केंद्र सरकार ने रोजगार सृजन के तमाम वादे किये हैं. नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में कहा था कि हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा किये जायेंगे. इसके बावजूद देश में बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है. श्रम ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश की बेरोजगारी दर 2015-16 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई है.यह पांच साल का उच्च स्तर है. महिलाओं के मामले में बेरोजारी दर और भी बुरी हालत में है. अखिल भारतीय स्तर पर पांचवें सालाना रोजगार-बेरोजगारी सर्वे के अनुसार करीब 77 प्रतिशत परिवारों के पास कोई नियमित आय या वेतनभोगी व्यक्ति नहीं है.बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि ‘यह आंकड़ा केंद्र की भाजपा शासित सरकार के लिए खतरे की घंटी हो सकती है’. आइये समझते हैं कि सरकारें रोजगार के तमाम दावों के बावजूद उन्हें पूरा करने में आखिर क्यों असफल रहती हैं.

देश को आर्थिक वृद्धि चाहिए. इसका सत्यापन नीतियाँ बनाने वालों की बोली करती है,जो हमेशा इकनोमिक ग्रोथ का रट लगाये फिरते हैं. युवाओं को रोज़गार चाहिए. इसका सत्यापन कुकुरमुत्ते की तरह उगती जा रही कोचिंग संस्थानें करती हैं, जो पढ़ाई के नाम पर वही पढ़ाती हैं जिसकी ज़िम्मेदारी स्कूलों को मिली है.

बच्चों की सीखने-समझने की उम्र मास्टरों और स्कूलों की बदहाली से तबाह हो रही है. जिस उम्र में बच्चों को किताबों के वाक्यों में उलझते हुए भाषा पर पकड़ जमानी चाहिए,उस उम्र में कम्पटीशन की तैयारी उन्हें रट्टू तोता बना रही है.सब उतना ही पढना चाहतें है,जितने से नौकरी मिल जाए. रोज़गार की चाहत ऐसी है कि  दर्जा 10 पास करने के बाद ही सबके टेबल पर लुसेंट,अरिहंत और प्रतियोगिता दर्पण वाली किताब सजने लग जाती है.क्योंकि सब सरकारी नौकर बनना चाहते हैं जबकि सरकार जिन नीतियों के सहारे आगे बढ़ रही है,वहां रोज़गार की संभावनाएं न के बराबर है. 1 अरब से अधिक आबादी वाले देश में फिलहाल करीब डेढ़ करोड़ लोग सरकारी क्षेत्र में काम करते हैं. और जहाँ रोज़गार है वहां रोज़गार का युवाओं से कहना है की मेरी चादर ओढने के लिए तुम्हारी औकात अभी बहुत छोटी है.

इस साल के आर्थिक सर्वे के पन्ने कहते हैं कि  विकास की दौड़ में भारत जैसे देशों ने बहुत बाद में शुरुआत की है. बात उस समय की है जब वैश्वीकरण के लिए दुनिया की मजबूत ताकतें अपना दरवाज़ा बंद कर रही हैं. जब कारखाने टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन के बूते पर चलाए जा रहे हैं .इसलिए इस समय में रोजगार के हकदार वही बनेंगे जिनकी टेक्नोलॉजी से बेहतर दोस्ती हो, जो कुशल कामगार हों और निरंतर बदलती हुई दुनिया में पनपने वाली संभावनाओं को अपने कौशल से पकड़ने में माहिर हों .लेकिन दुखद बात यह है की सरकार रोज़गार के सवाल से खेलने लगी है.पकौड़ा बेचकर बेरोज़गारी दूर करने की सलाह दे रही है.पकौड़ा बेचने की सलाह से एतराज़ नहीं है, लेकिन ऐतराज़ इस बात से है की यह सलाह एक सरकार दे रही है. और एक ऐसे समाज के लिए सलाह दे रही है,जहाँ आय की घनघोर असमानताएं मौजूद हैं, जहां मोटी कमाई के बिना गरिमापूर्ण जीवन जीना बेहद मुश्किल है .

पकौड़ा बेचनें से लेकर चाय बनाने तक और प्रधानमंत्री से लेकर शौचालयों की सफाई करने तक सारे काम समाज के रोजाना के जीवन को चलाते रहने के लिए जरूरी हैं .इसलिए परेशानी काम की प्रकृति से नहीं है बल्कि परेशानी इस बात से है की क्या पकौड़ा बेचेने के बाद मिली आय से एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है ?(अनुच्छेद 21)क्या पकौड़ा बेचनें वाले यह नहीं चाहेंगे की उनकी संतान बेहतर तालीम हासिल करे? उसे जीवन से जुडी जरूरी सुविधाएं मिल सके. लेकिन यह असम्भव है. क्योंकि पकौड़ा बेचने पर हुई कमाई से केवल पेट भरा जा सकता है, जिंदगी नहीं जिया जा सकता.सरकारों की आर्थिक नीति ने गैर बराबरी की जो खाई पैदा की है,उसे पकौड़ा बेचकर और चौड़ा ही किया जा सकता है,पाटा नही जा सकता.

सिक्के का दूसरा पहलु यह भी है की भारतीय मानव पूंजी का स्तर अपेक्षा से बेहद कमजोर है. स्कूलों की दाखिला में बच्चे तो समाते जा रहे हैं, लेकिन लर्निंग की गुणवत्ता गिरती जा रही है. यानी की एक तरफ पीठ थपथपाने वाला हाल है तो दूसरी तरफ गर्दन झुकाने वाला. आर्थिक सर्वे का कहना है की भारत जैसे देश जो आज विश्व स्तरीय लर्निंग के मूल्यांकन में भाग ले रहे हैं, वे लर्निंग की गुणवत्ता के मामलें में 21 और 20 वीं सदी के शुरूआती अमीर देशों के लर्निंग के स्तर से भी पीछे हैं.

इस आर्थिक सर्वे में ASER( Annual Status of Education Report.) की चौंकाने वाली रिपोर्ट भी छपी है . इस रिपोर्ट के आंकड़ें कहते हैं की ग्रामीण भारत के करीब 40 से 50 फीसदी बच्चे दर्जा 3 से लेकर 8 के लिए निर्धारित भाषाई और गणितीय बेंचमार्क को पूरा करने में नकामयाब हैं .यानि की इस दर्जे के करीब 40 फीसदी बच्चे न तो किताब पढ़ पाते हैं और न ही घटाव कर पाते हैं .इस रिपोर्ट ने कुछ आंकड़ों के सहारे यह भी दिखाया है की दर्जा 8 के केवल 80 फीसदी बच्चे दर्जा 2 के बेंचमार्क पार करने में सफल हुए .यह रिपोर्ट ग्राफ के सहारे यह भी दिखाती है की आज के दौर में मोटी कमाई के लिए योग्यता का जो बेंचमार्क स्थापित किया गया है,वह बहुत उंचा है और उसे पार करने में बहुत बड़ी आबादी नाकामयाब है.

ऐसे आंकड़ों से पता नहीं चलता की रोज़गार के लिए किसे दोषी ठहराया जाए, सरकार की नियत को या समाज की उस मनः स्थिति को जो केवल रोज़गार चाहती है, भले ही शिक्षा का कबाड़ा ही क्यों न निकल रहा हों ? इन आंकड़ो से यह भी समझ आता है कि अब सरकार रोजगार के मसले पर घिर जाने के बाद पकौड़ा बेचने की सलाह क्यों दे रही है .

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