर मौजूद समस्या से खुद ही निपट लेना चाहिए. यह दोनों बातें एक परिपक्व शासन व्यवस्था के लिहाज से अपरिपक्व है. इन दोनों बातों में इस बात का डर है की भारतीय संस्थाएं छुई-मुई हैं जिसमें समस्या उजागर होने पर वे टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगीं. किसी भी समाज को चलाने के लिए इस डर का सहारा लिया जाता है कि चाहे अंदरखाने सड़ांध की बदबू बर्दाश्त के बाहर ही क्यों न हो जाए लेकिन छवि धूमिल नहीं होनी चाहिए. संस्थाओं से लोगों का भरोसा नहीं उठाना चाहिए. इसलिए पूरी दुनिया निजी और सार्वजनिक संस्थाएं छवि बनाने पर ज्यादा ध्यान देती हैं.

एक बेहतर संस्था अपने अंदर मौजूद मतभेदों और समस्याओं के निपटारे के लिए कुछ मैकनिज्म रखती है. जजों के जारी किये पत्र को ध्यान से पढ़ने पर समस्याओं के निपटारे की मैकनिज्म दिखता है. पत्र का दूसरा पैराग्राफ कहता है कि

सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों में एक सिद्धांत यह भी है कि रोस्टर का फैसला करने का विशेषाधिकार प्रधान न्यायधीश के पास है, जिससे कि यह व्यवस्था निर्वाध बनी रहे कि सर्वोच्च न्यायालय का कौन सदस्य और कौन सी पीठ, किस मामले का सुनवाई करेगी. यह परंपरा इसलिए भी बनाई गई है ताकि अदालत का कामकाज अनुशासित और सुचारू तरीके से चलता रहे. यह परंपरा प्रधान न्यायाधीश को अपने सहयोगियों के ऊपर अपनी बात थोपने की इजाजत नहीं देती है. हमारे देश के न्यायतंत्र में यह बात भी पूरी तरह स्थापित है कि प्रधान न्यायाधीश सभी न्यायाधीशों के बराबर है- बस सूची में पहले नंबर पर है, न उनसे कम और न ही उससे ज्यादा. रोस्टर तय करने के मामले में पूर्व स्थापित और मान्य परंपराएं रही हैं कि प्रधान न्यायधीश मामले की ज़रूरत के हिसाब से ही पीठ का निर्धारण करेंगे.
उपरोक्त सिद्धांत के बाद अगला तर्कसंगत कदम ये होगा कि इस अदालत समेत अलग-अलग न्यायिक इकाइयां ऐसे किसी मामले से ख़ुद नहीं निपट सकतीं, जिनकी सुनवाई किसी उपयुक्त बेंच से होनी चाहिए. उपरोक्त दोनों नियमों का उल्लंघन करने से दुखद और अवांछित परिणाम होगें जिससे न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा को लेकर देश की राजनीतिक के मन में संदेह पैदा होगा. साथ ही, अगर ऐसा नहीं होगा तो ऐसा हंगामा मचेगा जिसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है. हम यह कहते हुए बेहद निराश हैं कि पिछले कुछ समय से जिन दो नियमों की बात हो रही है, उसका पालन पूरी तरह नहीं किया जा रहा है. ऐसे कई मामले हैं जिनमें देश और संस्थान पर असर डालने वाले मुकदमे इस अदालत के आपने ‘अपनी पसंद की’ बेंच को सौंप दिए, जिनके पीछे कोई तर्क नज़र नहीं आता. इसकी रक्षा हर हाल में होनी चाहिए.

यह पंक्तियाँ न्यायालय के भीतर मौजूद समस्याओं को भी उजागर करती है, उसके सामाधान को भी बताती हैं और समाधान न होने पर भविष्य में आने वाली परेशानियों के तरफ भी इशारा करती हैं. यह पत्र 2 महीने पहले लिखा गया था. जिसका जवाब अभी तक नहीं आया है. पत्र में दूसरा उदहारण देते हुए जजों ने लिखा है की आर. पी लूथरा बनाम भारत सरकार के केस में जब यह फैसला दिया गया था की व्यापाक लोक हित को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति के लिए मेमोरंडम ऑफ़ प्रोसिजर(MoP) जल्द से जल्द बनाना जरूरी है. साथ ही जब सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (सुपरा) मामले में यह व्यवस्था की गयी थी कि मेमोरेंडम ऑफ़ प्रोसिजर बनाने से जुड़े किसी भी मामले पर निर्णय लेने का अधिकार संवैधानिक पीठ के पास होगा, तब आखिरकार क्यों इस मामले की सुनवाई दूसरे बेंच को हस्तांतरित कर दी गयी? इसके अलावा पत्र के अंत में जजों ने मुख्य न्यायधीश से निवेदन किया है कि कई ऐसे मामले हैं जिनमे न्यायिक गड़बड़ियाँ हुईं हैं और उन्हें जल्द से जल्द सुधारे जाने की जरूरत है.

पत्र की बातें इस तरफ इशारा कर रही हैं की न्यायपालिका के भीतर मौजूद समस्याओं का समाधान निकालने वाले मैकनिज्म पर ही प्रहार हो रहा है. साधारण शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है की क्रिकेट की पिच दरक गयी है, गड्ढों की भरमार है लेकिन फिर भी क्रिकेट का खेल खेला जा रहा है. और दर्शक केवल हार और जीत के नशे में चूर हैं. सूचना के अधिकार के जमाने में जब जज सामने आकर देश से मुखातिब होते हुए, वस्तुस्थिति की बात कर रहे हों, तब जजों का हौसला बढ़ाना चाहिए. न की इस बात पर मातम करना चाहिए की न्यायपालिका की साख बर्बाद हो रही है.

साथ ही ऐसे न्यायपालिका के हर मुद्दे को न्यायपालिका के जरिये ही सुलझाये जाने का प्रयास होना चाहिये. साथ ही उसी तार्किक प्रक्रिया से भी. चाहे वह जस्टिस कर्णन का मामला ही क्यों न हो. क्योंकि न्यायपालिका ने अगर ऐसी जिम्मेदारी कांधे पर नहीं ली तो ज़ाहिर है उसमें बाहरी हस्तक्षेप को आज नहीं तो कल कोई नहीं रोक सकेगा. इसलिये इन आरोपों को न्यायपालिका में सुधार के अवसर के रूप में ही देखा जाये, न कि न्यायपालिका की साख गिरने का रोना रोया जाये. साथ ही न्यायपालिका के अंदर से इसके लिये जरूरी कदम उठाये जाने जरूरी हैं ताकि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस बस दबाव बनाने का एक ज़रिया बनकर न रह जाये और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ सकें.

 

_____________________________________________________________________

यह लेख आप कठफोड़वा.कॉम पर पढ़ रहे थे. आगे भी हमारे लेख और वीडियोज़ पाते रहने के लिये हमें फेसबुक और ट्विटर पर लाइक करें और यूट्यूब पर सब्सक्राइब करें-

कठफोड़वा फेसबुक

कठफोड़वा ट्विटर

कठफोड़वा यूट्यूब

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here